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12 साल की बच्ची के मामले में एडॉप्शन एजेंसी कारा को सुप्रीम कोर्ट की फटकार

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12 साल की एक बच्ची की मां के गुजरने के बाद अमेरिका में रहने वाली उसकी मौसी और उनके पति ने हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट ( HAMA ) के तहत ‘दत्त होमम’ रस्म निभाकर उसे गोद लिया। यह दो साल पहले की बात है।

तब से वे अपनी गोद ली हुई बेटी को अमेरिका ले जाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, क्योंकि अमेरिका और भारत के बीच दूसरे देशों में गोद लेने (इंटर-कंट्री एडॉप्शन) के नियमों में टकराव है।

इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने भारत की सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स एजेंसी ( CARA ) के उस रवैये पर नाराजगी जताई है, जो विदेश में रहने वाले करीबी रिश्तेदारों द्वारा गोद लिए गए बच्चों के बेहतर भविष्य में रुकावट बन रहा है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच कर रही है।

गोद लेने वाले माता-पिता ने अमेरिकी सरकारी एजेंसी के जरिए बच्ची को दूसरे देश में गोद लेने की कानूनी प्रक्रिया पूरी कर ली थी, लेकिन उन्हें बताया गया कि इसके लिए भारत की CARA से ‘जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और सुरक्षा) एक्ट’ के तहत मंज़ूरी लेनी होगी।

अमेरिकी अधिकारियों ने गोद लेने वाले माता-पिता को बताया कि गोद लेने की मंजूरी 28 जुलाई, 2026 तक मान्य है, लेकिन उन्हें पता चला कि अमेरिका HAMA के तहत गोद लिए गए बच्चों को मान्यता नहीं देगा, क्योंकि ‘हेग कन्वेंशन ऑन प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन एंड कोऑपरेशन इन रिस्पेक्ट ऑफ इंटरकंट्री एडॉप्शन्स’ के तहत भारतीय गोद लेने की प्रक्रिया को कानूनी रूप से सुरक्षित नहीं माना जाता है।

28 जुलाई की डेडलाइन पास आने के साथ ही, शेरगिल की जोरदार अपील का असर हुआ और जस्टिस नागरत्ना ने HAMA के जरिए गोद लेने की प्रक्रिया को मंज़ूरी न देने पर CARA की कड़ी आलोचना की। उन्होंने सवाल किया, ‘यह सब अफसरशाही की लालफीताशाही है। अगर जांच के बाद HAMA के तहत गोद लेने की प्रक्रिया सही पाई जाती है, तो CARA को ‘नो ऑब्जेक्शन’ (अनापत्ति प्रमाण पत्र) जारी करने में क्या दिक्कत है?’

यह सब अफसरशाही की लालफीताशाही है। अगर जांच के बाद HAMA के तहत गोद लेने की प्रक्रिया सही पाई जाती है, तो CARA को नो ऑब्जेक्शन जारी करने में क्या दिक्कत है

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने ब्रिटेन के एक दंपती का दिया उदाहरण

जस्टिस नागरत्ना ने एक और मामले का जिक्र किया जिसमें पिता की बहन, मां-विहीन जुड़वां बच्चों को ब्रिटेन ले जाना चाहती थी, लेकिन उसके रास्ते में कई रुकावटें डाली गईं। उन्होंने पूछा, ‘हमें आपके अधिकारी को कोर्ट में बुलाना पड़ा। जब करीबी रिश्तेदार किसी मां-विहीन बच्चे को गोद ले रहे हों, तो आप ऐसी रुकावट डालने वाली सोच क्यों अपनाते हैं?’

सुप्रीम कोर्ट जस्टिस बीवी नागरत्ना जब करीबी रिश्तेदार किसी मां-विहीन बच्चे को गोद ले रहे हों, तो आप ऐसी रुकावट डालने वाली सोच क्यों अपनाते हैं।

CARA के नियम क्या कहते हैं

दूसरी ओर, जब किसी बच्चे को दूसरे देश ले जाने का मामला हो, तो CARA का ऑफिस मेमोरेंडम JJ एक्ट और एडॉप्शन रेगुलेशंस, 2022 के तहत गोद लेने की प्रक्रिया की इजाजत नहीं देता, अगर बच्चे को HAMA के तहत गोद लिया गया हो। इसलिए CARA ने JJ एक्ट के तहत गोद लेने की मंजूरी के लिए माता-पिता की अर्जी खारिज कर दी।

अमेरिका रहने वाले दंपती ने सुप्रीम कोर्ट को बताई मुश्किलें

अमेरिका में रहने वाले इस जोड़े के सामने आई इस मुश्किल स्थिति के बारे में वकील नूर शेरगिल और अनुजा पेठिया ने सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच को बताया। शेरगिल ने कहा, ‘गोद लेने वाले माता-पिता एक ऐसे दोतरफा गतिरोध में फंसे हैं जिससे निकलने का कोई प्रशासनिक रास्ता नहीं है। भारत JJ एक्ट के तहत मामले पर कार्रवाई नहीं करेगा और अमेरिका HAMA के तहत गोद लेने पर ‘हेग एडॉप्शन सर्टिफिकेट’ जारी नहीं करेगा।’

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