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पीरियड्स को लेकर बनी दकियानूसी परम्पराओं ने एक लड़की की जान ले ली!

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शालिनी पांडे।

इस दौर में जब दुनिया के एक कोने से महिलाओं के चाँद पर पहुँचने की खबरें आ रही है, जब विज्ञान और तकनीक की ऊँचाइयाँ महिलाओं के नाम दर्ज हो रही हैं, तब इसी धरती के एक छोटे से गाँव में 19 साल की सावित्री की साँसें पीरियड्स की कुरीतियों में घुटकर रुक गईं।

चमोली के नंदानगर क्षेत्र के सुतोल गाँव की यह लड़की किसी दुर्घटना या बीमारी से नहीं मरी। उसे निगल लिया उस अंधविश्वास ने, जो आज भी कई घरों में मासिक धर्म को पाप, अशुद्धता और शर्म का प्रतीक मानता है। गाँव भूमियाल देवता का है इस लिए वहां पीरियड्स वाली महिलाएं नहा नहीं सकती, कपड़े नहीं धो सकती।

इस लिए उन्हें गांव से बहुत दूर मंदाकिनी नदी में नहाने और कपड़े धोने के लिए जाना पड़ता है। बरसात के मौसम में आजकल मंदाकिनी अपने उफान पर है उसके बावजूद सावित्री और गांव की दूसरी महिलाओं को हर महीने वही जाना पड़ता था।

15 अगस्त को जब देश स्वतंत्रता दिवस माना रहा था तब इस देश में सावित्री और कई दूसरी महिलाएं अपने अस्तित्व के लिए लड़ते लड़ते मर रही थी। उस दिन मंदाकिनी खतरे के उफान पर थी, जो सावित्री के लिए जानलेवा साबित हुई।

तकनीक की इतनी ऊंचाइयों के बावजूद आज भी महिलाओं के शरीर की एक स्वाभाविक प्रक्रिया को इतनी घृणा और भय से देखा जाता है कि लड़की को घर से बाहर, ठंड में, गर्मी में, बरसात में, दिन – रात,  अकेले, बिना देखभाल के, किसी अंधविश्वास और कुरीति के नाम पर गांव से बाहर जाने पर मजबूर कर दिया जाता है, तो यह सिर्फ एक मौत नहीं रह जाती। बल्कि पूरा समाज सामूहिक रूप से इस हत्या का अपराधी बन जाता है।

सावित्री की मौत पर सिर्फ दुख जताना काफी नहीं है। यह मौत परिवार से सवाल पूछती है। क्या परिवार की सुरक्षा और प्यार इतना कमजोर है कि एक बेटी को उसके सबसे कमजोर दिनों में भी अकेला छोड़ दिया जाए? क्या घर की चार दीवारें सिर्फ तब तक सुरक्षित हैं जब तक बेटी तथाकथिक ‘शुद्ध’ मानी जाए? परिवार ही तो वो पहली इकाई है जहाँ हमारी समझ बनती है, जो हमारे लिए सबसे सुरक्षित घरौंदा होता है।

अगर परिवार खुद इस अंधेरे को ढोता रहेगा, तो बाहर की दुनिया कैसे बदल पाएगी? सावित्री की मौत हमें याद दिलाती है कि प्यार सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि उन निर्णयों में दिखता है जो अपनी बेटियों को आगे बढ़ाते है न कि किसी सालों पुरानी कुरीति के चलते उनकी जान जाने तक की नौबत को स्वीकार कर लेता है।

यह सवाल समाज से भी है। हम कितने आगे बढ़ गए हैं अगर आज भी गाँवों में लड़कियों को घरों और गांवों से दूर झोपड़ी,  जंगल या बरसात में नदियों के किनारे भेजने की परंपरा जिंदा है? समाज वह आईना है जिसमें हम अपनी सोच देखते हैं। जब समाज चुप रहता है, जब पड़ोसी, रिश्तेदार और गाँव वाले इसे ‘हमारी परंपरा’ कहकर रोमांटिसाइज करते है तो ये मौते सामान्य नहीं है। क्या हमारा समाज इतना संवेदनहीन हो चुका है कि उसमें एक अठारह-उन्नीस साल की जिंदगी का कोई मोल नहीं? क्या हम सिर्फ त्योहारों और रस्मों में एकजुट होते हैं, लेकिन जब कोई लड़की अंधविश्वास की भेंट चढ़ रही हो तो दूर खड़े देखते रह जाते हैं? आखिर कब तक हम इन बाबा आजम के जमाने की परंपराओं को ढोते रहेंगे? कब इन पर सवाल उठाएंगे? ये समाज कब तक हम महिलाओं की जान की कीमत पर अपनी परंपराओं, धार्मिक अनुष्ठानों को उचित ठहराता रहेगा?

सबसे बड़ा सवाल शिक्षा व्यवस्था पर उठता है। हम स्कूलों में कितनी किताबें पढ़ाते हैं, कितने बच्चे परीक्षा पास करते हैं? उस पर सरकार से ले कर, शिक्षा विभाग तक हर रोज अपनी सफलता के दावे करता नहीं थकता है।  लेकिन क्या हम बच्चों को यह सिखा पाए हैं कि मासिक धर्म कोई शर्म की बात नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा है? शिक्षा अगर सिर्फ डिग्री देने तक सीमित रह गई है और समाज के अंधविश्वासों को तोड़ने की क्षमता नहीं रखती, तो वह शिक्षा अधूरी है। स्कूल और कॉलेज सिर्फ ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि सोच बदलने के केंद्र होने चाहिए। अगर आज भी गाँव की लड़कियाँ और लड़के इस कुरीति को सामान्य मानते हैं, तो हमारी शिक्षा व्यवस्था ने कहाँ चूक की है इस पर सोचने और काम करने का वक्त आ गया है!

सावित्री की मौत सिर्फ एक खबर नहीं है। यह हम सबके सामने एक आईना है। जब दुनिया की महिलाएँ अंतरिक्ष में नई ऊँचाइयाँ छू रही हैं, तब यहाँ एक लड़की अपनी ही मिट्टी पर अंधविश्वास की कैद में दम तोड़ रही है। यह विरोधाभास हमें शर्मिंदा करना चाहिए। अब समय आ गया है कि हम परिवार के अंदर, समाज के बीच, प्रशासन के दफ्तरों में और स्कूलों की कक्षाओं में खुलकर बात करें। परंपराएँ तब तक सम्मान की हकदार हैं जब तक वे इंसानियत को बचाएँ। जो परंपरा जान ले ले, उसे तोड़ना ही समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन जाती है।

सावित्री अब नहीं रही, लेकिन उसकी मौत हमें याद दिलाती रहेगी कि चुप रहना भी एक तरह का अपराध है। आज हमें बोलना होगा, सवाल पूछना होगा और बदलाव की शुरुआत अपने घरों से करनी होगी। क्योंकि हर लड़की चाँद तक पहुँचने के लायक है, और उसके लिए उसे, पहले धरती पर सुरक्षित जीने का अधिकार मिलना चाहिए।

फेसबुक वॉल से।

 

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