मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने शुक्रवार को एक केस में आरोपी की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। आरोपी को 9 साल की बच्ची के रेप और हत्या का दोषी ठहराया गया था।
कोर्ट ने कहा कि अपराध बहुत गंभीर था, लेकिन इसके लिए मौत की सजा जरूरी नहीं थी, क्योंकि यह मामला सबसे दुर्लभ मामलों की श्रेणी में नहीं आता।
निचली अदालत के आदेश को बदलते हुए बेंच ने कहा, अपराध ऐसा नहीं है कि इसके लिए मौत की सजा दी जाए।
जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की डिवीज़न बेंच ने ट्रायल कोर्ट द्वारा कल्लू राठौर को IPC की धाराओं 302, 366 और 376(AB) और पॉक्सो एक्ट के तहत दोषी ठहराए जाने के फैसले को तो बरकरार रखा, लेकिन उसकी मौत की सजा को बदलकर उम्रकैद (जब तक वह जीवित रहे) कर दिया।
बेंच ने माना कि पीड़ित एक बेबस बच्ची थी, जिसे एक भरोसेमंद रिश्तेदार ने बहला-फुसलाकर ले गया था। लेकिन अभियोजन पक्ष ऐसे हालात साबित नहीं कर सका जो मौत की सजा को सही ठहराते हों।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अपीलकर्ता का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड साबित नहीं हुआ है और उसे समाज या समुदाय के लिए खतरा या जोखिम भी साबित नहीं किया गया है।
यह मामला फरवरी 2022 में ग्वालियर में सामने आया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी बच्ची को आइसक्रीम खिलाने के बहाने बाहर ले गया था। जब कई घंटे बीत गए और वह वापस नहीं लौटी, तो उसके परिवार ने उसे खोजना शुरू किया और बाद में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। बाद में बच्ची एक रेलवे क्रॉसिंग के पास मृत पाई गई।
हाई कोर्ट की बेंच ने CCTV फुटेज, फोरेंसिक सबूत और परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के फैसले को बरकरार रखा। सजा और दोषी ठहराए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान, बेंच ने फुटेज देखी और पाया कि उसमें एक व्यक्ति जिसका चेहरा साफ दिख रहा था और वह एक बच्ची के साथ जा रहा था।
कोर्ट ने बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि रिकॉर्डिंग साफ नहीं थी।
कोर्ट ने DNA सबूतों पर भी भरोसा किया और पाया कि पीड़ित की स्लाइड और स्वैब से मिला Y-DNA प्रोफाइल, अपीलकर्ता के खून के नमूने से मिले Y-DNA प्रोफाइल से मेल खाता था।
कोर्ट को नमूनों को इकट्ठा करने, उनकी कस्टडी या उन्हें ट्रांसफर करने में कोई कमी नहीं मिली और उसने माना कि फोरेंसिक सबूत अभियोजन पक्ष के मामले की मजबूती से पुष्टि करते हैं।
बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज करते हुए कि अभियोजन पक्ष ने केवल आखिरी बार देखे जाने वाली थ्योरी पर भरोसा किया था, बेंच ने कहा कि दोषसिद्धि सबूतों की एक पूरी कड़ी पर आधारित थी, जिसमें गवाहों के बयान, इलेक्ट्रॉनिक सबूत और आरोपी तक का आचरण तक शामिल था।



