Wednesday, May 22, 2024

इस सीमित हार से भी सबक ले भाजपा

Share

मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) में दिसंबर, 1998 के विधानसभा चुनाव (assembly elections) के परिणाम के समय की बात है। ‘आगामी मुख्यमंत्री’ कहे जा रहे विक्रम वर्मा (Vikram Verma) से लेकर भाजपा (BJP) के कई दिग्गज चुनाव हार गये थे। बाबूलाल गौर (Babulal Gaur) जैसे तैसे जीत गए थे और एक टीवी चैनल ने उनसे बात करना चाही तो जो गौर जी ने कहा, उसका संक्षेप यही था कि ‘बस भैया! मैं किसी तरह जीत गया, अब और कुछ मत पूछो।’

नगरीय निकाय चुनाव (urban body elections) के अंतिम चरण के परिणाम के बाद बाबूलाल गौर के उस कथन में समूची BJP को देखा जा सकता है। बेशक नगर निगमों से लेकर नगर पालिकाओं और नगर परिषद तक उसने बेहतर प्रदर्शन किया। पिछली बार के जीते सभी सौलह नगर निगमों से उसने इस बार छह गवां दिए। बुरहानपुर (Burhanpur) और उज्जैन (Ujjain) में उसने जैसे तैसे इज्जत बचा ली। लेकिन इन नगर निगमों में मिली जीत और हार ही में उसके लिए कई सबक छिपे हैं। यहां भाजपा ‘बस जीत गए, और कुछ न पूछो’ वाली स्थिति का ही शिकार है। 1998 के विधानसभा चुनाव में भाजपा अपने तत्कालीन दिग्गजों की आत्ममुग्धता के चलते हारी।

इस चुनाव में जहां वह हारी है उसकी वजह यह कि अति-आत्मविश्वास के चलते पार्टी ने अपनी ही रीढ़ पर हथोड़ा मार दिया। रीढ़ यानी उन कार्यकर्ताओं को मानसिक रूप से तोड़ दिया गया, जो इस दल की शक्ति का सबसे बड़ा आधार हुआ करते हैं। इस दल को सोचना होगा कि कटनी में यदि आम मतदाता ने 45 में से 27 पार्षदों के रूप में BJP को चुन रहा है तो फिर क्या कारण रहा कि वहां महापौर (Mayor) के रूप में भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी की बजाय इसी दल की बागी प्रीती सूरी को महापौर के लायक समझा गया? बीते विधानसभा और लोकसभा चुनावों में तो भाजपा ने रीवा (Rewa) से कांग्रेस (Congress) का लगभग सूपड़ा साफ कर दिया था। तो फिर वह क्या फैक्टर रहा, जिसने वहां के स्थानीय निकाय में 24 साल बाद अजय मिश्रा (Ajay Mishra) को चुनकर BJP के विश्वास के अतिरेक को चकनाचूर कर दिया? ग्वालियर में शोभा सिकरवार की जीत भी यही सवाल उठाती है। जबलपुर (Jabalpur) में भी महापौर पद पर कांग्रेस की जीत और पार्षदों में भाजपा के बहुमत के पीछे भाजपा के देवतुल्य काडर की ही प्रमुख भूमिका रही है।

भाजपा जहां जीती, उसके लिए खुश होने का भरपूर अधिकार है। आखिरकार शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chauhan) का जादू बरकरार है। लेकिन जिन महत्वपूर्ण जगहों पर वह जीत कर भी हारी है, इसकी वजह गौर करने की मशक्कत तो उसे उठानी ही पड़ेगी? और इस सोच का पहला सिरा यही होना चाहिए कि नेताओं को अपने कार्यकर्ता को बंधुआ मजदूर समझने की भूल करने से बचना था। यदि संगठन और कार्यकर्ता के नाम पर सन्नाटे से भरी कांग्रेस कई जगह जीत गयी तो इसकी वजह केवल यह कि ऐसी जगहों पर भाजपा के आला नेताओं के अति-आत्मविश्वास ने ही उसे डूबाया। ग्वालियर (Gwalior), कटनी (Katani), रीवा (Rewa), सिंगरोली (Singrauli) के चुनाव परिणामों ने साबित किया है कार्यकर्ता ने थोपे गए उम्मीदवारों से खुद को दूर रखना ही बेहतर समझा। छिंदवाड़ा (Chhindwara) का नतीजा तो कमल को कुम्हलाने वाला है। इस सीट पर 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस और कमलनाथ (Kamal Nath) पुत्र सिर्फ इसलिए जीते थे कि भाजपा ने वहां कोई दम ही नहीं लगाया था। तो इस ढिलाई को स्थानीय निकाय के चुनाव में तो दूर किया जा सकता था। मगर ऐसा करने की शायद कोशिश भी नहीं की गयी।

यह भाजपा की मध्यप्रदेश इकाई Madhya Pradesh Unit() को सोचना होगा कि क्या वह एक तरफ नरेंद्र मोदी और दूसरी तरफ शिवराज सिंह चौहान वाली बैसाखी पर ही झूलते हुए आगे चलना चाहेगी? कार्यकर्ताओं और नेतृत्व के बीच संवाद की महत्वपूर्ण कड़ी संगठन महामंत्रियों को पार्टी को क्यों समेटना पड़ा। कुशाभाऊ ठाकरे (Kushabhau Thackeray), प्यारेलाल खंडेलवाल (Pyarelal Khandelwal) , नारायण प्रसाद गुप्ता (Narayan Prasad Gupta), गोविंद सारंग (Govind Sarang), मेघराज जैन (Meghraj Jain) जैसे संगठन मंत्रियों का दौर आखिर इस भाजपा के सत्ता काल में बीत क्यों गया? संगठन का वो पुराना परिवार भाव क्यों अब ‘पार्श्व’ का हिस्सा ही बनकर रह गया है? कार्यकर्ताओं को देवतुल्य कहना क्या अब भाजपा में महज औपचारिकता रह गया है। पार्टी को कम से कम ताजा परिणामों में जहां से सबक लेना है, वहां पर विचार करते हुए यह तो सोचना ही चाहिए। और इस सोच के साथ शोचनीय तथ्य यह भी जुड़ा होना चाहिए कि कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के चलते हुई दुर्गति का यह पहला परिणाम नहीं है। 1998 के बाद 2018 में भी कांग्रेस की सरकार बन जाने की वजह में यही ओवर कॉन्फिडेंस वाला भाव ही है।

नतीजे आरंभिक रूप से कांग्रेस के लिए उत्साह के प्रतीक हैं। किन्तु इस दल को भी सोचना होगा कि थोकबंद रूप से उन जगहों पर भी क्यों उसके पार्षद पद के उम्मीदवार खेत रहे, जहां उसे महापौर के पद पर विजय मिल गयी? हांडी के एक चावल के रूप में ग्वालियर को लिया जा सकता है। शोभा सिकरवार (Shobha Sikarwar) भले ही कांग्रेस की तरफ से महापौर बनी हैं, लेकिन उनकी पृष्ठभूमि खालिस भाजपा वाली है। स्थानीय कार्यकर्ता BJP के महापौर प्रत्याशी के चयन से असहमत था, इसलिए उसने चुनाव से मुंह मोड़ लिया और महापौर पद का रुख आसानी से कांग्रेस की तरफ मुड़ गया। यही जबलपुर में हुआ। डॉ. जीतेन्द्र जामदार Dr. Jitendra Jamdar() भले ही संघ से जुड़े हों, लेकिन उनकी आम लोगों सहित भाजपा के कार्यकर्ताओं की बीच भी कोई स्वीकार्यता नहीं था। फिर भी जामदार को थोंप दिया गया। नतीजा फिर यह कि वह हार गए। कांग्रेस को तो यह भी सोचना चाहिए कि आखिर कमलनाथ के गढ़ छिंदवाड़ा में कांग्रेस अट्ठारह साल आखिर क्यों हारती रही? कमलनाथ यदि प्रदेश की राजनीति में सक्रिय नहीं हुए होते तो क्या अब भी छिंदवाड़ा में कांग्रेस जीत पाती। और छिंदवाड़ा की जीत भी कांग्रेस के लिए मतों के अंतर को लेकर कोई बहुत उल्लेखनीय नहीं है। कांग्रेस को इन नतीजों से कितना खुश होना चाहिए और कितना चिंतन करना चाहिए, उससे ऐसी कोई अपेक्षा भारत की इसे बुजुर्ग पार्टी से करना ज्यादती होगी।

फिर से भाजपा पर लौटे तो सही तो यह है कि भगवान राम (lord ram) वाली पार्टी भाजपा के मध्यप्रदेश में शीर्ष नेता आत्मविश्वास या फिर अहंकार के प्रभाव में लिप्त दिखने लगे हैं। नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय वाला समय सप्रयास पीछे धकेल दिया जा चुका है। केंद्र में नरेंद्र मोदी और राज्य में शिवराज वाली लोकप्रियता के भरोसे जिम्मेदारों ने अपने-अपने कर्तव्य से आंख मूंद ली है। वे लंबी नींद में गाफिल हैं, लेकिन शायद भाजपा का देवतुल्य कार्यकर्ता जाग रहा है और अपना काम भी बखूबी कर रहा है। 2023 के लिए इस चुनाव में भाजपा के लिए सबसे बड़ा सबक यही छिपा है कि नेत्त्व आपस में सामंजस्य बनाए और कार्यकर्ताओं की भावनाओं का सम्मान करें। एक बार नहीं भाजपा का केडर कई बार यह साबित कर चुका है कि वो बंधुआ मजदूर बनने को तैयार नहीं है। अभी सुधार की गुंजाईश है, वरना, दोहराव कई बार प्रकृति का नियम बनता है और 2018 का ‘कम बैक’ 2023 में हो जाए तो कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए। तय है कि उसमें भी कांग्रेस का कोई योगदान नहीं होगा।

Read more

Local News