Wednesday, May 22, 2024

महंगाई बनाम जगहंसाई कांग्रेस की  

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बात पुरानी है। तब देश में कांग्रेस की सरकार (Congress government) थी। तब मैंने कहीं एक रचना पढ़ी थी, ‘महंगाई शिवधनुष (Shiv Dhanush) की तरह भारी है, राम (Ram) अब राजकुमार (Rajkumar) नहीं, शासन का तृतीय श्रेणी का कर्मचारी है।’ तब हिन्दी में कई लोकप्रिय प्रकाशन थे और ये दौर दुर्भाग्य से उनके बंद होने का चल रहा था। इसी दौरान एक गजब वाकया हुआ। बतौर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह (Chief Minister Arjun Singh) भोपाल (Bhopal) के तत्कालीन टीटी नगर स्टेडियम (TT Nagar Stadium) में दशहरे के समारोह में राम का पूजन करने पहुंचे। वहां राम बने पात्र ने बगल में छिपाया एक आवेदनCM को थमा दिया, जिसमें लिखा था कि आवेदक बेरोजगार हैं और उसे कोई सरकारी नौकरी देने की कृपा की जाए। इसी दौर की एक रचना और मुझे याद आई, ‘नौ मन तेल होने  के बाद भी आज की राधा नहीं नाची। संग्रह कर लिया था ब्लैक (Black) में बेचने के लिए।’

कीमत से लेकर रोजगार जैसी समस्याओं के ये वे सच हैं, जो थे, हैं और दुर्भाग्य से अनंतकाल तक ये जारी रहेंगे। इन सब के बीच कांग्रेस ने देश में महंगाई को लेकर आंदोलन शुरू किया है। आंदोलन को मोदी के नारे ‘कांग्रेस मुक्त भारत (Congress Mukt Bharat)’ की तर्ज पर नाम दिया गया है, ‘महंगाई मुक्त भारत (inflation Muktindia)।’ जिन्होंने यह नारा दिया है, जब उनकी बारी थी, वे यह कर नहीं सके, अब करने लायक स्थिति में हैं नहीं। यह गौर करने लायक बात है कि यह आंदोलन महंगाई के विरुद्ध तो है ही, नरेंद्र मोदी सरकार (Narendra Modi government) के लिए ज्यादा। कांग्रेस को देर से समझ में आ रहा है, हिन्दूत्व के पचढ़े में पड़ने से ज्यादा अच्छा आम आदमी से जुड़े मुद्दों से खुद को जोड़े। लेकिन अब उस पर किसी का भरोसा ही नहीं है।

आजादी के बाद से ही कीमतों का चढ़ावा एक बड़ा मुद्दा रहा है। इतिहास पलट कर देख लीजिये, कांग्रेस के शासन  (Congress rule)में शक्कर सहित अन्य वस्तुओं के दाम ऐसे आसमान छूने लगे थे कि देश की जनता मुखर होकर अपने प्रति असमान व्यवहार की शिकायत करने लगी थी। यहां एक नारा, उन लोगों के पूर्वजों ने उछाला था, जो आज की सरकार के कर्ताधर्ता हैं। वो भी याद आ रहा है, ‘खा गई शक्कर, पी गई तेल, देखो ये इंदिरा गांधी (Indira gandhi) का खेल’। निश्चित ही अनेक वस्तुओं के दाम आज सर्वकालिक ऊंचाई को छू रहे हैं, उन पर वर्तमान व्यवस्था चुप है या निरुत्तर है। किन्तु जो उत्तर कांग्रेस के समय आये, उनकी याद भी तो कर ली जाए। तब डॉ. मनमोहन सिंह (Dr. Manmohan Singh) ने कहा था कि हम डबल डिजिट ग्रोथ रेट (double digit growth rate) की तरफ जा रहे हैं। उनका यह जुमला सफेद झूठ ही साबित हुआ। अब के प्रधानमंत्री ‘फाईव ट्रिलियन अर्थव्यवस्था (five trillion economy)’ का चुग्गा चुगा रहे हैं। सत्ता में कोई भी रहे, सत्ताधीशों के चरित्र में कोई ज्यादा अंतर नहीं होता।

ये वह दौर था, जब मनमोहन सरकार में मंत्री रहे कमलनाथ (Kamalnath) ने महंगाई का रुख घिनौने तरीके से मोड़ते हुए कह दिया था कि अब गरीब लोगों को भरपेट खाने को मिल रहा है इसलिए महंगाई बढ़ रही है। और वो सफेद वस्त्रों में लिपटे पी चिदंबरम  (P Chidambaram) की यह वाहियात दलील कि उनकी सरकार ने कुत्तों के खाने वाले बिस्किट पर टैक्स माफ कर दिया है। पेट्रोलियम पदार्थ की कीमत तो आज भी अंतर्राष्ट्रीय रूप से निर्धारित होती है, तब हम कैसे भूल सकते हैं कि उस समय के कांग्रेसी रंग में रंगे हुए शरद पवार (Sharad Pawar) ने कहा था कि चीनी,गेहूं और चावल की कीमतें अमेरिका तथा इंग्लैंड (America and England) के मुकाबले भारत में सस्ती हैं। उस समय के स्थापित और आज के अघोषित कांग्रेस समर्थक पवार शायद देश की जनता को यह बताना चाह रहे थे कि ‘देखिये, आप प्रगतिशील राष्ट्रों के मुकाबले कितना कम दु:ख झेल रहे हैं।’ कीमतों की आग के उस दौर में ही सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने यह कहकर परेशान जनता की भावनाओं पर पेट्रोल (Petrol) छिड़का था कि वह महंगाई को लेकर अपनी ही पार्टी की तत्कालीन सरकार को पत्र लिखेंगी।

खैर, कांग्रेस के महंगाई-विरोधी आंदोलन (anti inflation movement) पर आएं। बड़ा मनोहारी दृश्य है। संसद से लेकर सड़क तक कांग्रेस के नेता सरकार पर पिल पड़े हैं। लेकिन इसमें आम आदमी कहीं भी नहीं दिखता। यह विचित्र स्थिति है कि कांग्रेस जिनके नाम पर बुक्का फाड़ कर रो रही है, वही लोग इस पार्टी के साथ खड़े होने से परहेज कर रहे हैं। खालिस रूप से आम जनता से जुड़ा जो मुद्दा कांग्रेस के खास नेताओं के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गया है, वह ऐसा होने पर सवाल तो उठाता ही है, साथ ही वह ऐसे संदेह भी उठा रहा है, जो इस दल की देश की जनता के बीच विश्वसनीयता पर सवालिया निशान उठा रहा है। ऐसा आंदोलन तो भाजपा ने भी विपक्ष में रहते हुए कई बार किए थे। तब दिल्ली से लेकर देश के लगभग सभी हिस्सों तक लोगों की भागीदारी का वह असर दिखा कि कांग्रेस की सत्ता से छुट्टी हो गयी थी। याद है नरेन्द्र मोदी का नारा, बहुत हुई महंगाई की मार, अबकि बार मोदी सरकार। तो आज ऐसा क्यों नहीं हो रहा है? जनता जनार्दन कांग्रेस के पाले में लौटने को तैयार क्यों नहीं है?

क्या इसकी वजह यह है कि देश की जनता को कांग्रेस के ऐसे किसी आंदोलन या सक्रियता की विश्वसनीयता पर संदेह है? आप सड़क-चौराहे पर खड़े होकर किसी से भी संवाद कर लीजिये। इसमें नब्बे प्रतिशत से अधिक लोग कीमतों को लेकर गुस्सा जताते हुए मिल जाएंगे। लेकिन यही नब्बे प्रतिशत क्यों कर नौ प्रतिशत की स्थिति में भी कांग्रेस के सुर में सुर नहीं मिला रहा, यह इस दल के कर्ताधर्ताओं के लिए चिंता और विचार का सवाल होना चाहिए। नरेंद्र मोदी भले ही कीमतों के मसले पर देश की जनता को समझा पाने की स्थिति में न हों, लेकिन उनसे भी बुरी दशा कांग्रेस की है, जो सारी समझी-बूझी हुई परिस्थितियों के बीच भी यह बूझ नहीं पा रही है कि ऐसे मसले पर उसे आम जनता के गुस्से के असलहे का साथ क्यों नहीं मिल पा रहा है। यकीनन महंगाई आज एक बार फिर शिवधनुष की तरह भारी है, किन्तु इस धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा पाने के लिहाज से कांग्रेस फिलहाल नितांत तरीके से कमजोर दिखती है। इसलिए महंगाई बनाम जगहंसाई ही कांग्रेस के हिस्से में लिखी बदी है।

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