Sunday, May 26, 2024

भाजपा के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति

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अब यह बे-शक और बे-हिचक कहा जा सकता है कि ओबीसी (OBC) को 27 प्रतिशत आरक्षण (27 percent reservation) देने के मसले पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) बुरी तरह उलझ रही है। देश का हृदय कहे जाने वाले मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) में उठे ताजा सियासी बवाल से भाजपा का दिल्ली (Delhi) तक में दम फूलना तय है। बीजेपी भले ही मध्यप्रदेश के संदर्भ में इस आरक्षण पर लगी रोक को कांग्रेस (Congress) की गलती बता दें लेकिन इस मसले पर नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) से लेकर शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chauhan) की दाल गलती नहीं दिख रही है। लेकिन ओबीसी आरक्षण पर हर हाल में रास्ता तलाशना भाजपा की मजबूरी है।

वैसे मध्यप्रदेश में जो कुछ हुआ, उसमें कांग्रेस की सरकार (Congress government) के काल तथा उसके बाद विवेक तनखा (Vivek Tankha) की हालिया याचिका (petition) का दोष कम नहीं है। लेकिन सरकार में फिलहाल भाजपा है तो उसके लिए यह सांप-छछूंदर वाली स्थिति बन गयी है। केंद्र में सत्तारूढ़ इस दल की बहुत बड़ी ताकत ओबीसी का वोटर (OBC Voters) ही है। बावजूद इसके यह पार्टी इस छवि के मकड़जाल में अब भी फंसी हाथ-पांव मार रही है कि वह आरक्षण की समर्थक नहीं है। याद है बिहार का वह चुनाव, जब संघ प्रमुख मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) की आरक्षण से जुड़ी एक टिप्पणी को सियासी तड़का लगाकर नितीश कुमार (Nitish Kumar) और लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) ने वहां भाजपा का खाना खराब कर दिया था।

फिर अब तो उस वर्ग की बात है, जिसने भाजपा को सियासत की प्राण-वायु प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई है। यदि यह तबका इस समय भाजपा के खिलाफ किये जा रहे आरक्षण वाले प्रचार के असर में आ गया तो भाजपा की 2022, 2023 तथा 2024 की क्रमश: उत्तरप्रदेश (Uttar Pradesh), मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) और देश वाली सियासी संभावनाओं के बेअसर होने का खतरा पैदा हो सकता है। इसीलिये मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान जब यह कहते हैं कि इस आरक्षण के लिए केंद्र सरकार से मिलकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में जाएंगे, तो यह उनकी अकेले की घोषणा से ज्यादा भाजपा की सामूहिक विवशता की परिचायक हो जाती है।

आप लाख उदाहरण दे दीजिये। पिछड़ा वर्ग का प्रधानमंत्री (PM)और मध्यप्रदेश में शिवराज (Shivraj Singh Chauhan) के रूप में इसी तबके का चार बार का मुख्यमंत्री जैसी उपलब्धियां गिना लीजिये। या फिर उमा भारती (Uma Bharti) और बाबूलाल गौर (Babulal Gaur) की भी याद दिला दें। ये भी याद दिला दें कि इससे पहले चार दशक तक प्रदेश की राजनीति पर काबिज कांग्रेस ने इस वर्ग के नेतृत्व की हमेशा उपेक्षा की। बावजूद इसके OBC तो तब ही आपकी तरफ आएगा, जब उसे अपने बीच से प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की बजाय अपने बीच आरक्षण दिखेगा। गए लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections) में मोदी ने स्वयं को ओबीसी के रूप में प्रचारित किया। लेकिन अब किसी भी तरह इस तबके को मध्यप्रदेश में 27 प्रतिशत आरक्षण दिलाकर ही मोदी अपने मिशन 2024 को पुख्ता रूप से प्रसारित कर पाएंगे। क्योंकि किसी भी समय यह आरक्षण देशव्यापी मुद्दा बन सकता है।

केंद्र चाहता तो संसद के शीतकालीन सत्र (winter session of parliament) में विधेयक लाकर इस आरक्षण की राह खोल सकता था। लेकिन सत्र आज समाप्त हो गया। रास्ते लेकिन अब भी खुले हुए हैं। अध्यादेश (ordinance) लाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट में मध्यप्रदेश के आरक्षण को लेकर रिव्यु पिटीशन (review petition) लगाई जा सकती है। यह सही है कि केंद्र और मध्यप्रदेश सरकार ने कई जगह इस तबके के लिए 27 फीसदी आरक्षण लागू कर दिया है, लेकिन अब तो इसकी मांग पूरी तरह लागू करने तक का जोर पकड़ चुकी है। धीरे-धीरे अन्य राज्यों तक इस मसले का असर होगा। शिक्षा से लेकर नौकरी तक में अनुसूचित जाति तथा जनजाति के समान आरक्षण की मांग जोर पकड़ेगी। ऐसे में यह तय है कि भाजपा को एक उस राष्ट्रीय स्तर की चुनौती का सामना करना होगा, जिससे पार पाने के लिए उसके पास फिलहाल ज्यादा समय नहीं बचा है।

भाजपा भी इस तथ्य को भली-भांति जानती है। इसीलिए कल जब शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि OBC तबके को 27 प्रतिशत आरक्षण दिलाये बगैर पंचायत चुनाव (Panchayat Election) नहीं करवाए जाएंगे, तो यह साफ सन्देश भी साथ ही चल पड़ा कि राज्य में पंचायत चुनाव टल सकते हैं। जाहिर है कि इस वर्ग को नाराज कर चुनाव में जाने की हिम्मत भाजपा नहीं दिखा सकती है। इस दृष्टि से BJPके लिए यह सकारात्मक तथा नकारात्मक, दोनों ही तरह से मजबूत प्रचार तंत्र की बहुत बड़ी जरूरत का समय भी बन गया है। उसे पूरे प्रयास कर यह आरक्षण लागू कर प्रचार करना होगा कि वह वास्तव में ओबीसी की हितैषी है। साथ ही अपने इस किले को दरकने से बचाने के लिए उसे इतनी ही ताकत से यह सन्देश भी प्रसारित करना होगा कि कांग्रेस (Congress) की गलतियों से ही इस आरक्षण पर मध्यप्रदेश में रोक लगी है। भाजपा के लिए यह करो या मरो की स्थिति है और यह आरक्षण पूरी तरह लागू कर के ही वह सियासी रूप से घायल होने से बच सकती है।

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