Wednesday, May 22, 2024

निक्कर की आग में छिपी सुलगन कांग्रेस की

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इसे खाकी निक्कर (Khaki Knicker) को खाक कर देने की ख्वाहिश मात्र नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस (congress) ने ट्विटर (Twitter) पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के गणवेश (Uniform) पर आग लगाने की जो तस्वीर लगाई है, उसका फ्रेम बहुत बड़ा है। उतना ही भयावह भी है।  इसमें यह मंसूबा दिखता है कि यदि कांग्रेस को फिर से सत्ता में आना है तो उस विचारधारा को जलाकर खाक कर देना होगा, जिस विचारधारा ने देश के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में चौंकाने वाले बदलाव लाकर कांग्रेस को हाशिये के भी सबसे छोटे हिस्से तक धकेल दिया है।

लोकसभा (Lok sabha- Lower House of Indian Parliament) में भाजपा (BJP) कभी केवल दो सीटों तक सिमट कर रह गयी थी। खाकी निक्कर वाले संघ की शाखाओं से ही निकले भाजपाईयों ने योजनाओं, कार्यक्रमों और विचारों का वह खाका तैयार किया कि लगातार दो आम चुनावों (two general elections) में भाजपा को अपने आप के दम पर बहुमत हासिल हुआ। भाजपा के नेतृत्व में बने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को 2014 और 2019 दोनों आमचुनावों में शानदार जीत मिली। और इससे पहले भी देश के कई प्रमुख राज्यों में भाजपा की सरकार बनने और उसी अनुपात में कांग्रेस का तंबू उखड़ने का भी क्रम शुरू हो चुका था।





संघ की जैसी नीति और नीयत है, वह किसी भी दल को मिटाने की दिशा में कभी आगे नहीं बढ़ा। हां, उसने स्वयं के प्रयासों से अपनी राजनीतिक शाखा भाजपा की लकीर को बढ़ाने के लिए ताकत झोंकी और नतीजा इतना सफल रहा कि प्रतिक्रिया में कांग्रेस अब संघ को आग में झोंक देने की कल्पना तथा कामना करती दिख रही है। ऐसी कल्पना कम्युनिस्ट (communist) करते रहे हैं। उनका संघ से वैचारिक टकराव है। लेकिन Congress अपने आप में आज  राजनीतिक धरातल पर वैचारिक शून्यता के साथ खड़ी है। लिहाजा उसके कंधों पर बंदूक रखकर वामपंथी विचारधारा (leftist ideology) ही खेल रही है। लेकिन कांग्रेस के प्रबंधकों और रणनीतिकारों को इतना समझ में नहीं आ पा रहा है कि जो वामपंथी विचारधारा तीन राज्यों में से भी सिमट पर एक छोटे से राज्य में सीमित होकर रह गई हैं, वो भला आज की BJP से क्या खाकर लड़ेगी। फिर कांग्रेस सोच की इस प्रक्रिया से होकर तो गुजर ही नहीं रही है कि आखिर बहुसंख्यक राजनीति के उफान में उसका अपना क्या और कैसा योगदान रहा है।

इसलिए ऐसी कल्पना और कामनाओं से भला क्या हासिल होगा? वह भी तब, जब ऐसा उस विचारधारा के लिए किया तथा कहा जा रहा है, जिसने देश देश की राजनीति के केन्द्र में बहुसंख्कों को ला खड़ा किया है। वह भी इस तरह कि इस आरंभ ने अल्पसंख्यकों पर केंद्रित तुष्टिकरण की राजनीति को हाशिए पर ला दिया है। इसका असर यह भी हुआ कि राहुल गांधी यकायक कोट के ऊपर यज्ञोपवीत पहनकर खुद को ब्राह्मण बताने लगे। ‘मौलाना मुलायम (Maulana Mulayam)’ कहे जाने वाले के बेटे अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के माथे पर अचानक तिलक प्रकट हो गया। ‘देश के संसाधनों पर मुस्लिमों का पहला हक’ की थ्योरी के कठपुतली जनक डॉ. मनमोहन सिंह (Dr. Manmohan Singh) को उनकी कांग्रेस ने ही काठ मार देने वाली स्थिति में ला कर चुप करा दिया। पश्चिम बंगाल (West Bengal) में सार्वजनिक मंच पर दुर्गा पाठ (Durga Path) करती ममता बनर्जी  (Mamata Banerjee)और उत्तराखंड (Uttarakhand) में भगवा पहनकर कैमरों के सामने खींसे निपोरते मनीष सिसोदिया (Manish Sisodia) जैसे घटनाक्रम भी इसलिए पहली बार देश में देखने को मिले, क्योंकि भाजपा की बहुसंख्यक आधार वाली सियासत ने भाजपा-विरोधी दलों को सांसत में डाल दिया है।





स्पष्ट है कि संघ अपनी विचारधारा पर मजबूती से कायम रहा। इसलिए उसे बड़ी कामयाबी मिली। इससे उलट कांग्रेस की कभी अपनी कोई एक विचारधारा रही ही नहीं। उसने प्रारंभ से ही कम्युनिस्ट विचारों वाले उधार के सिंदूर से अपनी मांग भरी है। जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) का कश्मीर में अनुच्छेद 370 (Article 370 in Kashmir) से  प्रेम और सनातनी हिन्दू राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद (Rajendra Prasad) से बैर रहा। इंदिरा गांधी ने निहत्थे साधुओं का सामूहिक अंत कराया। राजीव गांधी ने शाहबानो मामले (Shahbano Case) में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) का फैसला संसद के पटल पर पलट दिया। राहुल गांधी (Rahul Gandhi) खुलकर हिंदुत्व के विरोध में बयान देते रहे और ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग के समर्थन में सामने आए।

मजे की बात यह कि खालिस कम्युनिस्ट शैली वाले ऐसे फैसलों और कामों के बाद भी कांग्रेस स्वयं के लिए सभी वर्ग को अपनाने का दावा करती रही। इसका नतीजा आज सामने है। समस्या यह नहीं कि आप किसी विचार विशेष के समर्थक हैं। आपकी अपनी समस्या यह कि आप गड्डमड्ड स्वरूप को अपनाकर विचार का मिक्स अचार बनाने के लिए पिल पड़े। इस भ्रम का मतदाता ने यही हल निकाला कि उसने आपको ही अपने हृदय से बाहर कर दिया।

सवाल यह कि जिस संघ के देश में विराट समर्थन को खुद congress 2014 तथा 2019 में देख चुकी है, उस संघ को खाक कर देने की कामना और कल्पना से वह किस-किस को खत्म कर देना चाह रही है? संघ के हरेक समर्थक को? हर उस देशवासी को, जिसने केंद्र सहित अनेक राज्यों में BJP  की सरकार बनाने में योगदान दिया है? यदि यही सोच है तो फिर सोचना होगा कि ‘भारत जोड़ो’ यात्रा (bharat jodo yatra) के इस नारे के भीतर वास्तव में क्या सच छिपा हुआ है? निक्कर में लगी आग के मूल में छिपी कांग्रेस की सुलगन और उसकी तकलीफ से उपजे मंसूबे गंभीर रूप से गौरतलब हैं। इनका देश को जोड़ने से दूर-दूर तक कोई नाता नजर नहीं है।

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