Sunday, May 26, 2024

बीरबलों की अपनी-अपनी खिचड़ी

Share

निहितार्थ : पराजय को कुतर्क का चोला पहनाकर ढंकने की कोशिश करना पुराना चलन है। कहते हैं कि अकबर ने कड़ाके की सर्दी में एक आदमी को ठन्डे पानी में रात गुजारने की चुनौती दी। आदमी इसमें सफल रहा। अकबर बादशाह (Akbar Badshah) थे। उन्हें एक आम आदमी से ये पराजय भला कैसे स्वीकार होती? इसलिए उन्होंने यह दलील की कि महल के बुर्ज पर जल रहे दीपक की रोशनी (lamp light) से उस आदमी ने गर्मी हासिल की थी। मध्यप्रदेश (Madhya pradesh) में कमलनाथ (Kamalnath) की बादशाहत वाला समय ख़त्म हुए भी अरसा बीत चुका है। घनघोर गलत किस्म की नीतियों और घनघोरतम गलती वाले नीतिकार पर भरोसा करने के चलते वह केवल पंद्रह महीने में बेदखली के शिकार हो गए।

आज कमलनाथ ने मीडिया से बात की। कहा कि उनकी सरकार को गिराने के पीछे भी भाजपा (BJP) ने पेगासस जासूसी (Pegasus spy) वाले उपकरण का ही सहारा लिया था। यह खालिस अकबर वाला आचरण ही है। पेगासस का सच सामने आना ही चाहिए। देश को इस मामले में केंद्र सरकार (central government) से वास्तविक सच सामने लाने की उम्मीद रखने तथा मांग करने का भी पूरा हक है। लेकिन इस काण्ड से अपनी सरकार के पतन की बात जोड़कर कमलनाथ क्या खुद का और उपहास नहीं करवा रहे हैं? मीडिया (Media) को तो उन्होंने यह कहकर बुलाया था कि वह जासूसी वाले मामले में कुछ और खुलासे करेंगे। लेकिन जैसा कि सभी जानते थे, ऐसा नहीं हुआ। कमलनाथ ने जो कहा, वह उनके अहं की तुष्टि के प्रयास से और ज्यादा कुछ भी नहीं था। उनकी बात में कोई दम नहीं है। क्योंकि उनकी सरकार की अल्पायु में हुई मृत्यु का मुख्य कारण केवल और केवल कमलनाथ खुद ही थे। रही-सही कसर दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) की निजी स्वार्थों में पगी आत्मघाती सलाहों ने पूरी कर दी थी।





कई वजहों से भ्रम का कुहासा बढ़ता ही जा रहा है। केंद्र सरकार ने आज संसद (Parliament) में कहा कि देश के किसी भी राज्य ने कोरोना के दौरान ऑक्सीजन (oxygen) की कमी से एक भी मौत की जानकारी उसे नहीं दी है। प्रतिपक्ष इस पर तमतमा गया है। एक वृंदगान फिर से केंद्र के खिलाफ शुरू हो गया है। कांग्रेस (Congress) सहित आम आदमी पार्टी (AAP) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) एक ही सुर में केंद्र पर आरोप लगा रही हैं। इसी बहती गंगा में गंगा के अंतिम छोर पर बैठी ममता बनर्जी ने भी हाथ धो लिए। कहा कि लोग ऑक्सीजन न मिलने से मरे और लगे हाथ उन्होंने यह भी कह दिया कि पश्चिम बंगाल (West Bengal) में चुनाव के बाद कोई हिंसा ही नहीं हुई। भारी कन्फ्यूजन है। यदि ऑक्सीजन की कमी से लोग नहीं मरे तो फिर खाली या न मिले सिलेंडरों पर तिल-तिलकर मरे लोगों को क्या ऑक्सीजन की अधिकता ने मार डाला? और यदि पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद प्रेम की गंगा ही बह रही थी तो फिर हजारों की संख्या में पड़ोसी राज्य असम में शरणार्थी की तरह दिखे लोग क्या वहां हवा बदली करने गए थे? जरा इंतज़ार कीजिये। इसी ऊहापोह वाले वातावरण में अरविन्द केजरीवाल (Arvind Kejriwal) भी खुद के लिए, ‘मैं कभी झूठ नहीं कहता और सच बोलना मुझे आता ही नहीं है’ वाले बेशर्मी के फ्रेम में एक बार फिर खुद को फिट कर के सक्रिय नजर आ जाएंगे।

कपिल सिब्बल कल खूब गरजे। पेगासस को लेकर केंद्र सरकार को उन्होंने कटघरे में खड़ा किया। लेकिन वे उस कटघरे की तरफ क्यों नहीं जा रहे, जहां लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ के जरिये इस मसले पर केंद्र सरकार को उसका औपचारिक जवाब देने के लिए बाध्य किया जा सकता है? संबित पात्रा (Sambit Patra) भूले-बिसरे गीत सुना रहे हैं। पेगासस के जवाब में वे कांग्रेस और यूपीए की सरकार (UPA government) के दौरान की गयी जासूसी के किस्से गिनाने में जुट गए हैं। इस बारे में ज़रा भी असुविधाजनक सवाल आये तो वे राहुल गांधी (Rahul Gandhi) पुराण खोलकर बैठ जा रहे हैं। लेकिन कम से कम एक नेशनल न्यूज़ चैनल पर वह कल तो इस सवाल का कोई जवाब नहीं दे सके कि जो इजरायली टेक्नोलॉजी (israeli technology) केवल किसी सरकार को बेची जा सकती है, उसका भारत में इस्तेमाल किस की सहमति से कर लिया गया?





पेगासस पर नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) चुप हैं। यूं भी वे तब ही मुंह खोलने में ज्यादा यकीन रखते हैं, जब उन्हें अपने मन (‘मतलब’ कहना ज्यादा ठीक रहेगा) की बात कहना होती है। जासूसी पर संसद में हल्ला मचा तो मोदी ने कांग्रेस के देश में सिकुड़ते जनाधार को लेकर बातें कहना शुरू कर दीं। अमित शाह (Amit Shag) यूं तो विरोधियों की अपनी ज़ुबानी चाबुक से खाल खींच लेते हैं, किन्तु इस विषय पर वह भी ‘देश की बदनामी की साजिश’ जैसे परंपरागत जुमलों की आड़ में ही खुद का बचाव करते दिख रहे हैं। हो सकता है कि इस चिल्लाचोट के बीच जेपी नड्डा (JP Nadda) ने किसी रूप में सरकार के बचाव की कोशिश की हो, लेकिन उनके तर्क भी धारदार नहीं ही हो सकते। क्योंकि जिस मसले पर उनके राजनीतिक आका ही डिफेंसिव दिख रहे हों, उस पर भला नड्डा किस तरह पार्टी या सरकार के बचाव का खाका खींच सकेंगे?

ट्विटर आज भी सक्रिय है। चुनांचे राहुल गांधी भी सक्रिय हैं। Congress के युवराज (Prince) इसी मंच की मदद से केंद्र सरकार पर दनादन आरोप जड़ रहे हैं। बाकी लोकसभा की चर्चा और सर्वदलीय पार्टी मीटिंग (all party meeting) से उनका दल कुछ ज्यादा ही परहेज करने लगा है। प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) तो खैर जैसे हिन्दुस्तान (Hindustan) की सरहद तथा कांग्रेस की जरूरत को उत्तरप्रदेश तक ही सीमित कर चुकी हैं। इसी राज्य से कभी देश-भर में ‘तिलक, तराजू और तलवार’ वाली बात प्रसारित की गयी थी। इस थ्योरी के जरिये सत्ता और ताकत के भरपूर आनंद लेने वाली मायावती (Mayawati) फिर तिलक वालों यानी ब्राह्मणों का तिलक करने को आतुर हैं। वह ब्राह्मणों के लिए अपनी पार्टी की तरफ से सम्मेलन करने जा रही हैं। ब्राह्मण समाज (brahmin society) के बीच ही खुद की विश्वसनीयता को खो चुके सतीश चंद्र मिश्रा (Satish Chandra Mishra) को ही खुद की वजह से फैले इस रायते को समेटने का जिम्मा दिया गया है। मिश्रा अब अपने स्वर में चाहे जितनी भी मिश्री घोल लें, लेकिन तिलक वाले उन पर पहले की तरह भरोसा नहीं कर पाएंगे। इसके बावजूद मायावती का उन पर फिर से भरोसा जताना काफी चौंकाने वाला मामला है।

तो कुल मिलाकर हर कोई अपने-अपने स्तर पर अकबर जैसा आचरण कर रहा है। मौजूदा हालात के मद्देनजर अपनी-अपनी मुसीबत का ठीकरा दूसरे कारणों पर फोड़ रहा है। बीरबल ने अकबर के उस दुराग्रह का जवाब कभी न पक सकने वाली खिचड़ी को पकाने की कोशिश के रूप में दिया था। अब हर कोई खुद को बीरबल जैसा चतुर सुजान बताकर अपनी-अपनी हांडी के चावल के पकने का इंतज़ार कर रहा है। देखें किसे पहले और कितनी कामयाबी मिल पाती है।

Read more

Local News