Wednesday, May 22, 2024

बनर्जी की भाजपा से हिंसक एलर्जी

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देश की न्याय व्यवस्था (judicial system) में आम जनता का यकीन और और बढ़ गया है। पश्चिम बंगाल (West Bengal) में मौजूदा वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव (Assembly elections) के बाद हुई व्यापक हिंसा (Violence) की जांच सीबीआई (CBI) करेगी। राज्य की कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) ने गुरूवार को यह फैसला सुनाया है। निश्चित ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee) के लिए यह एक बड़ी असुविधाजनक स्थिति है। जो तथ्य सामने आये हैं, उनसे इस बात में कोई संदेह नहीं दिखता है कि यह हिंसा राज्य सरकार ने प्रायोजित की। उसके इशारे पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लोगों ने राज्य की उस निर्दोष आबादी को निशाना बनाया, जिनका दोष यह माना गया कि उन्होंने चुनाव में भाजपा का साथ दिया या उसका समर्थन किया।

विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद पश्चिम बंगाल में जो कुछ दिखा, उसे अफगानिस्तान (Afghanistan) पर कब्जा करने वाले आतंकी संगठन तालिबान (terrorist organization taliban) की मौजूदा करतूतों और उसके अतीत से बेहिचक जोड़ा जा सकता है। आप यदि निरपेक्ष दृष्टि से तुलनात्मक अध्ययन करें तो यह तय करना आपके लिए बहुत कठिन हो जाएगा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तथा उनकी तृणमूल और अफगानिस्तान में बारादर और उसके तालिबानी गुर्गों में से ज्यादा क्रूर किसे कहा जाना चाहिए। ममता की चश्मे के पीछे वाली आंखों से विरोधियों के लिए टपकती (‘लपकती’ भी कह सकते हैं) नफरत तथा उनके चेहरे की झुर्रियों से झांकते हिंसक प्रतिशोध को आसानी से समझा जा सकता है। चुनाव के बाद असम सहित पश्चिम बंगाल से लगे भाजपा शासन (BJP rule) वाले अपनी राज्यों में जिस तरह आबादी ने पनाह ली, वह कश्मीर में 90 के दशक में हिन्दू आबादी पर बरपाये गए कहर की दर्दनाक यादों को दोहराने के लिए पर्याप्त था। औरतों के साथ ज्यादती की गयी। उन पर अन्य किस्म के भी अत्याचार हुए। आदमियों को बेरहमी से पीटा गया। उस पर स्थिति यह भी कि जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission) की टीम हिंसा की जांच के लिए कोलकाता गयी तो उस पर भी हमले हुए। टीम के सदस्यों को पुलिसिया अंदाज में धमकाया गया। वो सभी वीडियो फुटेज देखकर ये यकीन करना मुश्किल हो जाता रहा कि यह इराक या सीरिया नहीं, बल्कि भारत देश का ही मामला है। यह कहना गलत नहीं होगा कि शायद ममता को अपनी सरकार के खिलाफ किसी बड़े संवैधानिक कदम का डर रहा होगा, वरना तो पश्चिम बंगाल के राज्यपाल भी किसी पड़ोसी राज्य में शरण लेने के लिए मजबूर हो जाते।

ऐसे हालात की वजह ही है कि कलकत्ता हाईकोर्ट ने CBI जांच को फुल प्रूफ बनाने में अपने स्तर पर कोई कसर नहीं छोड़ी है। अदालत चाहती तो जांच सीबीआई को देने तक की व्यवस्था तक ही सीमित रहती। लेकिन उसने दोषियों की तगड़ी घेराबंदी का पूरा बंदोबस्त किया है। यह जांच हाई कोर्ट की निगरानी में होगी। इसलिए इस जांच के मामले में सीबीआई के केन्द्र सरकार के प्रभाव में रहने के आरोपों को भी बल नहीं मिलेगा। एक विशेष जांच दल हिंसा तथा अत्याचारों की शिकायतों की जांच करेगा। इस दल की निगरानी सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज (retired judge of supreme court) को दी जाएगी। जाहिर है कि व्यवस्था की खामियों वाले तमाम सुराखों को कलकत्ता हाई कोर्ट ने बंद करके दोषियों की सांस घोंटने का तगड़ा इंतजाम कर दिया है। इस फैसले पर अब ममता के चीखने चिल्लाने का से भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

मामला यहीं तक सीमित नहीं रह जाता। ममता की सरकार ने हिंसा पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की जांच को पक्षपाती करार दिया था। कोर्ट ने सरकार की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने ममता की सरकार को आदेश दिया है कि वह तत्काल हिंसा से पीड़ितों को मुआवजा दें। शायद न्यायालय भी पीड़ितों की मदद के मामले में राज्य सरकार के ढुलमुल रवैये से असंतुष्ट है। सुश्री बनर्जी अब क्या करेंगी? क्या वे अब अपने राज्य की न्यायपालिका (Judiciary) को भी ‘बीजेपी का एजेंट’ (agent of bjp) ठहरा देंगी! खिसियाहट में इंसान कुछ भी कर गुजरता है। फिर बनर्जी की खिसियाहट तो खम्भा नोचने या उसे गीला करने से भी आगे वाली बात है। वह अपने राज्य में सेना द्वारा तख्तापलट की साजिश रचने वाला खासा मनोरंजक आरोप लगा चुकी हैं। राज्य में BJP के बढ़ते जनाधार से खीझकर बनर्जी एक चुनावी सभा में ‘नड्डा-बड्डा’ जैसी बात कहकर खुद को विदूषक के रूप में भी जनता के सामने प्रस्तुत कर चुकी हैं। तो अब आगे उनसे कुछ ऐसे ही और स्टैंड अप कॉमेडियन छाप व्यवहार की उम्मीद करना बेमानी नहीं होगा।

ममता ने अपनी सरकार के प्रति जनता के प्रतिरोध का जवाब जिस प्रतिशोध से देने की कोशिश की, वह अब उन पर भारी पड़ता दिख रहा है। वह इस तथ्य को पचा ही नहीं पा रही हैं कि उनके राज्य में उनकी सर्वाधिक नफरत की पात्र भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उनके राज्य की विधानसभा में 74 सीटें हासिल कर लीं। ममता के पेट में यह मरोड़ तो खैर वर्ष 2019 से ही उठ रही है, जब हुए आम चुनाव में भाजपा ने उनके राज्य में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को कांटे की टक्कर देते हुए 18 सीटें हासिल कर ली थीं। अब उस राज्य का राजनीतिक परिदृश्य खालिस रूप से तृणमूल-बनाम भाजपा वाला हो चुका है। BJP के तगड़े संगठन की तैयारी अब अगली बार सरकार बनाने की योजना वाले मोड में पहुंच चुकी है। इसी से बौखला कर ममता ने चुनाव के बाद जो तांडव रचा अब वह इस सियासी महाभारत में तृणमूल को कौरव और भाजपा को पांडव वाली स्थिति में ला चुका है। ममता बनर्जी की भाजपा समर्थकों से इस हिंसक एलर्जी को सारा देश जानता है, अब देखना यह है कि इस को कोर्ट क्या मानती है।

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