Wednesday, May 22, 2024

पंच से प्रपंच परमेश्वर तक

Share

‘झुकी हुई कमर’, ‘पोपला मुंह’ और ‘सन-के-से बाल’ ये तीन पहचान मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) ने अपनी कहानी ‘पंच परमेश्वर (Panch Parmeshwar)’ के बूढ़ी खाला यानी मौसी वाले चरित्र के लिए गिनाई थीं। इन में से किसी भी चिन्ह का पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee) से कोई साम्य नहीं है। वह शरीर सहित हृदय तथा मस्तिष्क से पूर्णत: चुस्त-दुरुस्त हैं। तो फिर मौसी और दीदी का एक साथ जिक्र एक साथ क्यों? है न इसका जवाब।

दरअसल, प्रेमचंद की मौसी जिस अंदाज में पंचों को एकजुट करने के लिए दिन-रात लकड़ी टेकती गांव-गांव दौड़ती रही थी, बनर्जी भी उसी तरह लंबे समय से विपक्षी एकता (opposition unity) के लिए इधर से उधर दौड़ लगा रही हैं। ताकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) को कमजोर किया जा सके। मोदी को हराया जा सके। ममता के हाथ में लकड़ी नहीं है, बल्कि वह ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ का यथार्थ स्वरूप और सत्य हैं। एक बार फिर BJP के खिलाफ लामबंदी की जो कोशिश ममता ने की है, वह नजरंदाज नहीं की जा सकती है। ऐसी ही कोशिश तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर (Telangana Chief Minister KCR) भी कर रहे हैं। वामपंथियों (leftists) के जमाने से रक्तरंजित राजनीति के पर्याय पश्चिम बंगाल में ममता ने अनेक बार अपनी जान पर संकट झेलकर वामपंथी शासन के अंत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि ममता के नेतृत्व में भी पश्चिम बंगाल की राजनीति अभी भी खून से ही सनी है।

फिर भी यह ममता की जुझारू प्रवृत्ति की ही दोहरी सफलता रही कि अपने राज्य में उन्होंने कांग्रेस (Congress) और वामपंथियों (leftists)को लगभग खत्म कर दिया है। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इसकी शिकायत तक नहीं कर पा रहा। ममता की शक्ति ही है कि वह पश्चिम बंगाल में भाजपा के कमल की पंखुड़ियों को पूरी तरह खिलने से रोक पाईं। तो मात्र दौड़-धूप और जुझारू तबीयत के चलते प्रेमचंद की खाला से साम्य रखने वाली ममता की इस ताजा मुहिम का क्या असर होता दिख सकता है? उनकी नजर वर्ष 2024 के आम चुनाव (General election) पर है। इस नजर के नजरिये से ही ममता की इस राह में सवालों और संशयों के कांटे बिछने शुरू हो जाते हैं। उन्होंने क्षेत्रीय दलों के ताकतवर मुख्यमंत्रियों और विपक्षी नेताओं को चिट्ठी लिख कर अपनी ताजा कोशिशों को परवान चढ़ाया है।

बात अतीत से शुरू करें, या वर्तमान से, मामला आसान नहीं दिखता। क्या बनर्जी देश के राजनीतिक इतिहास के उजले और प्रबलतम अध्याय ‘संपूर्ण क्रांति’ वाले किसी और जयप्रकाश नारायण (Jai Prakash Narayan) को सामने ला सकती हैं? क्या भाजपा-विरोधी किसी भी दल में उस भाजपा जैसा बनने का माद्दा दिखता है, जो अंतत: कांग्रेस को बहुत-बहुत पीछे धकेलकर काफी आगे तक जाने का करिश्मा कर सकी? क्या कांग्रेस अब वह कांग्रेस रह गयी है, जिसने अपनी स्वीकार्यता तथा शक्ति की दम पर अन्य दलों का नेतृत्व करते हुए वर्ष 2004 से 2014 तक भाजपा को ‘फील गुड (feel good)’ के लिए तरसा कर रख दिया था?

इसमें कोई दो राय नहीं कि विपक्ष की एकता से भाजपा के अच्छे दिन संकट में आ सकते हैं। लेकिन ऐसी आस वर्तमान विपक्ष से किस हद तक की जा सकती है? कांग्रेस बुरी तरह कमजोर हो चुकी है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव (Assembly elections in five states) में सभी जगह मिली शर्मनाक पराजय ने पंजे में किसी समय अंकित राजयोग वाली लकीरों को अब दरारों में परिवर्तित कर दिया है। यूं भी, इन चुनावों से पहले ही समय-समय पर बनर्जी सहित समाजवादी पार्टी (SP), बसपा (BSP), राजद (RJD), आप (AAP) आदि सभी भाजपा-विरोधी दल (anti-BJP party) कांग्रेस के नेतृत्व में आगे बढ़ने से साफ मना कर चुके हैं।

अब कांग्रेस के पास यही विकल्प बचता है कि आने वाले विधानसभा चुनावों में धुआंधार जीत हासिल कर वह साबित कर दे कि आज भी भाजपा को रोकने में उसका कोई सानी नहीं है। इस दल के पास ऐसा करने के लिए अवसर भी है। क्योंकि आगे होने वाले चुनावी राज्यों में कर्नाटक (Karnataka) के अलावा बाकी सभी जगह उसका सीधा मुकाबला BJP से ही है। इस तरह ममता की उम्मीदों वाली एकता का झंडा थामने के लिए कांग्रेस को दिल थामकर इस बात का इंतजार करना होगा कि अगले साल के चुनावी घमासान में वह किस तरह ‘नयी ताकत और नए जोश’ जैसे किसी चमत्कार को अंजाम दे पाती है।

बात स्वयं ममता की करें, तो भी वह इस मामले में कांग्रेस का विकल्प नहीं दिखती हैं। तृणमूल कांग्रेस का पश्चिम बंगाल से बाहर कोई असर नहीं है। साथ ही बनर्जी के पास पश्चिम बंगाल से बाहर इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) से लेकर जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) या नरेंद्र मोदी Narendra Modi() जैसी मास अपील का खासा अभाव है। भाजपा-विरोधी शेष दलों के नेताओं की इस मामले में स्थिति ममता से भी ज्यादा गयी-गुजरी है। बनर्जी पर्याप्त रूप से चतुर हैं। परिस्थितियों का ऐसा सच उनसे भी नहीं छिपा है। फिर भी वह इस एकता के प्रयास के लिए विवश हैं। क्योंकि वीरभूम हिंसा (Virbhum Violence) के बाद से उनकी सरकार पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। भतीजे अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) की ED से चल रही लुका-छिपी किसी भी दिन कड़ी कार्यवाई जैसी अप्रिय स्थिति की वजह बन सकती है।

इस सब से बचने के लिए ममता के पास अभी यही विकल्प है कि वह विपक्ष की एकता के नाम पर केंद्र सरकार पर दबाव बनाएं और उसमें निरंतर वृद्धि करें। नि:संदेह ममता की तुलना प्रेमचंद वाली मौसी के पात्र की किसी भी कमजोरी से नहीं की जा सकती है। फिर भी वह पंच परमेश्वर की मौसी इसलिए हैं कि उन्हें भी एक अदद अलगू चौधरी की सख्त दरकार है। स्वभाव के लिहाज से खुद चौधराहट से भरी बनर्जी क्या किसी और चौधरी की अधीनता स्वीकार कर सकेंगी? यह सवाल भी विपक्षी एकता के ताने बाने को सवालिया दायरे में ला रहा है। वह पंच परमेश्वर वाला मामला था, यहां प्रपंच परमेश्वर वाली स्थिति है।

अब विपक्षी एकता की गुहार लगा रही ममता बनर्जी क्या अपने राज्य में वामपंथियों और कांग्रेस को साथ ला सकती हैं? या उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में मायावती (Mayawati) और अखिलेश (Akhilesh) के साथ प्रियंका (Priyanka) को एक कर सकती हैं। या ये तीनों एक होकर ममता बनर्जी को अपना नेता स्वीकार कर लेंगे? या बिना कांग्रेस के ताकत हासिल किए विपक्षी एकता का कोई प्रयोग सफल हो सकता है? क्षेत्रीय दलों के राष्ट्रीय राजनीति में हावी होने का एक तथ्य यह है कि वे कांग्रेस या भाजपा के नेतृत्व बिना खुद कोई निर्णायक ताकत नहीं बन सकते हैं। लिहाजा, ममता बनर्जी की ऐसी कोशिशों से भाजपा की सेहत पर फिलहाल कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

किसी की राह में कालीन बनकर बिछने का मतलब यही होता है कि आप अगले के पैरों तले रौंद दिए जाएंगे। पश्चिम बंगाल के बीते चुनाव में कांग्रेस ने ममता के लिए इसी कालीन की भूमिका निभाई थी और अब ममता पूरी तरह इस पार्टी के सिर पर सवार हो चुकी हैं। यह ममता का प्रपंच था या कांग्रेस का प्रारब्ध, कह नहीं सकते। लेकिन यह वह सच है, जिससे भाजपा-विरोधी दल भी वाकिफ हैं। बनर्जी ने कभी कांग्रेस तो कभी राजग के कंधे पर सवार होकर अपनी मंजिल को पाया है और यह उनके चरित्र का हिस्सा बन चुका है। इस तथ्य में छिपे सार को समझिये तो विपक्ष की एकजुटता के बनर्जी के प्रयासों की निस्सारता का आकलन करना आसान हो जाएगा।

Read more

Local News