
प्रकाश भटनागर।
भारतीय जनता पार्टी के मूल चरित्र को दो अलग-अलग कोण से। समझने के लिए यह एकदम उचित समय है। पहला कोण उनके लिए जो आज वाली भाजपा के विशाल स्वरूप को देखकर यह यकीन ही नहीं कर सकते कि यहां तक का सफर उन लोगों के बगैर अधूरा ही रहता, जिन्होंने पार्टी के लिए दरी बिछाने से लेकर झाड़ू लगाने तक का काम किया।
वह भी तब, जब इस पार्टी का अस्तित्व ‘संघर्षशील’ वाली स्थिति से भी काफी कुछ कम था। दूसरे कोण पर उन लोगों को आसीन कर देना चाहिए, जो मानते हैं कि इस पकी-पकाई रोटी पर केवल उनका ही हक है। अपनी साधन-संपन्नता की बदौलत इस रोटी को मक्खन से भर देने की कृपा उनकी जेब में बरसती रहती है।
मध्यप्रदेश से राज्यसभा के लिए रजनीश अग्रवाल का चयन इन दोनों कोनों का अध्ययन बिंदु बन गया है। रजनीश खांटी रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चरित्र में रचे-बसे हैं। सभी जानते हैं कि भाजपा के लिए उनका वर्षों का त्याग और समर्पण दरी बिछाने वाले भाव से जरा भी नहीं डगमगाया है। अग्रवाल का पार्टी के लिए सफर हद दर्जे की नामालूम शुरुआत के साथ हुआ।
विद्यार्थी परिषद से शुरू करते हुए भाजपा के दिग्गज नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस से लेकर उनकी सभा या अन्य कार्यक्रमों के दौरान वो निर्लिप्त भाव से कागज़ात सहित संदेश इधर से उधर ले जाने के काम में पूरी निष्ठा के साथ जुड़े रहे। कोई गॉडफादर नहीं।
ऐसा होने की इच्छा भी नहीं। न ही कभी पद या कद की दौड़ में शामिल रहे। संघ का आचरण रजनीश की सादगी और व्यवहार में साफ़ दिखाई देता रहा है। हां, जवाबदारी मिलने पर संगठन के लिए अपनी क्षमताओं का भरपूर परिचय देने में रजनीश ने कभी नहीं चूकना नहीं सीखा।

प्रवक्ता के रूप में धारदार तर्क और विपक्ष की धार भोथरी करने के मामले में आक्रामक अंदाज उनकी पहचान रहा।
इस सबको देखने/समझने के बावजूद यह शायद ही कभी सोचा गया कि रजनीश को तमाम दिग्गज नामों से आगे लाकर राज्यसभा के मुहाने पर ला खड़ा कर दिया जा सकता है।
यहां मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘परीक्षा’ का एक वाक्य याद आता है- ‘लेकिन मनुष्यों का वह बूढ़ा जौहरी आड़ में बैठा हुआ देख रहा था कि इन बगुलों में हंस कहाँ छिपा हुआ है।’ संघ से लेकर भाजपा तक के ऐसे ही जौहरी/जौहरियों ने इस कहानी की तरह ही काम कर दिखाया है। जो इस पार्टी के शुभचिंतकों को इस बात की तसल्ली दे रहा है कि नितिन नबीन से लेकर रजनीश तक के चयन में ये दल आज भी ‘पार्टी विद डिफरेंस’ की छवि से जुड़ा हुआ है।
निश्चित ही पिछले एक सवा दशक की सफलता की अकल्पनीय यात्रा के बीच भाजपा कई गलत निर्णयों से अछूती नहीं रही। कई जगह ऐसा दिखा कि कंधे पर कपड़े का थैला और जेब में मुट्ठी भर चने रखकर पार्टी की सेवा करने वालों के युग का अवसान हो गया है। दरी बिछाने वालों की फ़ौज दिग्गजों के पांव तले अपना भविष्य तलाशने में मशगूल हो गए हैं। मगर अग्रवाल प्रकरण कहता है कि वो दौर आज भी कहीं न कहीं जीवित है और भाजपा इस दिशा में अपने मूल से अभी तक पूरी तरह भटकी नहीं है।
अवलोकन के दूसरे कोण पर बैठे समूह को इससे सबक लेना होगा। ये वो लोग हैं, जो मानकर चल रहे हैं कि पार्टी में आधार-हीन अचंभों के कतिपय उदाहरणों की बहती गंगा में वो भी हाथ धो लेंगे। रजनीश का उदाहरण बताता है कि बात किनारे पर बैठकर लहरें गिनने भर से नहीं बनेगी। उसके लिए लहरों में उतरकर संघर्ष करना होगा। गहरे उतरने पर ही मोती मिलते हैं। मोती को हंस का भोजन कहा जाता है। बगुले भी हंस जैसा आचरण करने का असफ़ल प्रयास करते हैं। लेकिन मोती का पारखी जौहरी हंस और बगुले का अंतर वैसे ही जानता है, जैसा रजनीश और उनके अलावा भी कई नामों के ऐसे ढेरों उदाहरण भाजपा के पास हैं।
यहां एक बार फिर काम बोला, नाम नहीं। ऐसे में फिर ये कहना उबाऊ किस्म का दोहराव नहीं होगा कि भाजपा में पार्टी विद डिफरेंस वाली प्राण-वायु का आवागमन अब भी जारी है। इन दो कोण से भाजपा को देखिए और सच्चे पार्टीजनों के उसके समकोण वाले भाव को समझ लीजिए।रजनीश के ताजा उदाहरण ने इस समझने को बेहद आसान बना दिया है। यह बताता है कि ये पकी-पकाई रोटी नहीं, बल्कि तपी-तपाई देह वालों की पार्टी है। भाजपा की अचंभित सफलताओं का राज ऐसे ही निर्णयों में छिपा है।



