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अपने पनपाए बैक्टीरिया का खुद ही निदान करें

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प्रकाश भटनागर।

मामला उस कूटनीतिक प्रतीक्षा का है, जहां किसी फुंसी के लिए नासूर बनने का इंतजार किया जाता है। फुंसी का निदान बेहद सहज तरीके से किया जा सकता है। मगर छोटे-से इलाज की भला कौन प्रशंसा करेगा? लिहाजा मामला नासूर तक पहुंचे और फिर उससे निजात दिलाने की तारीफ हासिल करने वाले पूरे प्रायोजित बंदोबस्त कर लिए जाएं। बाकी इस बात की चिंता किसे है कि आरंभ से लेकर अंत तक की इस अवस्था के बीच संबंधित शरीर में कितने घातक बैक्टीरिया पनप गए होंगे। जो किसी समय की हुकूमत ने पंजाब में खालिस्तानी अराजकता को लेकर किया, लगभग वही आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह कर गुजरे। लेकिन जनदबाव अपना काम करता है। और यह पहली बार भी नहीं हुआ कि जनदबाव में मोदी सरकार झुकी है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में सुधार के लिए मोदी सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का भी निश्चित रूप से स्वागत करना चाहिए। डा. नंदन निलकेणी को परीक्षाओं में सुधार के लिए बनाई टास्क फोर्स की जिम्मेदारी देकर मोदी सरकार ने एक तरह से अपनी नीयत भी साफ की है। सरकार इसे लेकर गंभीर है।यदि इससे लाखों युवाओं का भविष्य अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बनता है, तो आज के अविश्वसनीय माहौल में यह भरोसा पैदा करने वाला कदम है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है, क्या सरकार को अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए हर बार जनता के आंदोलन का इंतजार करना चाहिए? परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना किसी भी सरकार का मूल दायित्व है।

यह सुधार तब होने चाहिए थे जब पहली बार खामियां सामने आई थीं। क्या सरकार इंतजार कर रही थी कि युवाओं का आक्रोश सड़क पर दिखाई दें? लोकतांत्रिक शासन की कसौटी यही है कि वह समस्याओं को समय रहते पहचानकर उनका समाधान करे, न कि जनाक्रोश के बाद कार्रवाई की नौटंकी। यहां बात केवल परीक्षाओं तक सीमित नहीं है। आज भी और आगे भी अनेक ऐसे विषय हैं जिन पर समाज के भीतर असंतोष पनप रहा है। यदि सरकार समय रहते संवाद और सुधार का रास्ता नहीं अपनाती, तो भविष्य में उन मुद्दों पर भी आंदोलन खड़े होना स्वाभाविक हैं।

केंद्र सरकार चाहती तो इस आंदोलन के अराजक होने से पहले ही उसे शांत कर देती। जब धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा आज लिया गया तो ऐसा बहुत पहले कर लेने में भला क्या हर्ज था? मगर मोदी सरकार ने देश में भीड़तंत्र को नई दिशा दे दी। बता दिया कि हम तो तब ही झुकेंगे जब कभी अटारी बॉर्डर और आज जंतर-मंतर तक वाले उन्माद से भरी स्थिति निर्मित न कर दी जाए। हर व्यवस्था में सुधार की दरकार तो आपकी ही मोहताज है। जब पता लगा कि नीट का परचा लीक हो गया है, तब क्यों आप ये परचम लहराने में मसरूफ रहे कि ‘यहां पे सब शांति-शांति है ?’

आप तो मौका मिलते ही नेहरू से लेकर केजरीवाल तक के गड़े मुर्दे उखाड़ने लगते हैं। तो फिर कैसे ये हुआ कि सरकार को विद्यार्थियों की आशाओं को कब्र में दफनाने वाले सिस्टम को जमींदोज कर देने की सुध नहीं आई? चलिए कि अब आप अंगड़ाई लेकर जाग उठे हैं। प्रधान का इस्तीफ़ा तो खैर ‘बड़ी मछली बनाम छोटी मछली’ वाला मामला ही ठहरा, लेकिन कठोर कानून से लेकर नीलेकणी टास्क फोर्स वाली चेतना पहले आपके भीतर क्यों नहीं नमूदार हुई? फिर भी बधाई कि आपने तालीम के सुधार के लिए सकारात्मकता का प्रदर्शन कर दिया है। लेकिन मामला क्या केवल एक है?

आप नेहरू को जमकर कोसते हैं। कई अर्थ में ऐसा किया जाना सही भी है। लेकिन एक मामले में तो आप उनके पक्के चेले निकले। नेहरू ने लिखा था, ‘मुझे लगता है कि अतीत की ओर बार-बार मुड़कर देखना ठीक  नहीं है। यदि ईश्वर की यही इच्छा होती तो उसने हमें सिर के पीछे आँख दी होती।’ आप ने इस पंक्ति को सादर अंगीकार कर लिया। पलट कर यह देखा ही नहीं कि शिक्षा व्यवस्था में क्या सुराख थे और कैसे नीट से पहले भी आप कुछ और मुद्दों पर इसी बेपरवाही के चलते औंधे मुंह गिर चुके हैं।

लोकतंत्र का सम्मान है। हम चीन नहीं हैं कि तियानमेन चौक पर युवाओं को गोली से भून दें।हम पाकिस्तान भी नहीं हैं कि बलूचिस्तान में जनता और लोकतंत्र को कुचल दें। लेकिन हम भारत तो हैं ना? इसीलिए जनदबाव में सरकार का झुकना गलत भी नही है। किसी भी लोकतंत्र में जनदबाव को नकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। जनता की आवाज़ शासन को अधिक जवाबदेह बनाती है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि मोदी सरकार पहली बार नहीं, कई अवसरों पर जनभावना और जनदबाव को देखते हुए अपने निर्णयों में बदलाव कर चुकी है। साफ है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की शक्ति आज भी प्रभावी है। इसलिए किसी निर्णय पर पुनर्विचार करना सरकार की कमजोरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत मानना चाहिए।

फिर भी, भाजपा और विशेष रूप से नरेंद्र मोदी तथा अमित शाह की कार्यशैली पर लंबे समय से एक आरोप लगातार लगाया जाता रहा है कि सरकार और संगठन दोनों में निर्णय लेने की प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत हो गई है। विरोधियों के साथ-साथ अनेक निष्पक्ष राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि भाजपा पर “अहंकारी” और “घमंडी” होने का जो राजनीतिक टैग लगा है, उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। चुनावी सफलताएं जितनी बड़ी होती हैं, उन्हें पचाना उतना ही कठिन होता है। लगातार विजय का क्रम कई बार आत्ममंथन की आवश्यकता को पीछे धकेल देता है। भाजपा पर यह आरोप भी लगता रहा है कि पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र पहले जैसा दिखाई नहीं देता और निर्णय कुछ सीमित चेहरों के इर्द-गिर्द सिमटते गए हैं।

राजनीतिक दलों की वास्तविक शक्ति केवल चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि विचार-विमर्श, संवाद और संगठनात्मक लोकतंत्र को जीवित रखने में होती है। एक राष्ट्रीय दल का लोकतांत्रिक चेहरा जितना मजबूत होगा, उसकी विश्वसनीयता भी उतनी ही बढ़ेगी। यह मान लेना भी ठीक नहीं कि सरकार या उसके शीर्ष नेतृत्व को अपनी कमियों का अहसास नहीं है। निश्चित रूप से उन्हें इन संकेतों की जानकारी होगी। राजनीतिक नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा कमियों को स्वीकार कर समय रहते उन्हें दूर करने में होती है। यही परिपक्व नेतृत्व की पहचान है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा के सामने कोई उतना मजबूत राष्ट्रीय विकल्प दिखाई नहीं देता जो अकेले उसके समकक्ष खड़ा हो सके। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सत्ता के लिए जनता का समर्थन स्थायी हो गया है। यदि सरकार अपनी गलतियों को समय रहते नहीं सुधारेगी, तो राजनीतिक असंतोष फिर से गठबंधन राजनीति को जन्म दे सकता है।

देश का अनुभव बताता है कि जब किसी एक दल के प्रति जनता का भरोसा कम होता है, तो विकल्प चाहे कमजोर हो, उसे अवसर मिल ही जाता है। 1977, 1980 और 1996 के आमचुनाव चुनाव इसके बड़े उदाहरण हो सकते हैं। भाजपा के लिए यह आत्ममंथन का समय है। जनादेश केवल शासन करने का अधिकार नहीं देता, बल्कि अधिक विनम्र, अधिक उत्तरदायी और अधिक संवादशील बनने की जिम्मेदारी भी देता है। सरकार यदि समय रहते जनता के संदेश को समझ ले, तो न केवल उसकी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ेगी, बल्कि लोकतंत्र भी अधिक मजबूत होगा। लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति चुनावी जीत नहीं, बल्कि जनता का सतत विश्वास होता है। और उस विश्वास को बनाए रखने के लिए संवेदनशीलता, संवाद और समय पर निर्णय, तीनों बेहद जरूरी हैं।

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