Sunday, May 26, 2024

शिवराज का यह ‘नायक’ वाला रूप

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बीते साल मार्च की बात है। तीखी गर्मी के बीच टीवी पर शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chauhan) का ‘कुछ नरम तो कुछ गरम अंदाज देखा। मुख्यमंत्री एक कार्यक्रम में मंच से, ‘ये मैं हू, ये मेरी सरकार है, ये मेरी प्रशासनिक टीम है और मध्य प्रदेश (Madhya pradesh) से भूमाफिया (land mafia) भाग रहे हैं’ कह रहे थे। मेरे साथ मौजूद एक पत्रकार मित्र ने कुछ गर्व के भाव से कहा, ‘ये तो पॉवरी गर्ल (power girl) जैसा मामला है। शिवराज जी से मिलूंगा तो उन्हें इसके लिए टोकूंगा।’ किन्तु मैं इस राय से सहमत नहीं था। मुझे यह किसी परिवर्तन का सूचक लगा और कल मैंने महसूस किया कि मैं काफी हद तक सही था। वह शिवराज का ‘पॉवरी’ नहीं बल्कि बल्कि ‘पॉवर’ को इस्तेमाल करने का सूचक था। मंगलवार को जनदर्शन यात्रा के आरंभ में ही बुंदेलखंड में मुख्यमंत्री ने इसका सशक्त तरीके से परिचय दे दिया।

गलत को लेकर ‘डंडा लेकर निकला हूं। भ्रष्ट अधिकारियों (corrupt officials) को नहीं छोडूंगा’ वाले तेवर तो मुख्यमंत्री हमेशा से ही दिखाते आये हैं, किन्तु इन तेवर का विस्तार मंच से ही सीएमओ (CMO), सब इंजीनियर Engineer() और तहसीलदार (Tehsildar) को निलंबित करते हुए दिखा तो साफ है कि अब चेतावनी का दौर बीत चुका है। अब सीधे एक्शन लेने की शुरूआत हो गयी है। सार्वजनिक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री के सवालों के जवाब में सीएमओ घिघियाते दिखे और नप गए। पीएम आवास योजना (PM Awas Yojana) में गड़बड़ी करने वाले हाथ बांधे और सिर झुकाए खड़े रहकर अपनी करतूत का खामियाजा भुगतते रहे। कमिश्नर को पाबन्द कर दिया गया कि दो दिन में सार्वजनिक सुनवाई कर मामले की पूरी जांच करें। ताकि सभी दोषियों के जिस्म में व्यवस्था का लोहा उतारा जा सके।

यह बहुत आवश्यक था और अवश्यम्भावी भी। मंच पर अफसरों को तो कमलनाथ (Kamalnath) ने भी अपने मुख्यमंत्रित्व काल में बुलाया था। लेकिन यह दिखावे से अधिक कुछ और साबित न हो सका। ठीक ‘शुद्ध के लिए युद्ध’ की विशुद्ध नौटंकी की ही तरह नाथ का यह प्रयास भी असफल रहा। वजह थी इच्छाशक्ति की कमी। यह कमी शिवराज ने कभी भी अपने ऊपर हावी होने नहीं दी है। दरअसल जब हम ‘नायक (Nayak)’ जैसे किसी सिनेमा में आन दि स्पॉट’ फैसला (‘on the spot’ verdict in cinema) करने वाले किसी चरित्र के लिए तालियां पीटते हैं, तब हम इसी इच्छा को प्रकट करते हैं कि वास्तविक जीवन में भी यही सख्ती की जाना चाहिए। शिवराज जब मंच पर यह तेवर दिखा रहे थे तब मौजूदा जनसमूह का शोर यही साबित भी कर रहा था कि शिवराज जो कर रहे हैं वो लोगों के मन की बात है।

ऐसा होना बिलकुल भी आसान नहीं होता। यह मुश्किल भी नहीं है, किन्तु वही इच्छा शक्ति की कमी वाला फैक्टर मामले को उलझा देता है। इतना कि सिस्टम की उस उलझन से गलत लोगों की समस्याएं सुलझने का मार्ग साफ होता जाता है। इसके कई तरीके हैं, जो इस देश में सुशासन तथा जवाबदेही का कोढ़ बन चुके हैं। इनमें ‘कठोर कार्यवाही की चेतावनी’ से लेकर ‘जांच के आदेश,’ और ‘जांच कमेटी का गठन’ जैसे दिखावट वाले काम शामिल हैं। लेकिन मंगलवार को मुख्यमंत्री ने इन सारे मकड़जालों को एक झटके में साफ करते हुए व्यवस्था में स्वच्छता की एक बड़ी पहल कर दी है। निश्चित ही यह किसी तीन घंटे की फिल्म की तरह दनादन गलत को सही करने जैसा मामला साबित नहीं होगा, किन्तु इससे एक वह कठोर सन्देश तो चल ही पड़ा है, जो लापरवाह तथा गलत तत्वों के बीच खलबली मचा रहा है।

कमलनाथ ने आरोप लगाया है कि इस तरह से मुख्यमंत्री उन क्षेत्रों में राजनीतिक लाभ (political advantage) लेने का प्रयास कर रहे हैं, जहां चुनाव होने हैं। नाथ से कोई यह पूछे कि यदि ऐसा ही था तो उन्हें मुख्यमंत्री रहते हुए किसने रोका था कि व्यवस्था के अव्यवस्थित हिस्सों को सख्ती से दुरुस्त करते हुए इसका राजनीतिक लाभ ले लिया जाए! आप भी लाभ ले लेते, कम से कम जनता को भी यह फायदा हो जाता कि सरकारी तंत्र में वह आवश्यक कायदा लागू होते देख लेती। क्या व्यवस्था में कसावट के किसी कार्य को सिर्फ इसलिए गलत ठहरा दिया जाए कि उसका संबंधित सरकार की छवि को भी लाभ मिलने की ‘आशंका’ है?

किसी समय मंदसौर में घुटने के बल बैठकर आम जनता से ‘मध्यप्रदेश मेरा मंदिर है’ कहने वाले शिवराज इन तरीकों को अपने पक्ष में भुनाने में माहिर हैं। मंगलवार को बुंदेलखंड वाले तेवर भी ऐसे किसी राजनीतिक शुभ-लाभ का प्रतीक बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आखिर अपनी छवि चमकाने का सभी को अधिकार है। फिर यहां तो मामला यह भी है कि यह अधिकार स्वयं के साथ-साथ पूरी तरह समानुपातिक रूप में सिस्टम को ढर्रे पर लाने की नीयत से भी किया जा रहा है। स्व-निर्मित विषमताओं से भरी कथित धर्म-निरपेक्षता वाले पंजे से यकायक निकलकर स्वयं को राम और हनुमान भक्त साबित करने की कोशिश करने वाले नाथ को क्या अब अलग से यह बताना पड़ेगा कि चीजों के उचित और अनुचित तरीके से लाभ लेने में क्या अंतर है?

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