केंद्र ने परमाणु दुर्घटना मुआवजा 3,000 करोड़ तक सीमित किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट ने कहा कानून से सीमा तय होने पर भी न्यायालय मुआवजा तय कर सकते हैं।
प्रशांत भूषण ने फुकुशिमा का हवाला देकर कहा नुकसान हजारों करोड़ हो सकता है, अमेरिका में सीमा 100 गुना ज्यादा है, कोर्ट जुलाई में विस्तृत सुनवाई करेगा।
केंद्र सरकार ने देश के न्यूक्लियर पावर प्लांट में किसी अप्रिय घटना की स्थिति में मुआवजे की अधिकतम सीमा को 3,000 करोड़ रुपये तक सीमित कर दिया है, अब इस नए कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
अदालत ने याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा, अप्रत्याशित न्यूक्लियर पावर प्लांट दुर्घटना की स्थिति में नागरिकों के प्रति सरकार की अतिरिक्त देयता निर्धारित करने से अदालतें नहीं रोकी जा सकतीं, भले ही अधिनियम के तहत इसे सीमित कर दिया गया हो।
सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की तीन जजों की बेंच वाली पीठ ने कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे बेहद संवेदनशीन विधायी नीतिगत मुद्दे हैं और इस पर विस्तृत सुनवाई होगी।
कोर्ट की यह टिप्पणी याचिकाकर्ता ई एस शर्मा के वकील प्रशांत भूषण के उस बयान के बाद आई, जिसमें उन्होंने कहा था कि मुआवजे को सीमित कर दिया गया है, जबकि दुर्घटना कि स्थिति में नागरिकों को दिया जाने वाला मुआवजा हजारों करोड़ रुपये तक हो सकता है।
क्या हमारे पास मजबूत मुआवजा तंत्र है?
पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, ‘हमारी चिंता यह है कि यदि कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना होती है और किसी व्यक्ति को चोट या क्षति पहुंचती है, तो क्या हमारे पास इसके लिए एक मजबूत मुआवजा तंत्र मौजूद है?’
अदालत में याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करते हुए, अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि कुल दायित्व की सीमा तय करने सहित तीन मुख्य मुद्दे हैं।
भूषण ने 2011 में जापान में हुई फुकुशिमा दाइची परमाणु ऊर्जा संयंत्र दुर्घटना का हवाला देते हुए दलील दी, ‘यदि कोई परमाणु दुर्घटना होती है तो उससे होने वाला नुकसान इससे सैकड़ों गुना अधिक होता है।’
उन्होंने दलील दी कि सरकार नीति के माध्यम से जो चाहे कर सकती है लेकिन वह नागरिकों के अधिकारों की बलि नहीं चढ़ा सकती।



