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सरकारी अधिकारी किसी खास पक्ष का समर्थन नहीं कर सकते

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सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के कुछ अधिकारियों के रवैये पर गहरी चिंता और नाराजगी जताई।

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालत में किसी मामले की बहस या हलफनामा (काउंटर-अफेडेविट) दाखिल करते समय राज्य और उसके अधिकारियों का एकमात्र कर्तव्य सच्ची सहायता प्रदान करना है।

अधिकारियों से यह कतई उम्मीद नहीं की जाती कि वे कानून के खिलाफ जाकर किसी खास पक्ष का ‘जोरदार समर्थन’ करें। कानून के सामने सब बराबर हैं।

कानून में बदलाव और अधिकारियों की मनमानी यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के गैर-सरकारी सहायता प्राप्त कालेजों में प्रिंसिपल पद पर नियुक्ति से जुड़ा है।

साल 2019 में विज्ञापन निकला, और 2021 में अंतिम सूची के साथ एक प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) भी जारी हुई।

अपीलकर्ता का नाम इस प्रतीक्षा सूची में था और उन्हें बलिया के एक कॉलेज में नियुक्ति की सिफारिश मिली थी, लेकिन पारिवारिक कारणों से उन्होंने पदभार नहीं संभाला।

बाद में, उन्होंने मेरठ के एक कालेज में नियुक्ति की मांग की, जिसे असाधारण परिस्थितियों का हवाला देकर मान भी लिया गया।

निरस्त हो चुके पुराने कानून को जिंदा करने की कोशिश हैरानी की बात यह रही कि 21 अगस्त 2023 को नया ‘उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग अधिनियम, 2023’ लागू हो चुका था, जिसने 1980 के पुराने अधिनियम को निरस्त कर दिया था।

इसके बावजूद, दिसंबर 2023 में निदेशक ने पुरानी सूची को पुनर्जीवित कर अपीलकर्ता के पक्ष में पत्र लिखा।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि नया कानून आने के बाद पुरानी सूची स्वत: समाप्त हो चुकी थी, इसलिए अधिकारियों का पुराना राग अलापना पूरी तरह से गैर-कानूनी था।

मुख्य सचिव को समीक्षा के निर्देश इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहले ही मेरठ कालेज के तत्कालीन कार्यवाहक प्रधानाचार्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए अपीलकर्ता के तबादले के आदेश को रद कर दिया था।

जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो उत्तर प्रदेश के अधिकारियों ने अदालत में अपीलकर्ता का पक्ष लेना शुरू कर दिया। निष्पक्षता खोकर एकतरफा रुख अपनाना कानूनन अस्वीकार्य सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि ऐसा गैर-कानूनी स्टैंड लेना पूरी तरह से अस्वीकार्य है।

चूंकि संबंधित अधिकारी इस मामले में सीधे तौर पर पक्षकार नहीं थे, इसलिए अदालत ने कोई दंडात्मक निर्देश तो नहीं दिया, लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को इन अधिकारियों के आचरण की जांच करने और कानून के मुताबिक आवश्यक कदम उठाने की छूट जरूर दे दी है।

अदालत ने याद दिलाया कि सरकारी अधिकारियों का काम तथ्यों और प्रासंगिक कानूनों के आधार पर अदालत की मदद करना है, न कि किसी की पैरवी करना।

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