कभी ममता बनर्जी के बेहद क़रीबी रहे सुवेंदु अधिकारी अब बंगाल में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री होंगे. भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद पार्टी ने मुख्यमंत्री के तौर पर अधिकारी के नाम की घोषणा कर दी है. यह फैसला पार्टी के विधायक दल की बैठक में लिया गया, जिसकी घोषणा केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने की.
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ऐतिहासिक जीत के बाद पार्टी ने मुख्यमंत्री के तौर पर सुवेंदु अधिकारी के नाम की घोषणा कर दी है. यह फैसला पार्टी के विधायक दल की बैठक में लिया गया, जिसकी घोषणा केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने की.
मालूम हो कि राज्य में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को 207 सीटें मिली हैं, जो कि दो तिहाई बहुमत से अधिक है, जबकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) महज़ 80 सीटों पर आ गई है.
सुवेंदु अधिकारी ने खुद भवानीपुर सीट पर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को 15 हज़ार से अधिक वोटों से हरा दिया. जबकि नंदीग्राम सीट पर लगातार तीसरी बार जीत हासिल की है.
उल्लेखनीय है कि सुवेंदु अधिकारी इस समय पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाजपा का सबसे प्रमुख चेहरा बने हुए हैं. वे राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता भी हैं. हालांकि यही सुवेंदु साल 2020 तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बेहद क़रीबी और नंबर दो माने जाते थे. वे ममता सरकार में प्रभावशाली मंत्री पदों पर भी रहे. लेकिन पार्टी में अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव ने उनको धीरे-धीरे हाशिए पर पहुंचा दिया, जिसके बाद 2021 के चुनाव के ठीक पहले वह भाजपा में शामिल हो गए.
उनकी राजनीतिक अहमियत पूर्वी मेदिनीपुर जैसे ज़िलों में मज़बूत संगठनात्मक पकड़ और अहम सीटों पर समर्थन जुटाने की क्षमता से है. उन्होंने भाजपा में शामिल होने के क़रीब चार महीने के भीतर हुए 2021 विधानसभा चुनाव में पार्टी को तीन से 77 सीटों तक पहुंचा दिया था.
सुवेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी के बीच टकराव राज्य की राजनीति में सबसे चर्चित घटनाक्रम रहा है. दोनों नेता अक्सर एक-दूसरे पर तीखे हमले करते रहे हैं.
गौरतलब है कि सुवेंदु अधिकारी का नाता एक समृद्ध राजनीतिक परिवार से है. पूर्व मेदिनीपुर ज़िले को अधिकारी परिवार का गढ़ माना जाता है. सुवेंदु के पिता और भाई भी तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा और विधानसभा चुनाव जीतते रहे हैं. उनके पिता शिशिर अधिकारी तीन बार के सांसद रहे हैं.
सुवेंदु के राजनीतिक करियर की बात करें, तो उनकी शुरुआत छात्र राजनीति से कांथी स्थित पीके कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान हुई थी. वह 1989 में कांग्रेस के छात्र संगठन के प्रतिनिधि चुने गए थे. इसके बाद 36 साल की उम्र में पहली बार 2006 में कांथी दक्षिण सीट से तृणमूल कांग्रेस की टिकट पर विधायक चुने गए.
वर्ष 2009 में उन्होंने तमलुक सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीते. 2014 के चुनावों में भी उन्होंने अपनी सीट पर क़ब्ज़ा बनाए रखा. इसके बाद 2016 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने नंदीग्राम सीट से चुनाव जीता और ममता मंत्रिमंडल में परिवहन मंत्री बनाए गए. धीरे-धीरे उनको सरकार में नंबर दो माना जाने लगा था.
सुवेंदु को साल 2007 में नंदीग्राम के अधिग्रहण विरोधी आंदोलन से एक कद्दावर नेता की छवि मिली. उनकी तत्कालीन वाममोर्चा सरकार के खिलाफ भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमिटी के बैनर तले स्थानीय लोगों को एकजुट करने में अहम भूमिका मानी जाती है.
तृणमूल से नाता तोड़ने को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि वे अपनी महत्वाकांक्षा के कारण पार्टी से अलग हुए. वहीं, कई लोगों ने इसे भ्रष्टाचार के कई मामलों में कथित संलिप्तता के चलते ईडी और सीबीआई की कार्रवाई से बचने की कोशिश भी बताया.



