Wednesday, May 22, 2024

धन्यवाद सुप्रीम कोर्ट

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निहितार्थ : देश की सबसे बड़ी अदालत (supreme court) का धन्यवाद (Thank you)। कोरोना से दम तोड़ने वाले सभी लोगों को मुआवजा देने का सुप्रीम कोर्ट ने आज केन्द्र सरकार (central government) को आदेश दिया। यह समय की बहुत बड़ी जरूरत है। कोरोना (Corona) से असंख्य लोगों ने दम तोड़ा है। उनका इलाज करवाने में अनगिनत परिवार कंगाली की दहलीज (Countless families on the threshold of poverty) पर पहुंच गए हैं। अर्थव्यवस्था का घरेलु स्ट्रक्चर (domestic structure of the economy) तहस-नहस हो गया है। हालांकि ये मुआवजा (compensation) देने के लिए केंद्र सरकार राजी नहीं थी। इसके लिए उसकी अपनी दलीलें थीं। लेकिन जाहिर है उनमें दम नहीं, बहाना ज्यादा था। केन्द्र सरकार कोरोना और अन्य आपदाओं में कोर्ट को अंतर बता रही थी। जाहिर सी बात है कि भूंकप, आंधी, तूफान या अन्य प्राकृतिक आपदाओं (natural disasters) की तुलना में कोरोना का प्रसार ज्यादा व्यापक है। मौतें बेहिसाब हैं। अगर लोग भूंकप, तूफान (earthquake, storm) जैसी आपदाओं में उजड़ते हैं तो कोरोना ने भी देश में कई परिवारों को उजाड़ा है। अब केंद्र को इस व्यवस्था के बाद यह मुआवजा देना ही होगा। इस बारे में पिटीशन लगाने वाले चाहते थे कि प्रत्येक मौत के हिसाब से चार-चार लाख रुपये का हजार्ना मिले। लेकिन कोर्ट ने रकम तय करने का अधिकार सरकार को दे दिया। इस तरह अदालत ने शासन व्यवस्था की हालत को भी ध्यान में रखकर निर्णय दिया। निश्चित ही यदि हर मृतक को चार लाख रुपये का मुआवजा देना होता तो यह सरकार के खजाने पर बहुत बड़ा बोझ हो सकता, लेकिन होता तो होता। यह तो सरकार भी मान रही है कि आपदा कोष में उसके पास पर्याप्त पैसा है। वैसे भी पीड़ितों को राहत के जो पचास हजार, लाख दो लाख रूपए दिए जाते हैं, वे किसी के जीवन यापन का आधार तो नहीं होते। वक्ती सहायता पीड़ित को कम से कम खड़ा होने में मदद तो करती ही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) के लिए कोरोना के समय में यह दूसरा बेइज्जती से भरा मामला (second case of humiliation) है। सन 2019 के लोकसभा चुनाव (2019 Lok Sabha Elections) के बाद से मोदी किसी जिद्दी की तरह आचरण करने लगे हैं। कोरोना के समय उन्होंने वैक्सीनेशन की व्यवस्था (vaccination system) का जिम्मा राज्यों पर थोप दिया। नतीजा यह हुआ कि एक तरफ असंख्य लोग वायरस (virus) से मरते गए और दूसरी तरफ राज्य वैक्सीन की कमी या उस बारे में आधे-अधूरे इन्तेजामात से जूझते नजर आये। फिर जब सुप्रीम कोर्ट ने जमकर फटकार लगाई तो मोदी ने यकायक बहुत नाटकीय अंदाज में वैक्सीनेशन का काम केंद्र को देने का ऐलान किया। मुआवजे को लेकर भी केंद्र का ऐसा ही हठ वाला रवैया रहा। यह दलील निश्चित ही दमदार है कि मुआवजे की राशि बचाकर देश में हेल्थ सेक्टर (health sector) को और मजबूत किया जा सकता है। लेकिन ये दलील समयानुकूल नहीं थी। कोरोना से दम तोड़ने वालों के परिवारों में से कई भुखमरी की स्थिति में आ गए हैं। विशेष रूप से वह परिवार, जिनका इकलौता कमाने वाला सदस्य काल का निवाला बन गया हो। ऐसे में केंद्र को खुद चाहिए था कि कोई बीच का रास्ता निकालते हुए पीड़ितों की आर्थिक मदद और कोरोना की तीसरी लहर (third wave of corona) से निपटने के प्रबंध साथ-साथ करता। तब उसने ऐसा करने में रूचि नहीं ली और अब ऐसा न करने की अरुचि के बावजूद उसे अदालत के निर्देश पर आगे बढ़ना ही होगा।

इस फैसले ने एक बार फिर आम आदमी (common man) के लिए अदालती व्यवस्था के महत्व को स्थापित कर दिया है। उसका यह यकीन मजबूत हुआ है कि यदि हुकूमत में उसकी सुनवाई नहीं होती तो फिर हुकुम देने वाली व्यवस्था उसकी मदद कर सकती है। केंद्र सरकार के आपदा कोष में पर्याप्त पैसा है। यह राशि कम से कम इतनी तो होगी ही कि इससे कोरोना से मृतकों (dead from corona) को संतोषजनक क्षतिपूर्ति दी जा सके। सरकार ने अदालत में दलील दी कि चार लाख का मुआवजा वह आपदा में देती है, महामारी में नहीं। इस तर्क से पहले यह तो सोच लेना चाहिए था कि ये किसी आम महामारी (common pandemic) का मामला नहीं है। यह वह ग्लोबल आपदा (global disaster) है, जिसने लाखों लोगों की जान ले ली है और जो लाखों अन्य की जान पर भी संकट बनकर मंडरा रही है। कोरोना की तो किसी भी अन्य आपदा से तुलना की ही नहीं जा सकती है। सच कहें तो ऐसी तुलना करना अमानवीयता की पराकाष्ठा होगी। क्या यह वायरस से दम तोड़ने वालों का गुनाह है कि वे इसकी बजाय किसी आपदा के शिकार नहीं हुए? क्या ये आम जनता की भूल है कि उसने कोरोना से मौत की बजाय किसी चार लाख की कीमत वाले हादसे के जरिये मरना पसंद नहीं किया? ये सवाल विचलित करते हैं। घिसट-घिसटकर मरे लोगों को राहत देने के नाम पर सरक-सरक कर चलते सिस्टम की ये घोंघा चाल गुस्से से भर देती है। ऐसे में यदि इन भावनाओं को सुप्रीम कोर्ट की वजह से राहत का स्वरूप मिल पाता है तो यह बहुत ही सुखद और सुरक्षित आश्वासन की कायमी का प्रतीक है।

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