चुनावी राज्यों की रणनीतिक तैयारी को अब जमीन पर उतारने के लिए टीम भाजपा तैयार है। राष्ट्रीय पदाधिकारियों की घोषणा के अगले ही दिन पार्टी ने तीन राज्यों के प्रभारी और सह-प्रभारी नियुक्त कर दिए।
इन नियुक्तियों में सबसे चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े को मिली है।
बिहार में भाजपा और एनडीए की रिकार्ड जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महाराष्ट्र के तावड़े के कंधों पर अब भाजपा को उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी जीत दिलाने का जिम्मा है।
वहीं, पेंचीदे चुनावी समीकरणों वाले पंजाब में आम आदमी पार्टी के हाथ से सत्ता खींचने के लिए पार्टी ने राजस्थान के जाट नेता सतीश पूनिया पर भरोसा जताया है तो गुजरात में भाजपा के विजय रथ की राह के कील-कांटे दुरुस्त करने के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व ने भरोसेमंद सांसद तरुण चुग को वहां प्रभारी बनाकर भेजा है।
विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश की चुनौतीपूर्ण कमान सौंपी गई
403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्त प्रशासक की छवि पार्टी के लिए संबल है तो मुख्य विपक्षी के तौर पर सपा के जातीय गणित पर टिकी रणनीतिक चुनौती भी कम नहीं है।
सपा और कांग्रेस का गठबंधन भी फिर से लगभग तय है, ऐसे में अल्पसंख्यक मतों की ध्रुवीकरण भी कई सीटों पर चुनौती बढ़ाता है।
साथ ही संगठन में भी कुछ वरिष्ठ नेताओं के बीच आंतरिक मतभेद के किस्से सामने आते रहते हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए ही पार्टी ने राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े को प्रभारी बनाकर भेजा है। दरअसल, तावड़े विनम्र स्वभाव के साथ सभी को साथ लेकर चलने के माहिर माने जाते हैं।
कैसा रहा सियासी सफर?
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के रूप में राजनीतिक करियर शुरू करने वाले तावड़े सहयोगी दलों के साथ कैसे समन्वय स्थापित करते हैं, यह उन्होंने 2022 में प्रभारी के तौर पर बिहार में जदयू की राजग में वापसी में भूमिका निभाकर और फिर 2025 में राजद-कांग्रेस और अन्य दलों के गठबंधन के जातीय समीकरणों को भेदकर भाजपा-राजग की प्रचंड भूमिका की जमीन तैयार करने में योगदान देकर दिखा दिया है।
बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश में वह कई माह पहले से सक्रिय हो चुके हैं। अब अधिकृत तौर पर उनके जिम्मे ऐसी रणनीति तैयार करने की होगी, जो बिहार की तरह सत्ता विरोधी लहर को काटे, लोकसभा चुनाव में मिले झटके से पार्टी से उबारे और तीसरी जीत का राह प्रशस्त करे।
उनके साथ सह-प्रभारी के रूप में भाजपा ने गुजरात में जमीनी संगठन कार्य में सक्रिय रहे राष्ट्रीय सचिव जगदीश ईश्वरभाई पटेल को लगाया है।
भाजपा के लिए दूसरी चुनौती
दूसरा चुनौतीपूर्ण राज्य है पंजाब। वहां भी अगले साल चुनाव होने हैं। इस राज्य में पार्टी के सामने सत्ता की राह आसान नहीं है। लंबे समय तक शिरोमणि अकाली दल के सहारे यहां कदम जमाती-बढ़ाती रही भाजपा का मुख्य मुकाबला उस सत्ताधारी आम आदमी पार्टी से है, जिसने कि पिछले विधानसभा चुनाव में कुल 117 में से रिकार्ड 92 सीटें जीती थीं। ऐसे में पार्टी ने राष्ट्रीय महासचिव सतीश पूनिया को यहां का दायित्व सौंपा है।
राजस्थान के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष जाट नेता पूनिया इससे पहले पड़ोसी हरियाणा के प्रभारी के रूप में संगठन का कौशल दिखा चुके हैं। यहां सत्ता विरोधी लहर से सामना था और किसान आंदोलन की उठती आंच के बीच भाजपा के लिए जीत की हैट्रिक की राह बनाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गुजरात में किए मिली कमान?
इसी तरह गुजरात का चुनाव पार्टी की साख से जुड़ा है, क्योंकि यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य है। यहां दशकों से भाजपा सत्ता पर काबिज है।
कई राज्यों की तुलना में यहां कांग्रेस का संगठन भी कुछ ठीक स्थिति में है। ऐसे में चुनौतियां भी स्वाभाविक हैं। इसे देखते हुए पार्टी ने हाल ही में केंद्रीय कार्यालय प्रभारी बनाए गए राज्य सभा सदस्य तरुण चुग को गुजरात में प्रभारी बनाकर भेजा है। उनसे यही उम्मीद रहेगी कि भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ में विजय रथ की राह दुरुस्त रहे।



