Wednesday, May 22, 2024

इसमें उनके खुश होने के लिए कुछ नहीं है……

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने देश के कुछ हिस्से के किसानों के लगातार विरोध (Farmers’ constant protest) के बाद आखिरकार विवादों (controversies) से घिरे तीनों कृषि कानूनों (three agricultural laws) को वापस लेने या कहे रद्द करने  का एलान कर दिया है। लेकिन इसमें उन राजनीतिक दलों (Political parties) के लिए खुश होने के लिए कुछ नहीं है, जो इन कानूनों को लेकर किसानों के कंधों से राजनीतिक निशाना (Political target from the shoulders of farmers) साध रहे थे। इसका बड़ा कारण यह है कि देश के राजनीतिक परिदृश्य में किसान कभी कोई एक राजनीतिक इकाई के तौर पर शामिल नहीं हुआ है। उसकी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं में किसान होने से ज्यादा दूसरे तत्व ज्यादा शामिल हैं। मसलन वो उसकी जाति या क्षेत्र भी हो सकता है, या फिर उसकी अपनी राजनीतिक पसंद भी। या फिर दूसरे वे मुद्दे जिनसे देश भी प्रभावित होता है। आखिर मोदी (MODI) या भाजपा (BJP) को 2019 में जो भारी भरकम समर्थन (Support) सरकार बनाने के लिए हासिल हुआ, उसमें इस किसान का भी वोट (farmer’s vote) शामिल था ही। जाहिर है मोदी ने यह तीनों कानून भारी भरकम तरीके से अड़ने के बाद वापस लिए हैं, तो यह उनकी भी राजनीतिक मजबूरी है। इन कानूनों पर लंबे विरोध के बाद इसे वापस लेना जाहिर तौर पर फिलवक्त मोदी की राजनीतिक हार के तौर पर देखा जाएगा।

हालांकि किसान आंदोलन की आड़ में भारी राजनीतिक मुनाफा (political profit) कमाने की जो लोग कोशिश कर भी रहे थे तो उनकी यह कोशिश औंधे मुंह नीचे गिरी है। देश में अगले साल उत्तरप्रदेश (Uttar Pradesh), पंजाब (Punjab), उत्तराखंड (Uttarakhand), गोवा (Goa) और मणिपुर (Manipur) में विधानसभा के चुनाव (assembly elections) होना हैं। कांग्रेस सहित आम आदमी पार्टी उम्मीद (AAP) से थी कि किसान आंदोलन (farmers movement) का उन्हें उत्तरप्रदेश या पंजाब जैसे राज्यों में लाभ मिलेगा। राकेश टिकैत (Rakesh Tikait) की नजर उत्तर प्रदेश में स्वयं को किसानों के बड़े नेता के तौर पर स्थापित कर चुनाव के बाद किसी बहुत बड़े पद पर टिकी हुई थी। यही वजह रही कि इन राज्यों में अपने-अपने शुभ-लाभ की गरज से किसान आंदोलन को फंडिंग (funding) देने के लिए भी होड़ मची रही। यह फंडिंग उजागर स्वरूप में नहीं हुई, लेकिन वह छिपी भी नहीं रह सकी। दिल्ली की सरहद (Delhi border) पर इस आंदोलन को जिस शानदार तरीके से पांच सितारा स्वरूप प्रदान किया गया, वैसा करने की हैसियत 90 फीसदी से भी अधिक किसानों की नहीं है। स्पष्ट है कि आंदोलन को ‘आकर्षक’ बनाकर किसानों के जरिये अपनी दुकानें चमकाने के इच्छुक लोगों ने यह सोचकर ऐसा इन्वेस्टमेंट (investment) किया था कि चुनाव में उन्हें इसका लाभ मिलेगा।

लेकिन आज सब धरा का धरा रह गया और इस तरह के राजनीतिक सपने (political dreams) यथार्थ की जमीन से टकराकर चूर-चूर हो गए दिखते हैं। राकेश टिकैत यदि यह कह रहे हैं कि आंदोलन वापस नहीं होगा, तो यह उनकी खीझ का प्रतीक है। क्योंकि वह जानते हैं कि यदि किसान अपने-अपने घर को लौट गए तो फिर उत्तरप्रदेश के करीब छह महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में अपनी किसान नेता वाली आज की छवि को ताजा रखना उनके लिए नामुमकिन हो जाएगा। राहुल गांधी ()Rahul Gandhi और उनकी बहन प्रियंका वाड्रा (Priyanka Vadra) आज जिस तरह से किसानों की दुर्दशा (plight of farmers) की बात कर रहे हैं, वह यही दर्शाता है कि कांग्रेस (Congress) को किसानों के द्वारा वह सब भूल जाने का खौफ सता रहा है, जो इस आंदोलन के जरिये उसके दिमाग में भरा जा रहा था। इस पर रही-सही कसर PMने यह कहकर पूरी कर दी है कि MSPमें सुधार के लिए गठित होने वाली समिति में किसानों को भी शामिल किया जाएगा। जाहिर है कि इससे सांप-छछूंदर वाली स्थिति बन जाएगी। जो किसान नेता इस समिति में आएंगे, उन पर सरकार के आदमी होने का ठप्पा लग जाएगा। और यदि उन्होंने समिति में आने से इंकार किया तो यह सन्देश भी चला जाएगा कि वे किसानों को उपज का उचित मूल्य (fair value of produce) दिलाने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया से दूर भाग रहे हैं।

पंजाब (Punjab) में कैप्टन अमरिंदर सिंह (Capt Amarinder Singh) ने कह दिया है कि यह कानून वापस (back the law) होने के बाद वह अब भाजपा (BJP) के साथ काम करने के इच्छुक हैं। फिलहाल तो यह इच्छा साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने का ही रूप लेती दिख रही है। पंजाब में कांग्रेस भारी गुटबाजी की शिकार है। नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Sidhu) कभी भी नहीं चाहेंगे कि चरणजीत सिंह चन्नी (Charanjit Singh Channi) के नेतृत्व में पार्टी को जीत मिले। ऐसा होने पर सिद्धू के अपने ही गृह राज्य में ग्रह बिगड़ना तय है। बाकी कैप्टन की नाराजगी तो पहले ही कांग्रेस की राह में कांटे बिखेरने का पुख्ता बंदोबस्त कर चुकी है। शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने इन्हीं कानूनों की आड़ में केंद्र सरकार से समर्थन वापस (Withdraw support from central government) लेकर किसानों की लड़ाई के कंधे पर सवार होकर एक बार फिर पंजाब की सत्ता की चौखट लांघने (Breaking the door frame of Punjab’s power) का दांव खेला था। अब उसके लिए भी पंजाब के चुनाव तक इन कानूनों की लड़ाई को खींचना आसान नहीं रह जाएगा। आम आदमी पार्टी (AAP) की भी यही स्थिति दिखती है। फायदा भाजपा के खाते में जाता दिख रहा है। क्योंकि कैप्टन किसानों के नेता और भाजपा किसानों के हित में कानून वापस लेने वाली पार्टी के तौर पर हाथ में हाथ डाले सामने रहेंगे।

प्रियंका वाड्रा आज कह रही हैं कि आंदोलन के दौरान करीब 700 किसानों (700 farmers) की जान ले ली गयी। अब उन्हें कौन समझाए कि वास्तव में ऐसा ही होता तो करीब साल भर की कोशिशों के बाद भी किसान आंदोलन बमुश्किल ढाई राज्यों तक ही असर नहीं करता। उसकी लपट पूरे देश में फैल सकती थी। ऐसा कहना कांग्रेस (congress) की मजबूरी है ताकि कानून वापस लेने के बाद सामान्य होते किसान के घाव चुनाव तक ताजा ही बने रहें। योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) की सख्ती के चलते राकेश टिकैत (Rakesh Tikait) अपनी तमाम घोषणाओं के बावजूद उत्तर प्रदेश के घेराव की हिम्मत नहीं जुटा सके। अब उनके लिए यह साहस जुटाना भी बड़ी चुनौती होगी कि वे कैसे उन किसानों को अपने नेतृत्व में लामबंद कर सकेंगे, जो इस बात को समझ चुके हैं कि यह कानून केंद्र ने वापस लिया है। यदि टिकैत केंद्र को कानूनों की वापसी के लिए विवश करने की क्षमता रखते तो ऐसा तब हो जाना चाहिए था, जब किसान आंदोलन दुनिया-भर में सुर्खियां बटोर रहा था। पूरी तरह सुस्त हो चुके आंदोलन के बाद केंद्र ने जो कदम उठाया, उसने इस निर्णय का क्रेडिट लेने की इन सभी लोगों की संभावनाओं को बहुत कमजोर कर दिया है।

अब उलटा  यह हो रहा है कि  कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) सहित टिकैत गुट के बीच इस सफलता का क्रेडिट लूटने की होड़ (credit robbing spree) मच गयी है। उत्तरप्रदेश में अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) भी इस होड़ में शामिल हो गए हैं। जाहिर है कि इन सभी के बीच वह किसान वोट (farmer vote) विभाजित होकर कमजोर हो जाएगा, जो आंदोलन की ज्वाला (flame of movement) दहकती रहने की सूरत में एकजुट होकर भाजपा के लिए बड़ी मुसीबत का सबब बन सकता था। हालांकि किसानों के एकजुट होकर किसी राजनीतिक दल को पटकनी देने का कोई पुराना घटनाक्रम मौजूद नहीं है। हां, यह जरूर देखने में आया है कि किसानों से कर्ज माफी का वादा (loan waiver promise to farmers)  करके वोट लिया भी जा सकता है और बाद में जब यह पूरा नहीं हो पाता है तो इसका खामियाजा भी राजनीतिक दलों के खाते में गया है। तो क्या ऐसा होता नहीं दिख रहा है कि किसान सम्मान निधि (Kisan Samman Nidhi), MSP के लिए नयी समिति सहित एकाध और किसी कार्यक्रम के तहत भाजपा किसानों को आंदोलन वाली बात भूला कर सामान्य स्थिति में ला दें? किसाना आंदोलन को लेकर खदबदाते दो राज्यों में से पंजाब में तो वैसे भी भाजपा के लिए कोई खास आसार नहीं है। लेकिन उत्तरप्रदेश का विधानसभा चुनाव उसके लिए खास मायने रखता है। ऐसे में पश्चिमी उत्तरप्रदेश के नतीजों से ही यह समझ में आएगा कि राजनीतिक परिस्थितियों पर किसान आंदोलन क्या असर डाल सकता है। फिलहाल किसान आंदोलन की आड़ में राजनीतिक उत्सव मनाने के कई मंसूबों को नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने तगड़ा झटका दे दिया है।

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