Sunday, May 26, 2024

जो बोया, वही काट रहे दिग्विजय

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निहितार्थ: दिग्विजय सिंह (Digvijaya singh) के लिए यह तय है कि उम्र उन पर हावी नहीं हो सकती। गोविंदपुरा इंडस्ट्रियल एरिया (Govindpura Industrial Area) के विवाद को लेकर वो जिस तरह बेरिकेड पर उछल-कूद (jumping over the barricade) मचा रहे थे, वह इस तथ्य की पुष्टि करता है। लेकिन अवस्था तो उन पर हावी है। इसीलिये इधर पुलिस की जवाबी कार्रवाई शुरू हुई और उधर समर्थक अपने नेताजी को भीड़ से निकालकर कार में ले गए। शायद, मामला जरा और बढ़ता तो सिंह की सेहत पर बात आ सकती थी। दिग्विजय सिंह राजनीति की शतरंज के चतुर खिलाड़ियों (Clever players of politics) में से हैं। शतरंज में राजा का अपनी जगह से आगे-पीछे होना बड़ी निर्णायक और अक्सर शिकस्त वाली स्थिति का सूचक होता है। दिग्विजय भी प्रशंसकों के बीच ‘राजा साहब’ कहे जाते हैं। एक सवाल सहसा मन में आता है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि इस सियासी शतरंज में खुद राजा को इधर से उधर होना पड़ गया। कूद-फांद करने के लिए तो किसी भी राजनीतिक दल में हुल्लड़ गैंग (hullad gang) की कमी नहीं है। इस तरह के विरोध प्रदर्शनों के दौरान इन युवा तुर्कों का कौशल प्रदर्शन देखते ही बनता है। उनके नेतृत्वकर्ता तो मंच पर या इस उछल-कूद से कुछ सुरक्षित दूरी पर ही रहते हैं। इसके बावजूद आंदोलन की सफलत का श्रेय उनके खाते में ही जाता है। लेकिन यहां ऐसा नहीं दिखा। और जो दिखा, वो वही था, जो दिग्विजय दिखाना चाह रहे थे। ये ‘अभी तो मैं जवान हूं’ की नुमाइश नहीं थी। लेकिन ये ‘अभी भी मैं सर्वेसर्वा हूं’ वाली हुंकार थी। वो पुलिस अफसर को दीवार तोड़ने की धमकी देना। वो गुस्से की पुरजोर तरीके से की गयी अभिव्यक्ति, यह सब मंच लूटने का वो जतन था, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री (former chief minister) सफल रहे।

लेकिन इस सब को फसल काटने की तरह से भी देखा जा सकता है। किसी समय प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष (State Congress President) से लेकर बाद में मुख्यमंत्री तक का सफर तय करने वाले दिग्विजय ने अपना कोई भी बेहतर विकल्प पनपने नहीं दिया। प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय (State Congress Headquarters) में सिंह के नाम के सिक्के को उनके धुर राजनीतिक विरोधी सुभाष यादव (Strong political opponent Subhash Yadav) भी चलन से बाहर नहीं कर सके थे। सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया और अरुण यादव तो खैर ऐसा करने का साहस भी नहीं कर सकते थे। मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ (State Congress President Kamal Nath) भी सिंह की बैसाखी के सहारे से अब तक खुद को मुक्त नहीं कर सके हैं। मगर दिग्विजय की एक क्षमता धीरे-धीरे चुकने लगी है। वह आज भी पहले की तरह भीड़ जुटाने में सक्षम हैं, खासकर कांग्रेसियों की। लेकिन अब वो जोश फूंकना उनके बूते में भी नहीं रह गया है। वजह यह कि कांग्रेस की राज्य में लगातार नाकामियों के चलते पार्टी की रीढ़ यानी कार्यकर्ता अब हताश हो चुके हैं। और इन असफलताओं में से हरेक के कारणों में दिग्विजय किसी अनिवार्य बुराई की तरह घुसे हुए हैं। इसलिए जब दमदार कार्यकर्ता ही नहीं रहेंगे, तो फिर शतरंज में राजा को ही फ्रंट फुट (front foot) पर खेलना पड़ेगा। यह परिस्थितियां कुछ अलग होतीं, यदि इस आंदोलन की कूद-फांद वाली गतिविधि का नेतृत्व दिग्विजय के चिरंजीव जयवर्द्धन (Chiranjeev Jayavardhan) के हाथ होता। लेकिन यह भी मुमकिन नहीं था। जयवर्द्धन की नजर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर लगी हुई है। इसी दिशा में जीतू पटवारी (Jitu Patwari) से लेकर नकुल नाथ (Nakul Nath), उमंग सिंघार (Umang Singhar), सज्जन सिंह वर्मा (Sajjan Singh Verma) और कमलेश्वर पटेल (kamleshwar patel) जैसे क्षमतावान पार्टीजन भी देख रहे हैं। दिग्विजय जानते थे कि यदि उन्होंने आंदोलन की अगुआई अपने बेटे को सौंपी होती तो फिर बाकी के सभी प्रतिद्वंदी गुट इस कार्यक्रम से दूरी बना लेते। इसीलिये उन्हें खुद मैदान में आना पड़ा। यानी एक बार फिर अपनी फसल की ही कटाई पूर्व मुख्यमंत्री के जिम्मे आ गयी।





वैसे एक बात समझने लायक है। दिग्विजय आखिर इस सक्रियता से क्या जताना चाह रहे हैं? क्या वे अब भी बीते लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections) में भोपाल में पौने चार लाख वोटों से मिली हार का दर्द नहीं पचा सके हैं? क्या उन्हें अब भी इस बात का यकीन है कि एक और मौका मिलने पर वह भाजपा के इस गढ़ में सफल हो जाएंगे? इससे जुड़े आसार कम हैं। अव्वल तो कांग्रेस शायद ही दोबारा उन पर इस सीट से दांव लगाएगी। और यदि ऐसा हो गया, तब भी तुष्टिकरण की राजनीति के मास्टर माइंड (master mind of politics) दिग्विजय के लिए भोपाल की भाजपा पर आंख मूंदकर भरोसा करने वाली निर्णायक आबादी के बीच अपने लिए संभावनाएं जुगाड़ पाना आसान नहीं रहेगा। लेकिन सिंह इस सबसे जैसे बेपरवाह हैं। वे पार्टी के संगठन और भोपाल सीट, दोनों पर ही अपना अधिकार जताने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं दे रहे। वो तो चुनाव हारने के बाद भी भोपाल के विकास का एक ब्लू प्रिंट लेकर मैदान में आ गए थे। लेकिन उनकी बदकिस्मती की उनके किये-कराये से ही कांग्रेस की सरकार चली गयी। अब वो ब्लू प्रिंट न जाने कहां पड़ा धूल खा रहा होगा। अच्छा है कि यही धूल दिग्विजय के मंसूबों पर नहीं पड़ी है। अगर कहीं ऐसा हो गया होता तो मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) में इस समय हमें विपक्ष नामक संस्था की तलाश में इधर से उधर भटकना पड़ जाता। वजह यह कि ले-देकर कांग्रेस में दिग्विजय ही कभी-कभार मैदान में दिख जाते हैं। बाकी तो इस पार्टी के लिए चिड़िया पहले ही खेत चुग चुकी है और विपक्ष के नाम पर ट्विटर वाली चिड़िया पर ही यहां कुछ हलचल दिख पाती है।

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