Sunday, May 26, 2024

मूर्ति में तब्दील राहुल का भविष्य

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सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) से मुलाकात के बाद गुलाम नबी आजाद (Ghulam Nabi Azad) ने कहा कि सोनिया जी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष (interim president) बनी रहेंगी। अभी अध्यक्ष का पद खाली नहीं है, जब होगा तब देखा जाएगा। आजाद का यह बयान पढ़कर बचपन का एक खेल याद आ गया। नाम था स्टेचू (statue)। जिस साथ वाले खिलाड़ी से ‘स्टेचू’ कह दिया जाए, उसे किसी मूर्ति की तरह बन जाना पड़ता था। उसे इस स्थिति से तब ही निजात मिलती थी, जब दूसरा खिलाड़ी ‘ओवर’ कह दे। स्टेचू और ओवर के बीच में मूर्ति बने खिलाड़ी के  हिल जाने भर से उसे दंड दिया जाता था।

राजनीति भी किसी खेल से कम नहीं। शुक्रवार की बीती शाम गुलाम नबी आजाद ने राहुल गांधी (Rahul Gandhi) को ‘स्टेचू’ कहकर उनके कांग्रेस अध्यक्ष (Congress President) के पद की तरफ जाते शरीर को किसी मूर्ति में परिवर्तित कर दिया। एक शेर है, ‘किसे क्या खबर पत्थर के पांव पे खड़े हैं हम, सदाओं-पे-सदाएं दे रहे  हैं कारवां हमको।’ यही हालत बीती शाम राहुल की हो गयी। अब भाट लाख नारे लगा लें। चीख-चीखकर गले को छलनी कर लें कि राहुल बाबा (Rahul baba) जल्दी ही कांग्रेस के अध्यक्ष बनेंगे, लेकिन बाबा ऊपर वाले शेर की तरह मजबूर हो गए हैं। G-23 यदि सोनिया गांधी को अध्यक्ष पद से हटाने में नाकाम रहा तो उसकी यह कामयाबी भी कम नहीं कि उसने इस पद के लिए राहुल और उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा  (Priyanka Gandhi Vadra) की उम्मीदों को भी बहुत कमजोर कर दिया है। सोनिया गांधी के ही पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष रहने की सहमति ने इस समय यह संभावना धूमिल कर दी है कि सोनिया का पद त्याग राहुल या प्रियंका के लिए आगे बढ़ने एवं गांधी-नेहरू परिवार की कांग्रेस पर पकड़ को और मजबूत करने का काम करेगा।

पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस (Congress) की शर्मनाक हार के बाद जी-23 ने सोनिया गांधी पर इस्तीफे का दबाव बनाया था। लेकिन कल शाम आजाद ने सोनिया से भेंट की। उनसे आग्रह (?) किया कि वह ही अंतरिम अध्यक्ष बनी रहें। श्रीमती गांधी ने यह बात स्वीकार कर ली। इसके बाद आजाद ने मीडिया (Media) से यह साझा करने से इंकार कर दिया कि श्रीमती गांधी से किन शर्तों पर चर्चा हुई है। लेकिन जो कुछ हुआ, उससे यह साफ है कि G-23 कांग्रेस के भविष्य को राहुल या प्रियंका से साझा करने को कतई तैयार नहीं है। कम से कम उनके नेतृत्व में तो बिलकुल भी नहीं।

तो क्या शुक्रवार की शाम का ढलता सूरज उस सितारे की खोज कर गया, जो निकट भविष्य में कांग्रेस का अध्यक्ष बनेगा? जिसकी पहचान नेहरू या गांधी (Nehru or Gandhi) के रूप में नहीं होगी? यदि वाकई ऐसा है तो फिर वह कौन होगा? जी-23 में से यदि किसी को अध्यक्ष बनाने पर सहमति बनी है तो फिर यह आसमान से गिरकर खजूर में अटकने जैसी बात होगी। क्योंकि आजाद से लेकर कपिल सिब्बल (Kapil Sibal), मनीष तिवारी (Manish Tiwari), शशि थरूर (Shashi Tharoor), मणिशंकर अय्यर (manishankar iyer), संदीप दीक्षित (Sandeep Dixit) आदि किसी भी जी-23 नेता का वह कद नहीं है कि उन्हें पार्टी की कमान सौंपी जा सके।

वजह यह कि कांग्रेस में अब बदलाव का मापदंड केवल यह होना चाहिए कि किस तरह सक्षम नेतृत्व के माध्यम से भाजपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में हराया जा सके। इसके लिए जो मास अपील और पार्टी पर पकड़ चाहिए, वह जी-23 में किसी के भी पास नहीं है। गांधी परिवार (Gandhi family) के तो हाथ पैर फुलते सब देख ही रहे हैं। इस तरह कुल मिलाकर हुआ यही है कि अगले किसी ‘सक्षम’ की डिस्कवरी आफ कांग्रेस  (Discovery of Congress) लिखी जाने तक जी-23 भी मौजूदा व्यवस्था को ही ‘सहन’ करने पर राजी हो गया है। राहुल गांधी और प्रियंका को स्टेचू बोलकर। क्या इस खेल का अगला कदम यह होगा कि जी-23 इन भाई-बहन को केवल ‘ओवर’ की बजाय ‘ओवर एंड आउट’ कह देगा? पांच राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों से इस्तीफा लेकर सोनिया गांधी ने बतौर कार्यवाहक अध्यक्ष कुछ जीत हासिल कर ली। राहुल-प्रियंका को रोककर G-23 अपने एक दांव में सफल रहा। लेकिन जिस पार्टी में यह सब हो रहा है, उस की जीत के लिए क्या कोई सूरत तलाशी जा सकेगी? जीत की सूरत बिना किसी जनाधार वाले नेता के कैसे संभव होगी? और टोटा तो कांग्रेस में इसी बात का है।

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