भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के नेतृत्व में पार्टी ने बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे दो बड़े राज्यों में पहली बार अपना मुख्यमंत्री देने का राजनीतिक कीर्तिमान बनाया।
इससे संगठनात्मक नेतृत्व की उनकी क्षमता को राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली। लेकिन उसी नेतृत्व के सामने अब बिहार के बांकीपुर और मध्यप्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव चुनौती बनकर उभरे हैं।
बिहार के बांकीपुर में नामांकन के बाद उम्मीदवार बदलना पड़ा, जबकि मध्यप्रदेश के दतिया में नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटने से पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ गया। ऐसे में बड़ी चुनावी सफलताओं के बाद उपचुनावों में सामने आई ये मुश्किलें नितिन नवीन की संगठनात्मक रणनीति की भी परीक्षा बन गई हैं।
नितिन नवीन के सामने अब पहली बड़ी चुनावी परीक्षा बिहार और मध्यप्रदेश के उपचुनाव हैं। यह परीक्षा केवल दो विधानसभा सीटों पर जीत-हार की नहीं, बल्कि उनके नेतृत्व, संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक निर्णयों की भी है। चुनावी राजनीति में उम्मीदवारों का चयन सबसे कठिन और संवेदनशील प्रक्रिया माना जाता है।
एक गलत फैसला न केवल चुनावी समीकरण बिगाड़ सकता है, बल्कि संगठन के भीतर असंतोष भी पैदा कर सकता है। फिलहाल भाजपा को दोनों राज्यों बिहार और मध्यप्रदेश में इसी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
बांकीपुर में अंतिम समय का बदलाव
बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट भाजपा का परंपरागत गढ़ रही है। 1995 से यह सीट लगातार भाजपा के पास है और नितिन नवीन स्वयं भी इसी सीट से कई बार विधायक रहे। उनके राज्यसभा जाने के बाद यह सीट खाली हुई और उपचुनाव की नौबत आई।
भाजपा ने पहले भारतीय जनता युवा मोर्चा के नेता अभिषेक कुमार सिन्हा (बंटी) को उम्मीदवार बनाया। उन्होंने वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में नामांकन भी दाखिल कर दिया। लेकिन अगले ही दिन उन्होंने “पारिवारिक कारणों” का हवाला देते हुए अपना नामांकन वापस ले लिया।
इसके बाद भाजपा को तत्काल नीरज कुमार सिन्हा को नया उम्मीदवार घोषित करना पड़ा। नामांकन के बाद उम्मीदवार बदलना किसी भी बड़े राजनीतिक दल के लिए असामान्य स्थिति मानी जाती है और इसने पार्टी की उम्मीदवार चयन प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
बांकीपुर का मुकाबला इसलिए भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है क्योंकि यहां जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। राष्ट्रीय जनता दल ने रेखा गुप्ता को दोबारा मैदान में उतारा है। ऐसे में भाजपा के लिए यह सीट केवल अपनी परंपरागत पकड़ बनाए रखने का सवाल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की राजनीतिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ गई है।
दतिया में नरोत्तम मिश्रा की नाराजगी
मध्यप्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर भाजपा का फैसला भी विवादों में है। पार्टी ने पूर्व गृह मंत्री और तीन बार के विधायक नरोत्तम मिश्रा को टिकट देने के बजाय आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया। इसके बाद मिश्रा समर्थक खुलकर विरोध में उतर आए। दतिया में प्रदर्शन हुए, राजमार्ग जाम किया गया और स्थानीय संगठन में असंतोष खुलकर सामने आया। कुछ स्थानीय पदाधिकारियों ने इस्तीफे तक दे दिए।
नरोत्तम मिश्रा लंबे समय तक दतिया की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं। 2023 के विधानसभा चुनाव में उनकी हार के बाद यह माना जा रहा था कि उपचुनाव उनके लिए वापसी का अवसर होगा। लेकिन पार्टी ने पीढ़ीगत बदलाव और नए नेतृत्व पर दांव लगाया, जिससे स्थानीय स्तर पर असंतोष पैदा हो गया।
उम्मीदवार चयन ही सबसे बड़ी चुनौती
उपचुनावों में राष्ट्रीय मुद्दों की तुलना में स्थानीय समीकरण अधिक प्रभावी होते हैं। उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, जातीय-सामाजिक संतुलन, संगठन में उसकी स्वीकार्यता और कार्यकर्ताओं का उत्साह परिणाम तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसलिए टिकट वितरण में हुई छोटी-सी चूक भी बड़े राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती है।
नितिन नवीन के सामने चुनौती केवल चुनाव जिताने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि उम्मीदवार चयन के कारण संगठन में असंतोष न फैले। बांकीपुर और दतिया की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा जैसी मजबूत संगठनात्मक पार्टी में भी टिकट वितरण सबसे कठिन राजनीतिक निर्णयों में से एक है।
नेतृत्व की पहली कसौटी
भाजपा ने नितिन नवीन को ऐसे समय संगठन की कमान सौंपी है, जब पार्टी कई राज्यों में विस्तार और अपनी राजनीतिक बढ़त बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में बिहार और मध्यप्रदेश के उपचुनाव उनके नेतृत्व की पहली वास्तविक परीक्षा बन गए हैं।
यदि पार्टी दोनों राज्यों में राजनीतिक असंतोष को नियंत्रित करते हुए जीत दर्ज करती है, तो यह नितिन नवीन की संगठनात्मक क्षमता पर मुहर होगी। लेकिन यदि टिकट वितरण ही चुनावी नुकसान का कारण बनता है, तो राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनके शुरुआती कार्यकाल पर सवाल भी उठ सकते हैं।
यही कारण है कि ये उपचुनाव महज दो राज्यों बिहार एवं मध्यप्रदेश के दो विधानसभा सीटों बांकीपुर एवं दतिया की ही लड़ाई नहीं हैं, बल्कि भाजपा के नए राष्ट्रीय नेतृत्व की निर्णय क्षमता और संगठनात्मक कौशल की भी अहम परीक्षा है।



