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वो नबीन हैं, लेकिन भाजपा में नहीं है ये काम नवीन

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प्रकाश भटनागर

अगर संदेश यह जा रहा है कि नितिन नबीन के रूप में भारतीय जनता पार्टी ने कोई नवीन प्रयोग किया है, तो इससे वो सहमत नहीं हो सकते, जो भाजपा को भली-भांति जानते हैं और इस मामले में वो तो असहमति के चरम से भी आगे जा सकते हैं, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पहचानते हैं। क्योंकि ये उस दल और उसके सर्वेसर्वा का मिला-जुला मामला है, जो परिवारवाद या पट्ठावाद से कोसों दूर हर समय उस मोड़ के लिए खुद को तैयार रखता है, जिसे ‘कार्यकर्ता प्रमोशन मोड’ कहते हैं।

हाँ, इस कयास से सहमति हो सकती है कि आने वाले साल की जनवरी में भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में नबीन के ही पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ हो जाए। फिर भी ये पार्टी के आतंरिक लोकतंत्र के अनुरूप ही होगा ना? इसमें न किसी सीताराम केसरी के कपड़ों सहित उनके समूचे सम्मान को तार-तार कर देने जैसा कोई विषैला विषय होगा और न ही एक मंच पर प्रपंच रचते हुए दिवंगत मुलायम यादव को पार्टी के अभूतपूर्व प्रमुख से भूतपूर्व तक ला दिए जाने वाले अध्याय दिखेंगे।

देश में कम्युनिस्टों और भाजपा को छोड़कर बाकी दल अपना ऐसा सच दिल से स्वीकारने का साहस शायद ही जुटा सकें, लेकिन भाजपा का साहस अलग दिखता है। नबीन वाले फैसले ने दिखा दिया है कि ये पार्टी पीढ़ी परिवर्तन को परिवार वाले ”विक्रम-बैताल’ जैसी विडंबना से दूर रखने के अपने अनुशासन के लिए कितनी गंभीर है। बाकी तो देश में सवा सौ साल पुराने राजनीतिक दल का दम भरते हैं, उनके अस्सी साल के मल्लिकार्जुन खरगे आज भी ‘मैडम, भैया और बहन’ वाले मकड़जाल में फड़फड़ा रहे हैं। इधर 45 साल के नबीन अपनी पार्टी के लिए उन पंखों के साथ स्वतंत्र रूप से सुसज्जित दिखते हैं, जो संघ की सीख और भाजपा की रीत के अनुरुप इसलिए चुन लिए गए कि वो परिवारवाद से कोसों दूर पार्टी के लिए अपरंपार संभावनाओं का परिचय देते चले आए हैं। और भाजपा की चुनावी सफलता का मूल मंत्र भी यही रहा कि उसने संगठन के नाम पर चाटुकार तंत्र की जगह हमेशा से ही उपयुक्त पात्र को प्रधानता प्रदान की है।

कोई कितना भी कह ले कि नबीन के नेपथ्य में केंद्र सरकार सहित भाजपा संगठन में किसी के लिए रेड कारपेट बिछाने का जतन किया गया है, लेकिन अगर कोई जरा सा भी संघ और भाजपा के बीच की केमेस्ट्री को समझता है, तो क्या ऐसा सोचना सच कहा जाएगा? क्योंकि कमल वाली भाजपा में ये फूलों का सफर भला किसे चाहिए? यहां क्या कोई ऐसा अरमान भी पाल सकता है? शायद नहीं। क्योंकि ये उस पार्टी का मामला है, जिसके कर्ता-धर्ता ये नहीं देखते कि कौन हमारा है? वो ये देखते हैं कि कौन हमारे आचार-विचार और व्यवहार वाला है। संघ और भाजपा के इस अनुशासन को छिद्रान्वेषण जैसी कठिन उपमा देने की जरूरत नहीं है।

हाँ, इस प्रक्रिया के घनघोर विलोम के रूप में दलगत अनुशासन के छिद्र देखने हैं तो बिहार के तेजस्वी यादव, उत्तरप्रदेश में अखिलेश यादव, पश्चिम बंगाल के अभिषेक बनर्जी, महाराष्ट्र के आदित्य ठाकरे और ‘लास्ट बट नॉट दि लिस्ट’ वाले अंदाज में कांग्रेस के अघोषित राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी पर एक नजर डाल लीजिए। इस फेर में इन दलों का हश्र देखिए और इससे अलग होने का भाजपा हर्ष महसूस कीजिए। आप शायद समझ सकेंगे कि नितिन नबीन नया प्रयोग नहीं, सच्चे काम का वो उपयोग है, जो एक बार फिर भाजपा को सबसे अलग खड़ा कर दे रहा है।

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