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सियासी बांझपन के बावजूद राहुल अब भी उम्मीद से….

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प्रकाश भटनागर।

खींच-तान कर कांग्रेस के बड़े नेताओं में शुमार किए जा सकने वाली श्रेणी में ला दिए गए राहुल गांधी के भीतर का एक परिवर्तन इन दिनों अपनी तरफ ध्यान खींचता है। 2004 के संकोची युवा की छवि से 2026 की प्रोढ़ अवस्था में उनके आक्रामक तेवर। बस, उनकी प्रोढ़ता में परिपक्वता की कमी रह गई। परिवर्तन की इस वर्तनी की व्याख्या से पहले मूल बात यह कि गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को ‘गद्दार’ कहा है।

गांधी ने यह बात रायबरेली में कही। वही रायबरेली, जो उनके परिवार का गढ़ रहा है। उन्होंने यह बात तब कही, जब प्रधानमंत्री मोदी को इटली में भी भरपूर महत्व मिला। वह इटली, जो राहुल का ननिहाल है और जिससे समय-समय पर छन-छन कर आते किस्से क्षण-प्रतिक्षण पारिवारिक रूप से राहुल को गुस्सा दिला देते हों, तो कोई ताज्जुब नहीं है। मगर ताज्जुब तो है। संघ से लेकर भाजपा तक के खिलाफ राहुल की आक्रमकता उनकी यूएसपी बन चुकी है। इन दिनों ऐसी बातें कहते समय उनके चेहरे पर गंभीरता दिखती है। बस वो अपने गिरेहबान में झांकना याद नहीं रखते हैं।

भले ही यह गंभीरता आज तक उनके लिए वैचारिक अधिकार नहीं बन सकी है। वरना राहुल के इससे पहले वाले ऐसे तमाम बयानों के समय आंख कान बंद करने की इच्छा होती थी। एक किस्सा याद आ रहा है। बात ज्योतिरादित्य सिंधिया के गुना की है। एक विधानसभा चुनाव के कवरेज के सिलसिले में कभी जाना हुआ था।

मैंने किसी से पूछा कि यहां सबसे ज्यादा लोग किसकी सभा में आते हैं? खटा-खट वाले अंदाज में एक निर्दलीय उम्मीदवार का नाम बताया गया। उस सार्वजनिक स्थान पर कोई मंच नहीं था। उम्मीदवार एक रिक्शे पर आए। साथ में साउंड सिस्टम भी लादे हुए। उन्होंने भाषण शुरू किया।

लगातार यह ही बोलते रहे कि क्यों कर उन्हें हराया जाना चाहिए। लोग ताली पीटते हुए हंसी के मारे दोहरे होते रहे। उस जैसी ‘मज़ा लेने के लिए स्वः-स्फूर्त भीड़ दिग्गज दलों के उम्मीदवारों की प्रायोजित सभाओं में भी नहीं देखी गई थी। राहुल के ज़रा-कुछ ही समय पहले के कथन और करम गुना की उस घटना की याद दिला देते हैं।

मगर अब राहुल में भरपूर परिवर्तन है। अंतर मात्र यह कि गुना का वो उम्मीदवार अपनी मसखरी साथ लिए हुए ही हार गया और राहुल तमाम पराजयों के बावजूद मसखरी से ‘थोड़ा’ ऊपर आ गए हैं। अब जमीन के नीचे और जमीन से ऊपर का फर्क तो ऊपर वाला ही जाने, लेकिन राहुल का पुनः उजागर हुआ फ्रस्ट्रेशन कम से कम कपिल शर्मा के कॉमेडी शो की तरफ नहीं ले जा सकता।

राहुल के इस परिवर्तन पर मूलतः सिंधी भाषा में लिखी गई एक कहानी और याद आती है। एक आदमी शाम ढलते ही घर लौटता था। बीवी पर चीखता (जैसा गांधी मोदी के लिए करते हैं) बच्चों पर गुस्सा उतारता (ठीक वैसे ही, जैसे राहुल अपने ही लोगों को कहीं घोड़ा तो कहीं लंगड़ा घोड़ा बता देते हैं) तो फिर हुआ यह कि कहानी का वो पात्र अचानक परिवर्तित हो जाता है। वो शाम को घर पर मुस्कुराता और खिलखिलाता हुआ लौटने लगता है। लेखक अगले दिन उस पात्र का पीछा करता है। वो एक दुकान का मुलाजिम है, जहां का मालिक उसे रोज उसकी गलतियों के लिए नियमित रूप से डांटता है। लेखक देखता है कि उस दिन भी वह पात्र अपनी असफलताओं के चलते मालिक से डांट खा रहा है। ग्राहक (उन्हें वर्तमान सन्दर्भ में मतदाता भी कह सकते हैं) उसकी इस हालत पर ताली पीट रहे हैं। फिर वो पात्र दुकान से दूर जाकर एकांत में अपने मालिक का फोटो निकालता है। उसे जम कर कोसता है (मामला राजनीतिक होता तो शायद वो ‘गद्दार’ भी कह देता) इतना करने के बाद जब उसकी भड़ास निकल जाती है, तो वह परिवर्तित भाव के साथ घर आ जाता है।

तो राहुल गांधी इस सिंधी कहानी में हों या न हो, लेकिन ये कहानी उनके भीतर पूरी तरह समाई हुई है। बस, उनके साहस की तारीफ करना चाहिए। कहानी का पात्र एकांत में खीझ उतारता है और राहुल भीड़ के बीच।

आप भले ही बदल गए हों, लेकिन गुना के उस निर्दलीय उम्मीदवार से प्रेरित छवि से बाहर आने के लिए आपको अभी जी-तोड़ संघर्ष करना होगा। यह उस देश का मामला है, जहां तमाम और घनघोर किस्म के राजनीतिक मतभेद के बावजूद प्रधानमंत्री के लिए वर्तमान ‘गद्दार’ से लेकर पूर्ववर्ती ‘मौत का सौदागर’ ‘नीच’ ‘तेरी कब्र खुदेगी’ जैसी ज़ुबानी बदहजमी का ऐसा निर्लज्ज परिचय कभी भी नहीं दिया गया।

बात कहानी की है। मुमकिन है कि राहुल इटली को लेकर ‘एक ही रात में लाखों के वारे-न्यारे’ वाली खानदानी दंतकथाओं से प्रभावित होंगे। इसलिए एक मैलोडी वाली उपलब्धि के लिए उनकी पीड़ा स्वाभाविक है।

फिर भी वो परिवर्तित हो रहे हैं। राहुल का मोदी-शाह से विरोध है। राहुल का भाजपा और संघ की विचारधारा से विरोध है। इस विरोध का उन्हें हक है। लेकिन उनके इस आक्रामक विरोध का असर कहां हो रहा है? वो गिरेहबान में झांकने को तैयार नहीं हैं। संविधान की जिस किताब को वो हथेलियों में दबाएं घूम रहे हैं, उसे खुद कांग्रेस ने कितना छलनी किया है? इसे वे जानने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। इमरजेंसी को वे याद नहीं करते हैं। जिस चुनाव आयोग पर वे पिले पड़े हैं, उसके बारे में उन्हें कोई बताता है या नहीं कि उनकी दादी के दौर में उसके क्या हालात थे? वे इस बात को भूल कर बस गुस्से में नजर आते हैं।

वे इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं हैं कि जिस कांग्रेस का देश में पचास पचपन साल की सत्ता का इतिहास है, आखिर उसके सिमटने की कहानी कहां से शुरू होती है। मोदी और शाह को गद्दार कह देने भर से कांग्रेस की सत्ता में वापसी नहीं होने वाली। देश के बड़े और सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाने वाले राज्यों उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडू, महाराष्ट्र गुजरात, मध्यप्रदेश, उड़ीसा में आखिरी बार कांग्रेस की सरकारें कब थीं। क्या राहुल को इस बात पर विचार नहीं करना चाहिए कि आखिर पिछले तीन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस दो अंकों से आगे क्यों नहीं बढ़ सकी है।

एक तरफ भाजपा है। इसकी पूर्ववर्ती पार्टी जनसंघ ने 1951 में स्थापना के बाद शून्य से शुरूआत की थी। भाजपा के सफर तक आते-आते पार्टी पिछले तीन टर्म से न सिर्फ सत्ता के शीर्ष पर है, बल्कि लगातार अपना समर्थन और दायरा देश में बढ़ाती जा रही है। उलटा कांग्रेस सिमटने के दौर को थाम नहीं पा रही। कांग्रेस को आज भी पूरे देश में कहीं पहचान का संकट नहीं है। भाजपा आज भी कुछ राज्यों में अपनी पहचान स्थापित करने का संघर्ष कर रही है। उसे सफलता भी मिल रही है।

मोदी और शाह को गद्दार कह देने से राजनीति की उस धारा पर क्या असर पड़ेगा, जिसने देश की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता ही पलट दिया है। भारत के बहुसंख्यकों को आज अहसास है कि उनका वोट न सिर्फ केन्द्र की बल्कि तमाम राज्यों की सरकार बनाने की ताकत रखता है। ताजा उदाहरण पश्चिम बंगाल का है। और इसलिए छटपटाहट में राहुल मोदी, शाह, भाजपा, आरएसएस सब को गद्दार ठहरा रहे हैं। राहुल और विपक्ष की कोशिश बहुसंख्यक वोटों में बंटवारे की है। उलटा आरएसएस और भाजपा  का प्रयास बहुसंख्यक वोटों को एकजुट करने का है। भाजपा और आरएसएस अपने मकसद में कामयाब हैं।

कांग्रेस सत्ता का सिरा ही नहीं ढुढ़ पा रही है। पर राहुल की तारीफ करना चाहिए। संविधान की किताब हाथ में लिए हुए वो बहुसंख्यक वोटों को बांटने की कोशिश में जीतोड़ ताकत से लगे हैं। कामयाबी उनसे दूर है। आखिर बहुसंख्यक अपने वोटों और एक होने की ताकत को भला अब क्यों बिसराएंगे। फिर भी कांग्रेस के लोगों को इस उम्मीद के लिए बधाई कि उनका नेता तमाम सियासी बांझपन के बावजूद अब तक उम्मीद से है।

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