मौत की सजा सुनाए जाने के बाद किसी कैदी को किस तरीके से मौत दी जाए, इस पर देश में लंबे समय से बहस चल रही है। क्या फांसी ही सबसे सही तरीका है या ऐसा कोई दूसरा तरीका हो सकता है, जिसमें दर्द और तकलीफ कम हो और आखिरी समय में कैदी की गरिमा भी बनी रहे? इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने फांसी को मौत की सजा देने का तरीका खत्म करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।
हालांकि कोर्ट ने यह साफ किया कि केंद्र सरकार चाहे तो एक्सपर्ट्स की मदद से दूसरे तरीकों की जांच कर सकती है। अगर भविष्य में मजबूत वैज्ञानिक या मेडिकल सबूत सामने आते हैं, तो इस मुद्दे पर फिर संवैधानिक जांच भी हो सकती है।
याचिका में क्या कहा गया था?
वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा ने फांसी की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी।
याचिका में कहा गया कि फांसी से कैदी को लंबे समय तक दर्द और मानसिक तकलीफ हो सकती है।
इसमें अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान के साथ जीने और मरने की बात उठाई गई थी।
याचिका में फांसी की जगह जहरीला इंजेक्शन, गोली, बिजली या गैस चैंबर जैसे विकल्पों पर विचार की मांग की गई थी।
कानून में क्या है प्रावधान?
पुराने CrPC की धारा 354(5) में मौत की सजा पाए व्यक्ति को गर्दन से तब तक लटकाने का प्रावधान था, जब तक उसकी मौत न हो जाए। अब नए BNSS में इसका प्रावधान धारा 393(5) में है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी 1983 के Deena मामले में फांसी की संवैधानिक वैधता बरकरार रख चुका है।
केंद्र सरकार कर चुकी है विचार
2023 में अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने बताया था कि केंद्र फांसी के विकल्पों की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने पर विचार कर रहा है।
2026 की सुनवाई में भी सरकार ने कहा कि मामले की उच्च स्तर पर जांच हो रही है।
कोर्ट ने अब भी केंद्र के लिए विशेषज्ञ समिति के जरिए विकल्प तलाशने का रास्ता खुला रखा है।
पहले भी आया था वैकल्पिक तरीका
2003 में विधि आयोग की 187वीं रिपोर्ट ने फांसी के साथ घातक इंजेक्शन को वैकल्पिक तरीका बनाने की सिफारिश की थी। आयोग ने विज्ञान और मेडिकल तकनीक में बदलाव को देखते हुए इस मुद्दे पर विचार किया था।
लेथल इंजेक्शन पर भी सवाल
Project 39A ने सुनवाई के दौरान कहा कि दूसरे देशों, खासकर अमेरिका में लेथल इंजेक्शन का अनुभव भी पूरी तरह सफल नहीं रहा है। इसलिए किसी भी नए तरीके को अपनाने से पहले वैज्ञानिक और मेडिकल सबूतों की गहराई से जांच जरूरी होगी।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भारत में मौत की सजा देने का मौजूदा तरीका नहीं बदला है। लेकिन कोर्ट ने यह संभावना खुली रखी है कि नई वैज्ञानिक या मेडिकल जानकारी मिलने पर फांसी के तरीके की दोबारा संवैधानिक समीक्षा हो सकती है। साथ ही केंद्र सरकार विशेषज्ञों के जरिए कम दर्द और ज्यादा गरिमा वाले विकल्पों पर विचार कर सकती है।



