Sunday, May 26, 2024

लगातार ऐसी गलतियां क्यों?

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कमलनाथ (Kamalnath) को वाकई ‘कमालनाथ’ (Kamalnath) मानना ही पड़ेगा। ये उनकी प्रशंसा नहीं है। इसे निंदा भी नहीं मानना चाहिए। इस शब्द को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की व्याख्या (State Congress President’s explanation) का माध्यम-मात्र समझे। सतना के रैंगांव विधानसभा उपचुनाव के जीत के जश्न (Celebrations of victory of Satna’s Raigaon assembly by-election) में शामिल होने गए कमलनाथ वाकई कमाल ही कर गए। एक रैगांव क्षेत्र की जनता को खुश करने के फेर में उन्होंने खंडवा लोकसभा (Khandwa Lok Sabha) सहित जोबट (Jobat) और पृथ्वीपुर विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं (Voters of Prithvipur Assembly Constituency) की साख पर बट्टा लगाने की हिमाकत कर दी। इन चार सीटों में हुए उपचुनाव (by-election) में कांग्रेस (Congress) को रैगांव में विजय मिली है। इसलिए कमलनाथ ने वहां कह दिया कि रैगांव की जनता भोली है लेकिन मूर्ख (fool) नहीं है। वह बिकाऊ नहीं है। ये बातें इस सन्दर्भ में कही गयीं कि इस क्षेत्र की जनता ने कांग्रेस को जिताया है। अब एक सवाल तो पूछा ही जा सकता है। वह यह कि क्या कमलनाथ के अनुसार खंडवा, जोबट और पृथ्वीपुर की जनता मूर्ख है (People of Khandwa, Jobat and Prithvipur are fools?) ? बिकाऊ है? या फिर पिछले 28 सीटों पर हुए उपचुनाव में जहां कांग्रेस हारी, वहां की जनता मूर्ख है या फिर 2018 के विधानसभा चुनाव में जिन 116 सीटों पर कांग्रेस को हारना पड़ा था, क्या वहां की जनता भी मूर्ख थी। या फिर बिकाऊ? जहां पर लोगों ने कांग्रेस को खारिज कर दिया है, उन स्थानों के मतदाताओं पर तो कमलनाथ ने सवालिया निशान लगा दिया है। अपनी पार्टी की जीत के लिए रैगांव की जनता को यदि कमलनाथ ने सीधा-सादा बताया है तो फिर क्या उनका दृष्टिकोण यह भी माना जाए कि शेष सीटों के मतदाता सीधे-सादे नहीं हैं?

पता नहीं नाथ के इस कथन के पीछे कौन सा तत्व काम कर रहा था? वे एक सीट रैगांव की जीत की खुशी में ऐसा बोल गए या फिर तीन अन्य सीटों की पराजय के कसैलेपन ने उन्हें ऐसी विचित्र बातें कहने के लिए उकसावा दे दिया? दमोह विधानसभा उपचुनाव (Damoh assembly by-election) में कांग्रेस की जीत के बाद कमलनाथ इन चार सीटों को लेकर भारी उत्साहित थे। वे तो उस एक दमोह फार्मूले (Damoh Formulas) का भी गदगद अंदाज में गुणगान करने लगे थे, जो फार्मूला कभी रचा ही नहीं गया। कांग्रेस को इस बात की भी उम्मीद थी कि महंगाई (खासकर पेट्रोल और डीजल के दाम) को लेकर मतदाता भाजपा (BJP) को जोरदार पटखनी दे देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर जहां तक रैगांव की बात है तो वहां भाजपा को कांग्रेस की बजाय उसके अपनों ने ही निपटाया है। खासकर बागरी परिवार की अंतर्कलह (Bagri family feud) ने प्रतिमा बागरी (Pratima Bagri) की कल्पना की प्रतिमा को बनने से पहले ही मिट्टी में मिला दिया।

खैर, जीत अंतत: जीत ही होती है। इसलिए रैगांव को लेकर कांग्रेस का यूं खुश होना स्वाभाविक है। किंतु खुशी को व्यक्त करने का कमलनाथ का ये तरीका समझ से परे है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने आगे कहा कि शेष तीन सीटों पर भाजपा ने चुनाव जीता नहीं, बल्कि लूटा (BJP did not win elections on three seats, but looted) है। यदि वाकई ये लूट इतनी आसान होती तो फिर क्या वजह थी कि भाजपा अपनी परंपरागत रैगांव सीट को यूं अपने हाथ से निकल जाने देती? यदि जोबट और पृथ्वीपुर सीट भाजपा कांग्रेस से कथित रूप से लूट सकती थी तो फिर ऐसी ही राजनीतिक वारदात को उसने दमोह में अंजाम क्यों नहीं दे दिया? या फिर क्या वजह रही कि वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा अंगुलियों पर गिनी जा सकने लायक सीटें भी नहीं ‘लूट’ सकी थी?

चलिए, लगे हाथों नाथ के एक और वाक्य पर भी गौर कर लें। उन्होंने रैगांव में यह भी कहा कि यहां की जनता ने शिवराज सिंह चौहान की घंटी बजाई है, मोदीजी (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi)) की घंटी बजाई है। तो सवाल यह उठता है कि खंडवा, जोबट और पृथ्वीपुर की जनता ने क्या कांग्रेस की आरती उतारी है? जोबट और पृथ्वीपुर से कांग्रेस को जिस तरह जनता ने बेदखल किया, घंटी बजाने की बजाय वह घंटा बजाने के समान है, जिसकी गूंज में कांग्रेस के कान सुन्न Congress ears numb() पड़ गए होंगे। हैरत है कि इसके बाद भी कमलनाथ की तन्द्रा जैसे भंग ही नहीं हो पा रही हो। वे आत्ममुग्धता की स्थिति के लिए किसी अंगद के पांव की तरह वाला आचरण अपनाये हुए हैं।

इस सबके बावजूद कमलनाथ की समझदारी पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। उनका लंबा और सफल राजनीतिक करियर है। जीवन का उन्हें खासा अनुभव हासिल है। लेकिन उनकी समझ पर सवाल तो उठ ही सकते हैं? आखिर ऐसा क्या हो जाता है कि कोई व्यक्ति तब चुप्पी साध लेता है, जब उसकी जीवन की सबसे बड़ी साध पूरी होने के बाद भी उसका बुरी तरह अमंगल हो रहा हो? और वही व्यक्ति ऐसे मौके पर क्यों ‘आयटम (item)’ जैसी बात कह गुजरता हो, जब सभी को पता हो कि उसकी एक भी भूल आत्मघाती हो सकती है? कोई व्यक्ति भला कैसे अपने ही विधायकों को ‘चलो-चलो, आगे बढ़ो’ कहकर खुद के ही लिए बाहर निकलने का रास्ता बना लेता हो और फिर इतना भी राजनीतिक कौशल न अपना सकता हो कि जाते हुओं को रोक पाए? ये ना समझे कि कमलनाथ राजनीतिक वानप्रस्थ (Kamal Nath Political Vanprastha) के प्रभाव में आकर ऐसे विचित्र कमाल कर रहे हैं। जब तक बेटे नकुलनाथ son nakulnath() की राजनीतिक जड़ें मजबूत नहीं होती, तब तक पिता कमलनाथ किसी भी सूरत में खुद को मुख्यधारा से अलग नहीं कर पाएंगे। तो फिर एक के बाद एक इस तरह की गलतियां क्यों? क्या ये मामूली प्रश्न है?

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