डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी।
‘दायरा’ फिल्म में मनोरंजन का अंश है ही नहीं। भेजा फ्राई करने वाले दो पक्ष हैं। यह एडल्ट फिल्म है और इसके सीन नहीं, मुद्दा ‘एडल्टों’ वाला है। क्या एनकाउंटर कभी न्याय हो सकता है? या कानून का रास्ता ही एकमात्र रास्ता होना चाहिए?
‘दायरा’ मास्टरपीस नहीं है। यह एक जरूरी, असहज और अधूरी फिल्म है। अभिनय मजबूत है, विषय गंभीर है, निर्देशन ईमानदार है। लेकिन पटकथा अंत तक साथ नहीं निभाती।
दर्शक अगर वर्ड ऑफ माउथ माहौल बनाएं तो फिल्म टिक सकती है वरना यह उन फिल्मों में शामिल हो जाएगी, जो सोचने पर मजबूर करती हैं, लेकिन याद कम रहती हैं।
मेघना गुलजार की यह फिल्म 2019 के हैदराबाद रेप-मर्डर केस और उसके बाद हुए पुलिस एनकाउंटर से प्रेरित है। फिल्म का मूल प्रश्न सीधा है – जब सिस्टम पीड़ित को समय पर न्याय नहीं दे पाता, तो क्या पुलिस को खुद फैसला लेने का अधिकार है? यह सवाल सिर्फ एनकाउंटर तक सीमित नहीं रहता। फिल्म महिलाओं के खिलाफ अपराध की निरंतरता, मीडिया की संवेदनहीनता, पीड़ित परिवार की सामाजिक बदनामी और कानून की धीमी गति को एक साथ रखती है।
‘दायरा’ शब्द यहाँ दो अर्थों में काम करता है (1) कानून का निर्धारित घेरा और (2) उस घेरे से बाहर निकलने की लालसा।
समाज में न्याय का मतलब हर व्यक्ति के लिए अलग होता है। पीड़ित परिवार के लिए न्याय का अलग अर्थ है और अपराधी के परिवार के लिए अलग। अपनी बेटी के मामले में ग्रे एरिया गायब हो जाता है; किसी और के मामले में वही ग्रे एरिया बहस का विषय बन जाता है। मेघना गुलजार ने फिल्म में महिलाओं के खिलाफ अपराध को महज प्लॉट डिवाइस नहीं बनाया है। उन्होंने पीड़ित परिवार की गरिमा का भी ध्यान रखा है। संवाद संयमित हैं, लेकिन उनमें चिंगारी कम है।
फिल्म बताती है कि सिस्टम भी चेंज होते हैं, पर लोग नहीं होते। क़ानून अपने हिसाब से ही चलता है। दर्शक सोचने लगता है कि सबसे ज्यादा एनकाउंटर तो यूपी में हो रहे हैं और फिल्म उसका चर्चा नहीं कर रहा !
‘दायरा’ क्राइम थ्रिलर नहीं है। यह उस जगह खड़ी है, जहाँ कानून, न्याय और व्यक्तिगत नैतिकता एक-दूसरे से टकराते हैं। करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन दो ऐसे पुलिस अधिकारी हैं, जिनकी सोच एक ही घटना को दो विपरीत दिशाओं में खींचती है। फिल्म कई वास्तविक मामलों और सिस्टम की बार-बार दोहराई जाने वाली नाकामी से अपना कच्चा माल लेती है।
फिल्म फ्लैशबैक और वर्तमान के बीच चलती है : अपराध की रात, परिवार की तड़प, पुलिस स्टेशन की निराशा और फिर जाँच की ठंडी प्रक्रिया। यह संरचना जानबूझकर धीमी और प्रक्रियात्मक है। मेघना गुलजार दर्शक को हीरो-विलेन के आसान फॉर्मूले से दूर रखती हैं। दोनों अधिकारी अपने-अपने दायरे में ईमानदार दिखते हैं। दोनों अपनी-अपनी जगह सही लगते हैं। फिल्म किसी एक पक्ष को जीत नहीं दिलाती। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी, दोनों है। वह दर्शक को असहज स्थिति में छोड़ती है।
फिल्म में करीना कपूर निराश करती हैं। बेचारी काम के बोझ की मारी लगती हैं। उनकी सुस्ती से दर्शक भी सुस्त पड़ जाता है।
झेल सको तो झेल लो।



