Wednesday, May 22, 2024

इंसान होने का स्वांग रचते बाज

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यह चिंतन से अधिक चिंता का विषय होना चाहिए। वह कौन है या वे कौन हैं, जो खरगोन (Khargone) को गॉन केस होने देना नहीं चाह रहे हैं? ऐसा क्यों लग रहा है कि हिंसक विवाद (violent controversy) की दागदार देग को खौलती आग को लगातार ईंधन प्रदान किया जा रहा है? पहले राजनेता (politician) इस विवाद को तूल देते रहे और अब आम लोग भी इसमें किसी टूल की तरह इस्तेमाल होने लगे हैं। सोशल मीडिया (social media) पर कोई आम आदमी खरगोन को लेकर भड़काऊ बात कहता है और फिर इस मसले को नफरत के मसाले में लपेटकर और अधिक विवाद का तड़का लगाने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं।

विवाद की आग गर्मी के दिनों में झुलसा देने वाली मरुभूमि राजस्थान (Rajasthan) तक पहुंच गयी है। वहां के मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत (Chief Minister Ashok Gehlot) ने कहा है कि किसी के दोषी साबित होने से पहले उसके निर्माण को ढहाने का अधिकार किसी मुख्यमंत्री (CM) तो दूर, स्वयं प्रधानमंत्री (PM) तक के पास नहीं है। तो गेहलोत जी लगे हाथ यह भी बता दें कि क्या ‘भय बिन प्रीत न होय’ वाले तत्व को बिसरा दिया जाए? बदमाशों के अतिक्रमण ढहाने का काम तो कांग्रेस की सरकारों (Congress governments) ने भी किया है, जिस पर कभी भी कोर्ट ने रोक नहीं लगाई। जाहिर है कि कोर्ट ने भी सरकारों के ऐसे काम को गलत नहीं, बल्कि कानून-सम्मत माना है। यदि देश की आबादी कम करने के नाम पर हजारों लोगों की जबरिया नसबंदी कर दिए जाने के कदम को भी सही ठहराया जा सकता है, तो फिर कानून-व्यवस्था (Law and order) को लागू करने के लिए कानून के खौफ को कायम रखने वाली बात तो नि:संदेह रूप से सही ही कही जाएगी।

इस घटनाक्रम पर दिग्विजय सिंह बनाम नरोत्तम मिश्रा (Digvijay Singh V/s Narottam Mishra) वाले द्वन्द में अब कैलाश विजयवर्गीय (Kailash Vijayvargiya) भी कूद पड़े हैं। क्या यह सब होना चाहिए? इससे भी बड़ा सवाल यह कि यह सब क्यों होना चाहिए? किसी राज्य के एक शहर में विवाद हुआ। हिंसा हुई। तो क्या आवश्यक है कि उसकी रबर को यूं लगातार खींचा जाए? क्यों ऐसा नहीं हो रहा कि कानून को अपना काम करने दिया जाए और कोशिश हो कि बाकी स्तर पर बीती ताही बिसार दे, वाली नीति अपनाकर माहौल को सामान्य बनाने का प्रयास किया जाए?

इस विषय पर social media की गतिविधियां तो दहलाने लगी हैं। क्योंकि इस प्लेटफॉर्म पर कोई मध्यममार्गी अप्रोच (medium approach) नजर ही नहीं आ रही। खुलकर दो ही काम हो रहे हैं। या तो खरगोन की हिंसा (Khargone Violence) के लिए अलग-अलग समुदाय के लोग एक-दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं और या फिर आरोपियों की पैरवी करने का क्रम जोरों पर है। एक तीसरा पक्ष भी है, जो आरोपियों के खिलाफ सरकार की कार्यवाही (Government action against the accused) को कहीं सही तो कहीं गलत ठहरा रहा है। लेकिन इस सब के बीच वह स्वर या विचार नक्कारखाने की तूती बराबर भी सुनाई नहीं दे पा रहे, जिनमें यह फिक्र हो कि इस मामले के इस तरह से अनावश्यक जिक्र से माहौल और अधिक खराब होने के अलावा कुछ भी नहीं हो रहा है।

खरगोन की हिंसा के बाद अब दिख रही वैचारिक हिंसा गंभीर मामला है। क्योंकि यह बता और जता रहा है कि सोशल मीडिया पर भी विचार की प्रक्रिया अनाचार वाला विकृत रूप ले चुकी है। सोचने-विचारने के मसले की दुनिया में कभी भी कमी नहीं रही है। वह भी ऐसे विषय, जो हमारे आज से लेकर आने वाले कल तक को सीधे-सीधे प्रभावित करते हैं। मसलन, हम इस तरफ ध्यान क्यों नहीं दे रहे कि इस समय पड़ रही आग जैसी गर्मी दरअसल हमारे द्वारा प्रकृति के अंधाधुंध दोहन का ही नतीजा है और यदि हम आज भी नहीं संभले तो यह तापमान उस हद तक पहुंच जाएगा, जिसकी हम आज शायद कल्पना भी नहीं कर सकते हैं? हम क्यों विचार प्रक्रिया कर रुख इस विषय की तरफ नहीं मोड़ पा रहे कि रूस और यूक्रेन के संघर्ष (Russia and Ukraine conflict) से वैश्विक शांति के प्रयासों को कायम रखने की आवश्यकता कितनी अधिक बढ़ चुकी है? श्रीलंका की आर्थिक श्री उससे छिन चुकी है। लेकिन हम इस दिशा में चिंतन के लिए रुचि ही नहीं ले रहे कि किसी राष्ट्र या प्रदेश का कर्ज का मर्ज किस तरह अंतत: उसके नागरिकों पर ही भारी पड़ता है।

फिर स्थानीय तौर पर तो विचार के बहुत बड़े बिंदु इस समय पूरी तरह मौजू हैं। अल्पसंख्यक समाज (minority society) को सोचना चाहिए कि केंद्र की भाजपा सरकार से लेकर इस दल के शासन वाले राज्यों में सत्ता के लिए उसके गुस्से की आखिर वजह क्या है? एक भी ऐसा उदाहरण नहीं है, जहां केंद्र से लेकर किसी भाजपा-शासित राज्य की सरकारी योजना (BJP-ruled state government scheme) का लाभ देने में अल्पसंख्यकों (minorities) के साथ भेदभाव किया जा रहा हो। बल्कि दक्षिणपंथ के लिए कट्टरता की हद तक का आग्रह रखने वाले तो नरेंद्र मोदी की इस बात के लिए खुली आलोचना कर रहे हैं कि वह मुस्लिम समुदाय के लिए अधिकांश मामलों में बहुत अधिक उदारता बरत रहे हैं। तो फिर इस वर्ग का भाजपा के लिए इतना बैर क्यों? मुस्लिमों को सोचना होगा कि यदि देश की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति (BJP) उन्हें अपनी नहीं लगती है तो फिर इस ताकत के साथ जुड़ने के लिए आखिर उन्हें क्या करना चाहिए? भाजपा को भी चिंतन करना होगा कि मुस्लिम समुदाय को अपने साथ वह किस तरह जोड़ सकती है? विचार इस बात पर भी होना चाहिए कि मुसलमान जिन दलों को अपना मानते हैं, उन्होंने इस वर्ग को सही मायने में आगे बढ़ाने के लिए आज तक क्या किया है? क्यों ऐसा हुआ कि जम्मू कश्मीर को छोड़ कर पिछले चालीस सालों में किसी भी राज्य में मुस्लिम मुख्यमंत्री (Muslim Chief Minister) नहीं बना है। इससे पहले भी पांडेचरी में 1967 में केवल ग्यारह महीने के लिए, राजस्थान (Rajasthan) में 54 दिन के लिए, बिहार (Bihar) में 21 महीने और असम (Asam) में छह महीने के लिए मुस्लिम मुख्यमंत्री बने जो सभी कांग्रेसी थे। अब्दुल रहमान अंतुले महाराष्ट्र (Abdul Rehman Antulay Maharashtra) में उन्नीस महीने के लिए कांग्रेसी मुख्यमंत्री (Congress Chief Minister) रहे। यानि कांग्रेस ने जिन राज्यों में मुख्यमंत्री बनाए भी तो कोई भी अपना एक कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाया। केरल में गैर कांग्रेसी मुस्लिम मुख्यमंत्री का कार्यकाल केवल 54 दिन रहा। आखिर क्यों कोई भी मुस्लिम मुख्यमंत्री अपना एक कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। किसलिए करीब पचास साल के शासन में कांग्रेस एक ऐसा अदद मुस्लिम चेहरा (muslim face) नहीं तलाश तथा तराश पाई, जिसे PM पद पर आसीन किया जा सके? क्यों आज कांग्रेस में कोई मुस्लिम आबादी में प्रभावी हो सकने वाला एक भी बड़ा नेता नहीं है। यह सब विचार के विषय हैं, लेकिन उनकी तरफ साजिशन ध्यान जाने ही नहीं दिया जा रहा है।

एक अद्भुत फिल्म है, ‘बाघ बहादुर।’ इसकी समीक्षा में यह तथ्य समान रूप से सामने आता है कि यह चित्र समाज में हिंसा को लोकप्रियता की हद तक स्वीकार्यता मिलने के कटु सत्य को उजागर करता है। वर्तमान के हालात इसी बात की तरफ संकेत करते हैं। विषय अनंत हैं, लेकिन चर्चा उनके केवल उस पक्ष की होती है, जो उग्र हो। जो उकसावे का माहौल बनाता हो। जिस फिल्म की मैंने बात की उसमें एक आदमी बाघ का स्वांग रचता था और जिस समाज की आज बात हो रही है उसमें कई बाज इंसान का स्वांग रचकर वातावरण की कलुषिता को बढ़ाने की साजिशों से बाज नहीं आ रहे हैं। आखिर हम कहां जा रहे हैं?

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