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पुलिस ने सुलझा दिए शराब के 40 केस, हाईकोर्ट ने पूछा सवाल तो खुली पोल

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बिहार में शराबबंदी कानून के दुरुपयोग को लेकर पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है।

अदालत ने बिना किसी पुख्ता सबूत या शराब की बरामदगी के, केवल ‘शराब जैसी गंध’ आने के संदेह पर एक ट्रक को अवैध रूप से जब्त करने के मामले में सरकार को 2.15 लाख रुपये का हर्जाना भुगतने का आदेश दिया।

न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति कुमार मनीष की खंडपीठ ने पीड़ित ट्रक मालिक राजेश कुमार यादव की रिट याचिका पर ये सख्त फैसला सुनाया।

इस मामले ने बिहार पुलिस की कार्यप्रणाली और कानून की समझ पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

शराब की गंध के संदेह में ट्रक जब्त करना पड़ा महंगा

ये पूरा मामला गोपालगंज जिले का है, जहां तत्कालीन दारोगा सतेंद्र कुमार राय ने शराबबंदी कानून का हवाला देते हुए एक ट्रक को जब्त कर प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर ली थी।

पुलिस की इस पूरी कार्रवाई की अजीब बात ये थी कि उस ट्रक से एक बूंद भी शराब बरामद नहीं हुई थी।

दारोगा का तर्क था कि ट्रक के केबिन से शराब जैसी गंध आ रही थी, इसलिए उन्होंने यह कदम उठाया। हाईकोर्ट ने पुलिस की इस अतार्किक और मनमानी कार्रवाई पर गहरी नाराजगी व्यक्त की।

जिस दारोगा ने अपने जवाबी हलफनामे में 40 शराबबंदी मामलों की जांच करने का दावा किया है, उसने कानून के प्रावधानों को पढ़ा तक नहीं है।

दारोगा ने कोर्ट में माना- नहीं पढ़ा कभी शराबबंदी कानून

सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ, जिसने पुलिस महकमे की पोल खोलकर रख दी। जब खंडपीठ ने दारोगा सतेंद्र कुमार राय से शराबबंदी कानून के बुनियादी प्रावधानों के बारे में पूछा, तो उन्होंने साफ स्वीकार किया कि उन्होंने कभी इस कानून का अध्ययन ही नहीं किया है।

अदालत ने इस बात पर घोर आश्चर्य जताया कि जिस दारोगा ने अपने जवाबी हलफनामे में शराबबंदी से जुड़े 40 मामलों की जांच करने का दावा किया था, उसने मूल कानून को पढ़ा तक नहीं था।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए गोपालगंज के पुलिस अधीक्षक (SP) को कोर्ट ने इस पर संज्ञान लेने को कहा, जिसके बाद एसपी ने दोषी पुलिसकर्मियों पर प्रशासनिक कार्रवाई का भरोसा दिया।

याचिकाकर्ता को मुआवजे के साथ केस का खर्च देने के आदेश

अदालत ने पीड़ित राजेश यादव के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को मानसिक और आर्थिक परेशानी के लिए 2 लाख रुपये का मुआवजा दें। इसके साथ ही, अदालत ने मुकदमेबाजी के खर्च के रूप में 15 हजार रुपये अतिरिक्त देने का आदेश दिया।

हाईकोर्ट ने ये भी साफ कर दिया कि अगर जब्त रहने के दौरान ट्रक में कोई टूट-फूट या मशीनी खराबी आई हो, तो उसकी पूरी मरम्मत का खर्च भी सरकार ही उठाएगी।

दोषी पुलिसकर्मियों की जेब से वसूला जाएगा हर्जाना

हाईकोर्ट ने इस मामले में केवल सरकार पर जुर्माना लगाकर ही बात खत्म नहीं की, बल्कि जवाबदेही भी तय की है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा है कि याचिकाकर्ता को दी जाने वाली हर्जाने की ये पूरी राशि (2.15 लाख रुपये और मरम्मत का खर्च) किसी सरकारी कोष से नहीं, बल्कि इस पूरी अवैध कार्रवाई के लिए जिम्मेदार दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन या जेब से वसूल की जाएगी, ताकि भविष्य में कानून का ऐसा दुरुपयोग न हो।

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