Wednesday, May 22, 2024

बरखा रानी! ज़रा जम के तरसो 

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हिंदी सिनेमा का एक गीत अपने समय में विशुद्ध रूप से ‘चालू’ होने वाले स्वरूप के बाद भी खूब चला। बोल थे, ‘बरखा रानी… ज़रा जम के बरसो।’ आज जिन बरखा की चर्चा हो रही है, उन और उन जैसी फितरत वाले समूह के हिस्से में वर्ष 2014 से लेकर अब तक सूखा ही पड़ा हुआ है। फिर भी मौका लगते ही बरसने की कोशिश करने में भला क्या हर्ज़ है ? तो ऐसा ही हुआ। खरगोन (Khargone) के घटनाक्रम को लेकर पत्रकार बरखा दत्त (Barkha Dutt ) को बरसने लायक अनुकूल माहौल लगा और उन्होंने प्रदेश के गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा (Dr. Narottam Mishra) की आड़ में समूची शिवराज सरकार के ग्रह-नक्षत्र बिगाड़ने के अंदाज में कमर कस ली। दत्त ने दत्तचित्त वाले अंदाज में मिश्रा की घेराबंदी के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने अपने समान मानसिकता वाले मीडिया धर्म के निर्वहन में स्वयं को जैसे झोंक दिया। यह बात और है कि उनके दांव दनादन उलटे पड़ते चले गए। पूरे साक्षात्कार के दौरान मिश्रा सुकून से भोजन चबाते हुए  जहां दत्त के हरेक दांव को चित करते चले गए,  वहीं दत्त लाख चाहकर भी यह भाव नहीं छिपा सकीं कि अपनी चालाकियों की नाकामी के चलते वह अंततः खुद का गुस्सा चबाने के लिए ही मजबूर हो गयी थीं।

देख कर अटपटा लग सकता है कि देश की सीनियर पत्रकार बरखा दत्त आन स्क्रीन सवाल जवाब कर रही हैं और सामने मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) के गृहमंत्री खाना खाते हुए बरखा दत्त के तीखे सवालों का जवाब शांति से दे रहे हैं। इसे मीडिया की अवहेलना का नाम नहीं देना चाहिए। मीडिया जिस तरह से तटस्थता को छोड़कर विचारधारा के दो हिस्सों में बंटा हुआ है, उसमें यह होना बहुत साधारण सी बात है। नरोत्तम नरों में उत्तम हों या न हों, लेकिन एक बात तो उनके स्वभाव को उत्तम स्वरूप प्रदान करती ही है। वह यह कि उन्हें अपना आपा खोये बगैर अपनी बात दृढ़ आग्रह के साथ बात रखना बखूबी आता है। यूं, भी यह भाजपा (BJP) के लोगों का पार्टी-जनित संस्कार माना जाता है। इसलिए साक्षात्कार में जब-जब दत्त ने मिश्रा को घेरने की कोशिश की, तब-तब मंत्री ने अपनी तथ्यपरक वाकपटुता प्रदर्शित करने में कसर नहीं छोड़ी। यूं तो तो स्टूडियो में इस बात की तैयारी थी कि मिश्रा के जरिये मध्यप्रदेश से लेकर उत्तर प्रदेश तथा रामनवमी (Ramanavami) के लिहाज से अशांत किए गए एक दर्जन प्रदेशों के लिए समूची भाजपा (BJP) की  घेराबंदी की जाए। बरखा दत्त ऐसा कर नहीं सकीं। उलटे हुआ यह कि मिश्रा ने अकाट्य तर्कों के जरिये घेरने वालों की मंशा को ही संदेह के घेरे में ला दिया। क्या नरोत्तम मिश्रा (Narottam Mishra) का यह उत्तर गलत था कि राज्य सरकार ने खरगोन में आरोपियों के जो निर्माण ढहाए हैं, वह अवैध प्रकृति के थे ? क्या इस दलील को अस्वीकार किया जा सकता है कि खरगोन में एसपी को गोली लगने तथा पुलिस वालों के घायल होने से साफ था कि पुलिस तथा प्रशासन अपने कर्तव्य को अंजाम दे रहे थे ? जब कुछ और न बन पड़ा तो दत्त ने शेष ग्यारह राज्यों के तथाकथित भड़काऊ वीडियो का  हवाला दे दिया, जबकि उनके तरकश में वह एक भी तीर नहीं था, जो ऐसे वीडियो के दायरे में खरगोन (Khargone) के घटनाक्रम को ला सकें। मिश्रा ने इन्हीं वीडियो के आधार पर दत्त को यह कहकर विषय परिवर्तन के लिए  विवश कर दिया कि खरगोन (Khargone) में हिंसा की शुरूआत एक धार्मिक स्थल के भीतर से ही हुई थी।

गर्मी के दिन हैं। इसलिए माना जा सकता है कि वीडियो में मिश्रा छाछ या दही के घूंट पीते हुए भी दिखे। लिहाजा ऐसा ही ठंडा जवाब देते हुए उन्होंने तसल्ली से कहा कि पत्थर फेंकने वाले उपद्रवियों के ठिकानों को पत्थर में बदल देने की बात वह भविष्य में भी दोहराएंगे। जवाब में दत्त के चेहरे के बदलते भावों को खून के घूंट पीने की संज्ञा बेशक दी जा सकती है। कानून-व्यवस्था से जुड़े विषय पर किसी मंत्री से आप क्या यह उम्मीद करेंगे कि वह किसी चैनल के चैनलाइज्ड मंसूबों के अनुरूप गलत को गलत कहने लगे और सही से मुंह छिपा ले ? कम से कम मिश्रा के लिए ऐसी बात सोचना तो बेमानी ही कहा जाएगा। ऐसा सिर्फ इस मामले में नहीं हुआ है। मिश्रा ने अपना यह रुख इस बातचीत में पूरी तरह कायम रखा। कायम तो खैर दत्त ने भी अपनी एप्रोच को रखा। पूरी बातचीत में उनकी तरफ से केवल यह जताने का प्रयास किया गया कि खरगोन (Khargone) में किसी वर्ग-विशेष की हरकत नहीं, बल्कि राज्य सरकार की इस बात से माहौल बिगड़ा कि कानून और व्यवस्था को कैसे  सख्ती से लागू किया जाए। फिर जो होना था, उसे ‘जैसा बाजा, वैसा गाना’ ही कहा जाता है। मिश्रा ने संतुलित, संयमित लेकिन दृढ़ तरीके से राज्य सरकार का पक्ष रखा और वह इसमें लगभग पूरी तरह सफल भी रहे। मिश्रा ने यदि यह माना कि खरगोन (Khargone) में माहौल बिगड़ने न देना सरकार की जिम्मेदारी थी तो उन्होंने इस बात के लिए भी सरकार का लोहा मनवा दिया कि उपद्रवियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही कर ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति पर काफी हद तक रोक लगा दी गयी है।

बातचीत में मिश्रा ने दो सन्देश स्पष्ट दे दिए। पहला यह कि राज्य सरकार किसी भी विषय पर न्यायपालिका का पूरा सम्मान रखती है और यही सरकार किसी भी गड़बड़ी पर अपने तरह से कार्यवाही करने में भी पूर्णतः सक्षम है। और फिर ‘..अब  मध्यप्रदेश में भी तू-तू, मैं-मैं नहीं होगी’ वाले वाक्य से मिश्रा ने यह सन्देश स्पष्ट रूप से प्रसारित कर दिया कि शांति के टापू में अशांति की बात को पूरी ताकत के साथ दबा दिया जाएगा। बातचीत में खरगोन में चले बुलडोजर (Bulldozer) को सरकार के प्रति लोगों के विश्वास वाले  तथ्य से जोड़कर मिश्रा ने शिवराज के माफिया-विरोधी मंतव्य को पूरी ताकत से स्थापित करने का काम किया है।कुल मिलाकर यह दिख रहा है कि बरखा दत्त के मौखिक मुक्का-लात वाले दांव-पेंच को मिश्रा के साथ आजमाने की कोशिश हास्यास्पद तरीके से नाकाम साबित हुई।

बात, ‘बरखा रानी! ज़रा जम के बरसो’ वाले भाव से शुरू हुई थी और मिश्रा ने अपनी तथ्यात्मक हाजिर जवाबी से मामले को ‘बरखा रानी! ज़रा जम के तरसो’ में बदल दिया। मीडिया यदि सवाल पूछने के प्रयोजन को प्रायोजित स्वरूप प्रदान करने वाली हरकत से बाज नहीं आएगा तो फिर उसे बार-बार इसी तरह के सलूक से बेइज्जत होना पड़ेगा, जैसा इस मामले में हुआ है। दत्त के सवालों को सुन और उनके भाव देखकर यह साफ़ था कि वह अपनी कोशिश में सफल नहीं हो सकीं और मिश्रा इस बात में पूरी तरह सफल रहे कि खरगोन मसले पर राज्य सरकार के रुख को कम से कम मीडिया के स्तर पर उन्होंने जस्टिफाई कर दिया। दत्त जिस  मंसूबे के पूरा होने के लिए तरस कर रह गयीं, उसके लिए उस समूची मीडिया बिरादरी पर तरस आ रहा है, जो इसी तरह से लगातार सबके सामने एक्सपोज होती जा रही है।

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