पीएम मोदी मोदी ने रविवार सुबह राजघाट जाकर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी। इसके बाद वे अटलजी की समाधि और नेशनल वॉर मेमोरियल गए। वहीं उन्होंने करीब 12 बजे पीएम आवास पर संभावित मंत्रियों के साथ चाय के साथ मीटिंग की। इस दौरान मोदी ने मंत्री पद की शपथ लेने वाले सभी को नसीहत दी है कि शपथ लेने के साथ तुरंत काम पर जुट जाए।
मोदी की नेतृत्व की असली परीक्षा अब आरंभ हुई है। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार सफलता के साथ पांच साल तक चली तो सोनिया गांधी की अगुआई में यूपीए सरकार ने दस साल तक उल्लेखनीय रूप से शासन चलाया। वाजपेयी अपनी सर्व-स्वीकार्य छवि के चलते सहयोगी दलों की गुड बुक में बने रहे और यूपीए के समय कांग्रेस राजनीति में इतनी बेअसर हो चुकी थी कि कांग्रेस तब गठबंधन वाले दलों को अपने पर हावी होने से रोकने में कामयाब नहीं हो पाई।
डॉ. मोहन यादव मुख्यमंत्री के तौर पर भले ही नए हों लेकिन सार्वजनिक जीवन के अनुभवी नेता तो हैं। और खास बात यह कि इस अनुभव का ककहरा उन्होंने जमीन से जुड़े कार्यकर्ता से लेकर विधायक और मंत्री के रूप में सीखा है।
डॉ. मोहन यादव के लिए बड़ा जोखिम है। गृह विभाग उनके पास ही रहेगा। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है कि बेहद लोकप्रिय और कालांतर में चुनौती-विहीन साबित हुए शिवराज सिंह चौहान तक इस महकमे को संभालने से बचते रहे। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने यह विभाग खुद ही संभाला है और उनके इस निर्णय को राज्य में कठोर कानून-व्यवस्था से सीधे जोड़कर देखा जाता है।
संगठन के प्रति निष्ठा और जातिगत राजनीति के लाभ शुभ के साथ काम की क्षमता का सर्वाधिक महत्व है, तो फिर उसे मंत्रियों के चयन में भी यही दिखाना होगा कि पार्टी में अब 'तुम मुझे सब-कुछ दो, मैं तुम्हें कुछ भी नहीं दूंगा' वाले लोगों के दिन लद चुके हैं।
मध्यप्रदेश के चुनावी नतीजों में लाड़ली बहना योजना की बड़ी भूमिका रही तो आप यह भी मानेंगे कि इस योजना के पीछे का प्रमुख फैक्टर शिवराज ही थे। यह उनकी वर्ष 2005 से इस चुनाव तक की संचित निधि रही, जिसने राज्य की महिलाओं को भविष्य में तीन हजार रुपए प्रति माह देने की बात पर विश्वास में ले लिया
विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा की दूसरी सूची इसी किस्से से मिलती जुलती है। चुनाव में आप किसी को 'हमें ही वोट दो' कहकर बाध्य नहीं कर सकते, लेकिन यह माहौल तो बना ही सकते हैं कि मतदाता के पास आप से हटकर और कोई विकल्प की संभावना कम रह जाए। यूं नहीं कि प्रदेश का मतदाता शिवराज सिंह चौहान से नाखुश है। हां, ऐसे नाखुश लोगों की भाजपा में अच्छी-खासी संख्या पनप चुकी है।