Sunday, May 26, 2024

लोकतंत्र की आस्तीन के ये विषधर

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टेलीविजन पर मुनव्वर राना (Munawwar Rana) का तालिबानी तराना (Talibani Tarana) सुन रहा हूं। तौबा, ये क्या, तो ये हैं असली मुनव्वर राना। आप सब भी देख ही रहे होंगे। उनका वह मुखौटा शायद कहीं खो गया है, जिसे पहनकर पिनक में राना मंच पर मां की महिमा का बखान करते-करते भरपूर नौटंकी वाले अंदाज में भावुक होने की कोशिश भी कर लेते थे। अब वह उन तालिबानियों का गुणगान (praise of Taliban) कर रहे हैं, जिनके आतंक से अफगानिस्तान (Afghanistan) में हजारों माएं कांप रही हैं। इनमें वह मां भी शामिल है, जो एयरपोर्ट पर अपनी दुधमुंही बच्ची को तालिबानियों के अत्याचार से बचाने के लिए एक अनजाने ब्रिटिश सैनिक (British soldiers) के पास फेंक देने पर विवश हो गयी। इस विवशता को राना के भीतर का विष देख नहीं पा रहा है और उसे समझने की तो खैर अब उनसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती है।

वो स्वरा भास्कर (Swara Bhaskar), सोनम कपूर (Sonam Kapoor), महबूबा मुफ्ती (Mehbooba Mufti) और इन जैसे तमाम चेहरे भी स-शरीर तथा स-आत्मा किसी गहरी मांद में जा छिपे लगते हैं, जो भारत में बीते करीब सात साल में हुए किसी भी अपराध के लिए छाती पीटते हुए हिंदुत्व (Hindutva) और राष्ट्रवाद (nationalism) को गरियाने से नहीं चूकते थे। विजय राज आज पराजित कायर जैसा आचरण कर रहे हैं। जो आदमी खुलेआम अपने देश के लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रधानमंत्री (PM) से नफरत की बात कहता था, वह आज अफगनिस्तान में घोर अलोकतांत्रिक तरीके से सत्त्ता को हड़पने वाले तालिबान की करनी पर चुप है। क्या सांपों को भी सांप सूंघ गया है? मौलाना मुलायम सिंह यादव (Maulana Mulayam Singh Yadav) के लख्ते-जिगर शफीकुर्रहमान बर्क (Shafiqur Rahman Burke) हों या हों आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (All India Muslim Personal Law Board) के सदस्य सज्जाद नोमानी (Sajjad Nomani), इन्हें अफगानिस्तान में मानव अधिकारों का दानव बनकर हनन कर रहे तालिबानियों को देखकर खुशी मिल रही है। असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) भी इसी श्रेणी में खड़े होकर अपनी विशिष्ट मानसिकता का प्रदर्शन कर रहे हैं। इनमें से कई मूर्ख तो तालिबान की आरएसएस (RSS) से तुलना भी कर रहे हैं। फिर भी ये मनचाहा प्रलाप कर रहे हैं तो इसलिए कर पा रहे हैं क्योंकि जिस जमीन पर इन्होंने जन्म लिया है वहां की संस्कृति और धर्म सबकों सहन करने में सक्षम हैं।

इस सभी के साथ सोशल मीडिया (social media) पर भी ऐसे संदिग्ध निष्ठा वाले भारतीयों की भी कमी नहीं है, जो तालिबान के अत्याचारों को इस देश में लॉकडाउन (lockdown) के समय मची आपाधापी से जोड़कर विदेशी जमीन पर चल रहे अमानवीयता के नंगे नाच को जस्टिफाई कर रहे हैं। कांग्रेस (Congress) के चुके हुए बारूद नटवर सिंह (Natwar Singh) कह रहे हैं कि अब Taliban पहले जैसा अत्याचारी नहीं रहा। धन्य हुए नटवर सिंह। टीवी पर जो कुछ दुनिया देख रही है, उसे नजरंदाज कर ये पूर्व विदेश मंत्री तालिबान को उत्कृष्ट चरित्र का प्रमाण पत्र दे रहे हैं। सिंह की किताब ‘वन लाइफ इस नॉट इनफ (‘One Life Is Not Enough’) ‘ है। अब वह तालिबान के पक्ष में शायद एक और किताब ‘वन लाइफ इस इनफ’ लिख देंगे। जिसमें वह बताएंगे कि यदि तालिबानी मंसूबों को वैश्विक प्रसार दिया जाना है तो फिर आम आदमी को एक बार जी कर तालिबान के हाथों ही प्राणों का उत्सर्ग कर स्वयं का जीवन धन्य मान लेना चाहिए।

मुनव्वर राना ऐसे ही लोगों की मानसिकता के प्रतिनिधि हैं, जो जताते हैं कि इस देश में चन्दन की पवित्रता वाले लोकतंत्र की आस्तीन में कितने विषधारी कुंडली मारे बैठे हुए हैं। किसी बड़ी आपदा के समय रक्तदान करने की किसी भी स्वच्छ तथा स्वस्थ समाज में परंपरा रही है। मगर ये तबका वह है, जिसके लिए कहा जा सकता है कि वह तालिबान की ताकत बढ़ाने के लिए अघोषित रूप से भारत में बैठकर विष-दान अभियान चला रहा है। वैश्विक स्तर पर यह सन्देश दे रहा है कि किस तरह अहिंसा परमो धर्म वाले देश की सरजमीं पर ‘हिंसा ही इकलौता धर्म’ वाली तालिबानी मानसिकता तथा करतूतों को समर्थन प्रदान किया जा रहा है। यह ऐसे लोगों की समझ का फेर नहीं है। बल्कि यह उनकी समझ का वह अंधेर है, जिसे उन्होंने स्वेच्छा से अपनाया है। और ये सभी अपने इस विषैले कुनबे को और फैलाने के अभियान में जुटे हुए हैं। ये वो लोग हैं जो इजराइल (Israel) द्वारा फिलिस्तीन (Palestine) पर किये गए जवाबी हमले पर बुक्का फाड़कर रोते हैं। ये लोग वो भी हैं, जो तालिबान के जुल्मो-सितम से कराह रही मानवता के लिए अपने आंसू की एक बूंद भी खर्च करने से परहेज बरत रहे हैं। और ऐसा करने की केवल एक वजह है। ये समूह भारत में तालिबान की तर्ज पर ही सही, राष्ट्रवाद के खिलाफ माहौल बनाना चाहते हैं।

जिस गलत का दुनिया की अधिसंख्य आबादी विरोध कर रही है, उसे ये लोग सही ठहरा रहे हैं। अपनी वैचारिक शक्ति का इतना कुत्सित और बेशर्म किस्म का इस्तेमाल ये भला कैसे कर लेते हैं! अंतरात्मा नामक कोई तत्व क्या इनके भीतर कभी था ही नहीं, या फिर इन्होंने स-प्रयास उसका खुद ही गला घोंट डाला है?

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