Wednesday, May 22, 2024

मत इठलाइये इस उपलब्धि पर

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क्या ये सचमुच इतनी बड़ी उपलब्धि है कि इसे भाजपा (BJP) की रणनीतिक सफलता की संज्ञा दे दी जाए? क्या ये इतनी बड़ी सफलता की गारंटी है कि भाजपा के लोग जश्न (BJP people celebration) का समय आने से पहले ही जश्न में डूब जाएं? बात उत्तरप्रदेश (Uttar Pradesh) की हो रही है। भाजपा खुशी से फूली नहीं समा रही है। मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) की बहू अपर्णा यादव (Aparna Yadav) के पार्टी में प्रवेश को लेकर जयघोष गूंज रहा है। खुद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा (National President JP Nadda), प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह (State President Swatantra Dev Singh), मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Chief Minister Yogi Adityanath) तथा दोनों उप मुख्यमंत्री, केशव प्रसाद मौर्य (Keshav Prasad Maurya) तथा दिनेश शर्मा (Dinesh Sharma) ने अपर्णा की अगुआई की। इससे पहले एक के बाद एक विधायकों के अपने से छिटकने के जख्म पर अपर्णा के माध्यम से BJP ने मलहम लगाने का प्रयास किया है। लेकिन क्या ये सचमुच इतनी बड़ी उपलब्धि है कि यादव परिवार की बहू के आगमन को इस राज्य में कमल के फूल में पड़ी बगावत की दरारों को भरने का जरिया मान लिया जाए?

इससे पहले तक अपर्णा की राजनीतिक यात्रा के दो पहलू ही रहे हैं। पहली कि मुलायम की बहू होने के नाते वह समाजवादी पार्टी (SP) की नेता हो गयीं। दूसरी, गए विधानसभा चुनाव (Assembly elections) में पार्टी ने उन्हें टिकट दिया और वह भाजपा की उम्मीदवार रीता बहुगुणा (Rita Bahuguna) से हार गयी थीं। अपर्णा के पति प्रतीक और प्रतीक के बड़े भाई अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के राजनीतिक कद की तुलना करना भी मूर्खता होगी। प्रतीक की राजनीति में प्रतीकात्मक किस्म की भी दिलचस्पी नहीं है। जबकि अखिलेश आज समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा हैं और बीते कल में वह राज्य के मुख्यमंत्री (CM) रह चुके हैं। प्रतीक की तस्वीरों में वह कसरत करते हुए ही अधिक दिलचस्पी लेते दिखते हैं, जबकि अखिलेश सियासी अखाड़े में लगातार दंड पेलते हुए आज इस प्रदेश में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गए हैं।

बात किसी की शक्ति को कम करके आंकने की नहीं है। लेकिन बात यह तो है कि अपर्णा के आने से भी भाजपा को समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के थोकबंद वोट मिलने के कोई आसार नहीं हैं। अखिलेश, मुलायम और डिंपल (Dimpal) के असर के चलते अपर्णा इस स्थिति में भी नहीं हैं कि वह प्रदेश में समाजवादी पार्टी के लिए कमिटेड यादव वोटरों (Committed Yadav Voters) को भाजपा की तरफ खींच सकें। यह सही है कि भाजपा ने परिवार के स्तर पर अखिलेश को बड़ा झटका दिया है, लेकिन इससे समाजवादी पार्टी के परिवार को कोई बड़ा आघात लगेगा, ऐसा सोचना भी हास्यास्पद होगा। अपर्णा ने कहा कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) तथा योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) की रीति-नीति की समर्थक हैं। तो ऐसा तो हर वह व्यक्ति है, जो इस चुनाव में भाजपा को वोट देने का मन बना चुका होगा। सवाल यह कि अपर्णा ने स्वयं को मोदी तथा योगी की नीतियों को जनता के बीच ले जाने के लिए कितना तैयार किया है? किसी गौशाला में चले जाने या घर बैठकर भाजपा का समर्थन कर देने भर से आप अपनी मास अपील तैयार नहीं कर सकते। यदि अपर्णा ने भाजपा के प्रति अपनी निष्ठा के अंकुर फूटने के साथ ही इस दल के साथ कदमताल शुरू कर दी होती तो माना जा सकता था कि इस चुनाव में वह काफी हद तक असरकारी साबित हो जातीं, लेकिन एन चुनाव के समय राजनीति की किसी फ्रेशर की तरह से हुई यह आमद BJP के लिए फिलहाल तो लाभ का बड़ा सौदा नहीं दिख रही है।

क्या यूपी में यह मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) वाली मोदी जी और अमित शाह जी (Amit Shah Ji) की भाजपा है, जहां ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) केवल तब भाजपा के हो सके, जब वह खुद को भाजपा में ढालने के बाद केंद्रीय मंत्री के दर्जे को हासिल कर सके? क्या ये वही असम के हेमंता बिस्वा शर्मा (Hemanta Biswa Sharma) हैं, जिन्होंने अपने अपमान का न्यायोचित प्रतिकार असम (Asam) में भाजपा की सरकार बना कर ही लिया? संघर्ष बहुत हैं। अभ्यास और मेहनत भी। बात दल बदलने की नहीं, दिल बदलने की है, पूरी ईमानदारी के साथ। निश्चित ही आप इसे अपनी उपलब्धि मान सकते हैं कि दनादन दल-बदल के बीच आपने एक अपर्णा को अपनी तरफ खींच लिया, किन्तु इस अर्पण को पहले भाजपा के लिए समर्पण में तो बदलने दीजिए। आप इस थोथी उपलब्धि पर इतराना कम कीजिये, और कम से कम अपने समर्थकों को इसके पीछे वाला सत्य अवश्य बताइये। क्योंकि आपकी यही हुल्लड़ ब्रिगेड, आपको आत्ममुग्धता के खतरनाक दलदल में फिर खींच ले जाएगी।

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