Sunday, May 26, 2024

कांग्रेस: वक्त है सख्त बदलाव का

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-‘जो हो रहा है, वह इसलिए हो रहा है कि रानी पर पहरा है। युवराज पर पहरा है। राजकुमारी पर पहरा है। वे पहरेदारों से घिरे हैं। पहरेदारों की खिड़कियों की झीनी दरारों से उतनी ही रोशनी भीतर जाती है, जितनी पहरेदार चाहते हैं। इन पहरेदारों की डोरियां उनके दूरस्थ नियंत्रकों के पास हैं।’

-‘दुर्भाग्य यह है कि दरबार में कोई एक इतना सर्वशक्तिमान बन जाता है कि उसकी टांग के नीचे से निकले बिना कोई युवराज या राजकुमारी तक पहुंच ही नहीं सकता। अधिकतर मामलों में तो साहब-साहिबा को मालूम ही नहीं होता है कि कौन कितने बरस से उनसे मिलने की कोशिश कर रहा है?’

इन पंक्तियों पर गौर करें। कहने की जरूरत नहीं है कि यह किस राजनीतिक दल के नेतृत्व के लिए लिखी गर्इं हैं। इन्हें लिखने वाले हैं पंकज शर्मा। पंकज शर्मा (Pankaj Sharma) अपने जमाने के धाकड़ पत्रकार हुआ करते थे। अब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव (Secretary, All India Congress Committee) हैं। यानि व्हाया पत्रकारिता करते वे कांग्रेसी हो गए। एक कांग्रेसी के नाते उनकी अपनी पीड़ाएं हो सकती हैं लेकिन लिखा उन्होंने सौ टका टंच है। कांग्रेस में अपने नेतृत्व को लेकर चौतरफा चिंताएं हैं। कांग्रेस की इन चिंताओं को ममता बैनर्जी (Mamta Banerjee) ने और बढ़ा दिया है।

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के लिए यह गहन चिंता और ईमानदार चिंतन का समय है। लेकिन लग यही रहा है कि चिंता और चिंतन दोनों ही वर्तमान नेतृत्व के बस की बात नहीं रह गए हैं। कांग्रेस में जो लोग वास्तविकता से दो चार होने की कोशिश कर रहे हैं, उनकी आवाज में असर नहीं है। क्योंकि अभी भी बहुमत उन कांग्रेसियों का ही है जिन्हें लगता है कि पार्टी को कोई एक रख सकता है या उसे सत्ता तक वापस पहुंचा सकता है तो वो गांधी परिवार ही है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी ने जो तेवर दिखाए हैं, वह इस दल की भाजपा (BJP) विरोधी दलों में भी स्वीकार्यता के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गए हैं। इस सबसे सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) और उनके एक-एक कंधे पर बन्दूक रखकर मिसफायर कर रहे राहुल गांधी (Rahul Gandhi) या प्रियंका वाड्रा (Priyanka Vadra) की सेहत पर कोई खास फर्क शायद ही पड़े। इन तीनों की ही प्राथमिकता किसी भी तरह पार्टी को अपनी किचन पार्टी बनाये रखकर बपौती मानने की है। कांग्रेस के दुर्भाग्य से पार्टी के शीर्ष परिवार को इसमें सफलता हासिल भी है।

गुलाम नबी आजाद (Ghulam Nabi Azad) ने कश्मीर में साफ कह दिया कि कांग्रेस को आते आम चुनाव में 300 सीटें मिलने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है। उन्होंने इसके साथ ही पार्टी की मौजूदा कमजोर स्थिति वाली बात भी स्वीकार ली है। अनुच्छेद 370 (Article 370) को लेकर भी आजाद ने कह दिया कि फिलहाल कांग्रेस इसे वापस लेने की स्थिति में नहीं है। याद दिला दें कि कांग्रेस के मौजूदा टीवी पैनलिस्ट में से एक आचार्य प्रमोद कृष्णम (Acharya Promod Krihnam) ने भी एक टीवी चैनल पर यह राय दी थी कि अनुच्छेद 370 बहाल नहीं किया जाना चाहिए। पंकज शर्मा लंबे समय से हाशिये पर हैं और फेसबुक (Facebook) पर एक के बाद एक दनादन पोस्ट डालकर उन्होंने नाम लिए बिना ‘महारानी’ ‘युवराज’ और ‘राजकुमारी’ पर तीखे कटाक्ष करते हुए पार्टी में मनमानी तथा चाटुकारिता को लेकर अपनी पीड़ा का इजहार किया है।

बहरहाल, तिवारी से लेकर आजाद और शर्मा को चुप कराना कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को आता है, लेकिन ममता बनर्जी ने जिस तरह से अखिल भारतीय कांग्रेस की अखिल भारतीय स्तर पर बेइज्जती की है, यह पार्टी उस से कैसे निपटेगी? बनर्जी जब या कहती हैं कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (United Progressive Alliance) (UPA) का कोई अस्तित्व नहीं है और अब उनका इससे कोई गठबंधन नहीं है तो यह सीधे-सीधे सोनिया सहित राहुल और प्रियंका को त्याज्य मानने का संकेत है। बनर्जी ने यह बात महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रमुख शरद पवार (NCP Supremo Sharad Pawar) और शिवसेना (Shiv Sena) के नेताओं से मुलाकात के बीच कही। जाहिर है कि बनर्जी ने भाजपा-विरोधी दलों के नेतृत्व के लिहाज से कांग्रेस को ठुकरा दिया है। श्रीमती गांधी कथित यूपीए की चेयरपर्सन हैं और अब ममता ने उनसे दूरी बनाने का ऐलान कर दिया है। फिर जिस तरह से पवार और शिवसेना ने ममता के कथन को मौन समर्थन दिया है, वह जता रहा है कि कांग्रेस के लिए स्थिति और अधिक कष्टप्रद हो चुकी है। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस जहां भी कांग्रेस को तोड़ सकती है तोड़ रही है।

सत्ता से बाहर हो जाना किसी राजनीतिक दल की कमजोरी नहीं माना जा सकता इसलिए कांग्रेस भी देश में कमजोर नहीं है। लेकिन उसका मौजूदा नेतृत्व बेहद कमजोर और नकारा साबित हुआ है। वरना कोई वजह ही नहीं थी कि पश्चिम बंगाल (West Bengal) से बाहर न के बराबर जनाधार रखने वाली बनर्जी इस तरह से राहुल गांधी के विदेश दौरों को लेकर तल्ख  टिप्पणी करतीं और संप्रग के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान उठातीं। आज की स्थिति में गुलाम नबी आजाद का यह कथन सही है कि कांग्रेस अपनी दम पर आम चुनाव जीतने की स्थिति में नहीं है। उसकी रही-सही आस इस बात पर ही टिकी हुई है कि भाजपा-विरोधी दलों के सहारे वह सत्ता में आ सके। लेकिन अब ऐसे दलों के नेतृत्व की यह उम्मीद भी बेसहारा होती दिख रही है। बिहार (Bihar) में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने कांग्रेस को अपने अधीन कर रखा है। यही हालत उत्तरप्रदेश (Uttar Pradesh) में समाजवादी पार्टी (SP) तथा बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने भी इस दल की कर रखी है।

प्रियंका वाड्रा भले ही कह चुकी हैं कि कांग्रेस उत्तरप्रदेश में किसी दल से गठबंधन नहीं करेगी, लेकिन सच तो यह है कि सपा और बसपा सहित राष्ट्रीय लोकदल तक इस दल से हाथ मिलाने में कोई रुचि नहीं ले रहे हैं। त्रिपुरा (Tripura) में हुए थोकबंद दल-बदल ने कांग्रेस को और कमजोर किया है। राजस्थान (Rajasthan) और छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) जैसे जिन बड़े राज्यों में इस पार्टी की सरकार है, वहां भी शीर्ष स्तर पर चल रही तनातनी पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए दिल्ली दरबार को खासी मशककत करना पड़ रही है। दक्षिण भारत में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती ताकत के आगे कांग्रेस कभी की खत्म सी हो चुकी है।

इन खराब हालात के बीच ममता बनर्जी ने कांग्रेस के हाथ से भाजपा-विरोधी दलों की लगाम को एक झटके में अपनी तरफ खींच लिया है। सवाल यह कि क्या अब भी सोनिया गांधी पुत्र-पुत्री मोह से मुक्त होना नहीं चाहेंगी? राहुल गांधी घोर असफल राजनेता साबित हुए हैं। प्रियंका वाड्रा को भले ही दादी जैसे नाक मिली हो, किन्तु कांग्रेस की नाक ऊंची करने के लिए इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) जैसी कोई क्षमता उनमें नजर नहीं आती है। फिर भी तीनों पार्टी पर हावी हैं। उनके आंतरिक विरोधियों को जी-हुजूरी करने वालों का समूह पूरी ताकत से ठिकाने लगा दे रहा है। लेकिन न तो बनर्जी और न ही शरद पवार को इस तरह से चुप कराया जा सकता है। ये दोनों ही पुराने कांग्रेसी हैं। इन दोनों ने ही संप्रग वाले वर्तमान एपिसोड के जरिये भाजपा-विरोधी किन्तु कांग्रेस का समर्थन न करने वाले दलों को एक नए राजनीतिक विकल्प की राह सुझा दी है। कांग्रेस अब ‘वक्त है बदलाव का’ वाली जरूरत से भी आगे के संकट से जूझ रही है। उसे ‘वक्त है सख्त बदलाव का’ की आवश्यकता है। लेकिन क्या सोनिया गांधी ऐसा करने का साहस जुटा सकेंगी? क्या राहुल और प्रियंका उन्हें ऐसा करने देंगे?  क्या चाटुकारों की टोली ऐसा होने देगी? फिलहाल इन सभी सवालों के जवाब ‘ना’ में हैं और यह इस दल की सबसे बड़ी विडंबना ही कही जा सकती है।

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