Sunday, May 26, 2024

‘रस्ते का माल सस्ते में’ वाली पत्रकारिता

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यह दमित कुंठाओं के विस्तार का अद्भुत तरीका है। गजब का बुद्धि विलास है। रविश कुमार (Ravish Kumar) के पेट में मरोड़ उठ रही है। वह दैनिक भास्कर (Dainik Bhaskar) को ट्विटर (Twitter) पर खरी-खोटी सुना रहे हैं। दिल्ली (Delhi) में बैठकर उन्होंने पाया कि भास्कर के वहां के संस्करण ने इंदौर में सेक्स रैकेट (sex racket in indore) की एक खबर को दबा दिया है। मामले में आरोपी भाजपा (BJP) से जुड़े नेता हैं। चुनांचे कुमार को यह नागवार गुजरा कि खबर को उनके माइंडसेट (Mindset) के हिसाब से स्थान नहीं दिया गया।

यह गुस्सा इतना उफना कि कुमार ने यह तक लिख दिया कि हिन्दू राष्ट्र (Hindu Rashtra) के विशाल लक्ष्य को साकार करने का काम इंदौर में थाईलैंड (Thailand) की लड़कियां (girls) कर रही थीं। लिहाजा टीवी (TV) के इस महान पत्रकार ने उपसंहार में अखबार के पाठकों (newspaper readers) को यह उलाहना भी दे दिया कि वह कैसे एक रद्दी अखबार खरीद रहे हैं। इस लिहाज से मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि दिल्ली दंगों (Delhi Dangon) के दौरान केवल मुस्लिम परिवारों (Muslim families) को भयाक्रांत बताने वाले इसी अखबार का वह अंक रविश ने अपने पूजा स्थल पर विराजित किया होगा। केवल हिन्दू त्योहारों (Hindu festivals) की कमियां गिना कर सुधार का ठेका लेने वाले वाले भास्कर (Bhaskar) के अभियान की प्रतियों का भी वह नियम से सजदा करते होंगे।

भास्कर को यूं ही खुद की निंदा सुनने की आदत नहीं है। यह उसके लिए बदहजमी के चरम वाली स्थिति होती है। इसलिए रविश को तुरंत ही अखबार का दिल्ली में काम देखने वाले ने पत्रकार (Journalist) ने तत्काल जवाब दिया। सफाई के रूप में। लिखा कि इंदौर में यह समाचार प्रथम पृष्ठ (first page) पर प्रकाशित किया गया है। बदहजमी की खट्टी डकार की गंध रविश की तरफ यह लिखकर प्रसारित कर दी गयी कि कुमार एकतरफा विश्लेषण (Analysis) करने से पहले चश्मा उतारकर खबर का विश्लेषण कर लिया करें। मुझे हैरत इस बात की है कि रविश ने इस बात के लिए भास्कर की सराहना क्यों नहीं की है कि उसने एक खबर को पूरी तरह उनकी मंशा के अनुरूप ही ट्रीटमेंट (treatment) दिया।

वह समाचार भास्कर में पूर्णत: हाशिये पर धकेल दिया गया था कि मालेगांव धमाके (Malegaon blast) के एक गवाह पर योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) का नाम मामले से जोड़ने के लिए दबाव बनाया गया था। संभवत: कुमार ने पत्रकारिता के इस स्वेच्छाचारिता वाले स्वरुप पर यह सोचकर प्रतिक्रिया नहीं दी होगी कि ऐसा करना तो मीडिया का धर्म (‘धर्म’ शब्द के प्रयोग पर रविश कुमार जी कृपया मुझे माफ करें) ही है।

रविश कुमार ने हिन्दू राष्ट्र (Hindu Rashtra) की बात को देह व्यापार (deh vyapar) की आरोपी विदेशी लड़कियों से जोड़ दिया। इस मामले में उनकी ताने-बाने बुनने की कल्पनाशक्ति गजब है। पूर्व में वह JNU के छात्र आंदोलन को हांगकांग (Hong Kong) में उस समय लोकतंत्र (Democracy) के नाम पर चल रहे हिंसक आंदोलन (violent movement) से जोड़ चुके हैं। तब वह प्राइम टाइम (prime time) में यह बारूद बिछाने की पूरी कोशिश में जुटे थे कि हांगकांग से प्रेरणा लेकर देश के छात्रों को वैसी ही हिंसा (Violence) करनी चाहिए। कुमार के दुर्भाग्य और देश के सौभाग्य से उनका यह मंसूबा पूरा नहीं हो सका। वरना तो उस समय की ऐसी लगातार कोशिशों से यह अंतर करना मुश्किल हो गया था कि यह प्राइम टाइम का मामला है या क्राइम टाइम (crime time) का?

दरअसल दिल्ली के चर्चित चेहरे अब अपनी लोकप्रियता को पचा नहीं पा रहे हैं। यह अपच इस तरह के लाट साब वाले रूप में सामने आने लगी है। कोई ‘ मुझको यारों माफ करना….’ की तर्ज पर एक महान शख्सियत के निधन को लेकर गम गलत कर रहा है। तो कोई एक फिल्म अभिनेता की मौत के बाद ‘मुझे ड्रग्स (Drugs) चाहिए’ वाली हाहाकारी पत्रकारिता करने पर पिल पड़ता है। किसी को पत्रकार के रूप में कमल के फूल का प्रवक्ता (Spokesman) बनने में गौरव है तो किसी ने इस फूल के लिए शूल बनने में अपना जीवन धन्य मान लिया है।

सब के सब विचारक में बदल गए हैं। पत्रकारिता के अलग-अलग डिपार्टमेंटल स्टोर (departmental store) की अपनी-अपनी गद्दी पर बैठकर सब ज्ञान का प्रसाद बांट रहे हैं। वो डिपार्टमेंटल स्टोर, जहां सच्ची पत्रकारिता को ‘रस्ते का माल सस्ते में’ वाली शेल्फ में बंद कर दिया गया है। यह दंभ इस मिथ्याभिमान और आत्मरति को जन्म देता है कि हम जो कहेंगे, वही होना चाहिए। हम जो दिखाएंगे, केवल वही सच माना जाए। हम जो कहेंगे, उसे ही ब्रह्मनाद की तरह सनातन सत्य मानकर अंगीकार किया जाए।

एक पत्रकार होने के नाते इस मिशन की वास्तविक अवधारणा के लिए मैं बहुत सम्मान रखता हूं, लेकिन एक बात कहे बगैर रहा नहीं जा रहा। वह यह कि ऐसे स्वयंभू ज्ञानियों की वजह से पत्रकारिता अलग-अलग खांचों में विभक्त कर दी गयी है। अखबार से लेकर टीवी चैनल (TV Channel) इस हद तक बेशर्मी को ओढ़ चुके हैं कि उनका मकसद पत्रकारिता करने की बजाय अपने-अपने आका राजनीतिक दलों (Political parties) के एजेंडे को दर्शकों पर थोपना है। इसे अतिश्योक्ति मत मानिए। खुद मन में तीन से चार प्रमुख समाचार पत्र और न्यूज चैनल के नाम लीजिये। आप खुद पाएंगे कि इनमें से लगभग सभी एक तरह से भोंपू बनकर रह गए हैं। ऐसे में अपने-अपने कुनबे के विस्तार के लिए बाकी समाचार माध्यमों को हिदायत देने की हिमाकत करने का काम तो शुरू होगा ही। रविश कुमार बनाम दैनिक भास्कर वाला ट्विटर (Dainik Bhaskar’s Twitter) पर चला यह प्रहसन इसकी ही एक बानगी है।

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