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दिल्ली दंगे मामले में दिए गए अपने ही फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल

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दिल्ली दंगा मामलों में एक्टिविस्ट उमर खालिद और शरजील इमाम को राहत नहीं मिली थी। शीर्ष कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करने वाले अपने ही कोर्ट के फैसले की कड़ी आलोचना की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा यूएपीए के तहत भी बेल नियम है और जेल अपवाद।

सुप्रीम कोर्ट में शरजील और उमर खालिद का मामला

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को दिल्ली दंगा बड़ी साजिश मामले में जमानत से इनकार करने वाले सुप्रीम कोर्ट पूर्व के फैसले पर सवाल उठाया है। सोमवार को अदालत ने कहा कि जनवरी 2025 में दो-जजों की पीठ की ओर से दिए गए गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य फैसले में 2021 के तीन जजों के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केए नजीब में दिए गए फैसले का सही पालन नहीं किया गया।

शीर्ष कोर्ट ने साफ कहा कि लंबे समय तक मुकदमे में देरी, यूएपीए जैसे मामलों में भी जमानत का आधार हो सकती है और छोटी पीठ बड़ी पीठ के फैसले को कमजोर नहीं कर सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के मामलों में भी मुकदमे में अत्यधिक देरी जमानत का वैध आधार हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यूएपीए के तहत भी जमानत ही नियम है और जेल अपवाद।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी वी नागरत्ना की अगुवाई वाली बेंच ने दिल्ली दंगों से जुड़े गुलफिशा फातिमा मामले में दो-न्यायाधीशों की पीठ के फैसले पर असहमति जताते हुए कहा कि उसमें केए नजीब मामले के सिद्धांतों का सही पालन नहीं किया गया। शीर्ष अदालत ने कहा कि केए नजीब फैसला बाध्यकारी कानून है और इसे ट्रायल कोर्ट, हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की छोटी पीठ भी कमजोर, दरकिनार या नजरअंदाज नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने ‘गुलफिशा फातिमा’ फैसले में इस व्याख्या पर भी आपत्ति जताई कि ‘केए नजीब’ केवल असाधारण मामलों में लागू होता है। अदालत ने कहा कि लंबे समय तक हिरासत, यदि परिस्थितियों से उत्पन्न हो, तो जमानत पर विचार जरूरी है।

बेल नियम और जेल अपवाद

पीठ ने कहा कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’ संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 से निकला सिद्धांत है, जबकि निर्दोषता की धारणा कानून के शासन वाली सभ्य समाज की आधारशिला है। अदालत ने यह भी कहा कि यूएपीए के तहत भी सामान्य सिद्धांत यही रहेगा कि जमानत नियम है, हालांकि मामले के तथ्यों के आधार पर उपयुक्त परिस्थितियों में जमानत से इनकार किया जा सकता है। दिल्ली दंगा मामलों में सुप्रीम कोर्ट पहले कई आरोपियों को जमानत दे चुका है, लेकिन एक्टिविस्ट उमर खालिद और शरजील इमाम को राहत नहीं मिली थी।

अदालत ने कहा कि ‘बेल नियम है और जेल अपवाद’ का सिद्धांत यूएपीए मामलों में भी लागू होता है। अदालत ने कहा कि धारा 43डी(5) का प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन रहेगा। कोर्ट के शब्दों में, “हमें कहने में कोई संदेह नहीं कि यूएपीए के तहत भी बेल नियम है और जेल अपवाद। हालांकि, अदालत ने यह भी जोड़ा कि किसी उपयुक्त मामले में तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए जमानत से इनकार किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जवल भुइयां की पीठ ने यह टिप्पणी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए की। अंद्राबी छह साल से अधिक समय से यूएपीए और एनडीपीएस कानून के तहत जेल में बंद है। उस पर नारकोटिक्स की सप्लाई के जरिए आतंक फंडिंग का आरोप है। फैसला लिखते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि ‘केए नजीब’ में तीन-जजों की पीठ ने स्पष्ट रूप से माना था कि मुकदमे में अत्यधिक देरी और लंबी कैद, संवैधानिक अदालतों को यूएपीए की धारा 43डी(5) की कठोरता के बावजूद जमानत देने का आधार देती है। इसके बावजूद ‘गुरविंदर सिंह’ और ‘गुलफिशा फातिमा’ में दो-जजों की पीठों ने अलग रुख अपनाया, जिसे स्वीकार करना कठिन है।

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