Wednesday, May 22, 2024

सही कदम उठाया शिवराज ने

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शिवराज सरकार (Shivraj government) की यह सख्ती पूरी उदारता के साथ स्वागत योग्य है। शिकायतें लंबे समय समय से थी और कमोवेश सही थीं। देर आयद दुरूस्त आयद। हर विसंगति के सामने आने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (Chief Minister Shivraj Singh Chauhan) अब कम से कम निर्णय लेने में देर नहीं कर रहे हैं। शिवराज सरकार ने कोरोना (Corona) की आड़ में लोगों को नोचने-खसोटने वालों पर शिकंजा और तेजी से कसना शुरू कर दिया है। अस्पतालों (Hospitals) द्वारा ज्यादा बिल वसूलने पर कानूनी कार्रवाई (legal action) की जा रही है। सरकार ने बकायदा लोगों को अस्पताल की शिकायतों के आधार पर पुलिस को FIR करने के लिए भी कह दिया है। ज्यादा वसूली करने वाले अस्पतालों से सरकार पीड़ितों को उनके पैसे वापस दिलाने का काम भी कर रही है। ये बहुत अधिक जरूरी और बहुत समय से उठाया गया कदम है। इसी तरह आयुष्मान कार्ड (Ayushman card) से इलाज के लिए उठाया गया कदम लाखों गरीब परिवारों (Millions of poor families) के लिए एक बड़ा आधार बन जाएगा। परिवार में यदि एक कार्ड है तो भी सभी का इलाज होने जैसी व्यवस्था लोककल्याण की दिशा में एक बड़ा कदम है।

इस मामले में सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि जो भी अस्पताल इसमें कोताही बरतेगा या आनाकानी करेगा तो उसका License रद्द कर दिया जाएगा। इस समय बड़े निजी अस्पताल एक तरह से कोविड-19 (Covid-19) की विभीषिका को भी पैसे की उगाही का जरिया बनाकर आम लोगों को बुरी तरह निचोड़ने के काम में लगे हैं। प्राइवेट अस्पताल (Private hospital) में बड़ी संख्या में लोगों ने इलाज के नाम पर दम तोड़ दिया और उनकी दवा-दारू के लिए परिजनों से भारी-भरकम बिल वसूलने में कोई रहम नहीं बरता जा रहा था। उस पर आक्सीजन (Oxygen) और जरूरी दवाओं (Essential medicines) के कृत्रिम अभाव वाली सूरत बनाकर इनकी कालाबाजारी (Black marketing) ने तो समूचे सिस्टम के अस्तित्व और उपयोगिता पर ही सवालिया निशान लगा दिया था।





इसलिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले एक दो दिन में जो भी कदम कोरोना से लड़ाई की दिशा में उठाएं हैं, इन्हें स्वागत योग्य कदम ठहराया जा सकता है। लेकिन शिवराज को अपने कदमों की निगरानी के लिए भी खुद ही सतर्क रहना होगा। वजह यह कि इस सख्त व्यवस्था (Strict arrangement) को लागू करने का जिम्मा शिवराज के जिन अफसरों के पास है, उनमें से ज्यादातर कोरोना की दूसरी लहर में असफल ही साबित हुए हैं। उन पर कोरोना प्रभावितों सहित इससे मरने वालों की संख्या छिपाने का आरोप लगता रहा। और आरोप भी जिस तथ्यपूर्ण तथा विश्वसनीय शैली में लगे, उनका खंडन करने के लिए भी इन जिम्मेदार अफसरों (Responsible officers) के पास न शब्द थे और न ही तर्क।





निश्चित ही कोरोना के इस फेज ने दुनिया भर की सरकारों को घुटने के बल बैठकर पनाह मांगने के लिए मजबूर कर दिया है। मध्यप्रदेश (Madhya pradesh) भी इसका अपवाद नहीं है। बीते साल इस वायरस के पहले चरण (First stage) का शिवराज ने बाकी कई राज्यों के मुकाबले बहुत सफलता से मुकाबला किया था। मगर अब परिस्थितियां पूरी तरह से बदल चुकी हैं। सीमित संसाधनों के बीच ही हालात पर काबू पाना है। ऐसे में यह अनिवार्यता हो जाती है कि संसाधनों के अधिकाधिक और समुचित इस्तेमाल को सुनिश्चित किया जाए। मगर प्रदेश में ऐसा नहीं हो सका था। हालांकि शिवराज ने अपनी आदत के मुताबिक दिन रात लगाकर मेहनत की है लेकिन ऐसी ही मेहनत मैदानी अफसर (Field officer) तो कर रहे हैं लेकिन जिन पर रणनीति तय करने की जिम्मेदारी है, मंत्रालय (Ministry) में बैठे वे बड़े बाबू इस मामले में पिछड़ गए हैं। इधर मुख्यमंत्री जरूरी सामान एवं मदद की उपलब्धता के लिए कोशिश करते रहे और उधर अफसर इस तथ्य से आंखें मूंदकर बैठ गए कि लोग किस कदर निजी अस्पतालों में लुटे जा रहे हैं। जाहिर है कि मुख्यमंत्री तक यह कड़वा सच पहुंचने तक हालात पूरी तरह बेकाबू हो चुके थे। यही कारण है कि शिवराज को इस दिशा में भी सीधा हस्तक्षेप करते हुए बहुत सख्त कदम उठाने पड़ गए हैं।

 

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गंभीर तथा विश्वसनीय विचारकों को पढ़िए। लगभग शत-प्रतिशत इस बात को मानते हैं कि यदि किसी राज्य में कल्याणकारी शासन वाली परिकल्पना स्थापित करनी है तो फिर वहां स्वास्थ्य और शिक्षा के सेक्टर में बिल्कुल भी लापरवाही (Negligence) नहीं होना चाहिए। मगर दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पा रहा है। सरकारों के कामकाज की शैली का नतीजा यह कि आदमी को अपनी सेहत की चिंता हो या बच्चों का भविष्य संवारना हो, वह क्रमश: प्राइवेट अस्पताल (Private hospital) और स्कूलों का रुख करने में ही बेहतरी समझता है। और इसी बात का इन निजी संस्थानों (Private institutions) द्वारा मनमर्जी के जरिये फायदा उठाया जाता है। ऐसे में शिवराज सरकार द्वारा निजी अस्पतालों के ‘इलाज’ की दिशा में उठाया गया यह कदम देर से ही सही मगर स्वागत योग्य कहा जाएगा।

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