
डॉ. प्रकाश हिंदुस्तानी।
कृष्णावतारम केवल नास्तिकों और अंधों को पसंद नहीं आएगी!
‘कृष्णावतारम पार्ट वन: हृदयं’ दूसरी धार्मिक फिल्मों से एकदम अलग है? फिल्म कृष्ण को सिर्फ चमत्कार करने वाला भगवान नहीं बनाती। कृष्ण प्रेमी, दोस्त, राजा, दार्शनिक और सहानुभूतिपूर्ण इंसान के रूप में उभरते हैं। उनकी भावुक जटिलता, करुणा और आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता को नरमी से दिखाया गया है। भगवान कभी इतने इंसानी नहीं लगे। इसमें महाभारत में कृष्ण की भूमिका ज्यादा नहीं है बल्कि राधा के साथ दिव्य प्रेम और विरह, रुक्मिणी की शांत बुद्धिमत्ता का वर्णन है। सत्यभामा की नजर से पूरी कहानी प्रस्तुत की गई है। सत्यभामा की ईर्ष्या, प्रेम, हृदय-परिवर्तन और भक्ति दिखाई गई है। सत्यभामा का पर्स्पेक्टिव ताजा और दुर्लभ है, जो मुख्यधारा की फिल्मों में कम दिखता है।
परदे पर श्रीकृष्ण का रोल करना कलाकारों के लिए हमेशा ही फायदे का सौदा रहता है। एनटीआर ने अपने जीवन में 17 धार्मिक फिल्मों में कृष्ण का रोल किया था। वे राजनीति में आये, अपनी पार्टी बनाई तो 9 महीने में ही आंध्र प्रदेश केमुख्यमंत्री बन गए थे। यहाँ तक कि उनके दामाद चंद्र बाबू नायडू भी मुख्यमंत्री बने। नीतीश भारद्वाज महाभारत सीरियल में कृष्ण बने तो संसद सदस्य बन गए।
पौराणिक कथाओं पर आधारित फिल्मों के बारे में लिखना हमेशा अनुचित लगता है क्योंकि कहानी सभी को मालूम होती है। इनमें आस्था, पुरानी यादें, बचपन की स्मृतियां, दूरदर्शन की झलकियां और सिनेमा के आने से बहुत पहले से मौजूद भावनाएं शामिल होती हैं। कृष्णावतारम फिल्म ‘फॉर द डिवोटीज़, बाय द डिवोटीज़’ वाली भावना से बनी है।
इसमें सिद्धार्थ गुप्ता कृष्ण बने हैं, वे गोर चिट्टे हैं तो शुरू में असहज लगता है क्योंकि हम हमेशा ही सांवले से कृष्ण की कल्पना करते आये हैं।
लगभग ढाई घंटे की इस फिल्म में भक्ति और स्पेक्टेकल का वो मेल है, जो दुर्लभ है। लेकिन इसमें वो गहराई है जो कई बड़ी धार्मिक फिल्मों में कम दिखती है। यह फिल्म कृष्ण को दिव्य अवतार के साथ-साथ मानवीय हृदय वाला चरित्र बनाती है। यहाँ भावनाओं और संबंधों पर फोकस है, जबकि ज्यादातर धार्मिक फिल्में युद्ध, चमत्कार, राक्षस-वध या बड़े एक्शन पर जोर देती हैं। लेकिन यह फिल्म कृष्ण के प्रेम, विरह, संबंधों और आंतरिक संघर्ष पर केंद्रित है।
कहानी के कुछ हिस्से थोड़े परिचित लग सकते हैं औरवीएफएक्स हर जगह परफेक्ट नहीं हैं, लेकिन ये कमियां फिल्म की भावुकता के आगे फीकी पड़ जाती हैं। यह फिल्म बड़े स्टार्स के बिना भी दिल जीत लेती है। कोई अत्यधिक नॉइज या ओवर-द-टॉप ड्रामा नहीं। यह लगभग आध्यात्मिक संगीत की तरह है — गाने, संवाद और दृश्य सब दिल को छूते हैं। नए चेहरों और सच्ची भक्ति का मेल है।
टीवी पर महादेव बनानेवाले डायरेक्टर हार्दिक गज्जर ने इसे बिना किसी कर्मर्शियल मजबूरी के बनाया है और इसके दो पार्ट और आनेवाले हैं। इसके
कुछ हिस्सों में आधुनिक संदर्भ दिए गए हैं, जो कृष्ण की शिक्षाओं को आज की पीढ़ी से जोड़ते हैं।
सुष्मिता भट्ट राधा बानी हैं और संस्कृति जयाना सत्यभामा, निवाशियनी कृष्णन ने रुक्मिणी की भूमिका की है। प्रकाश कपाड़िया के लिखे संवाद दमदार हैं। ये संवाद भावुक हैं, लेकिन ओवर-ड्रामेटिक नहीं।
: “नियति मेरे बस में नहीं, मेरा यह अवतार नियति के अधीन है…”,
“एक ओर प्रेम है और दूसरी ओर कर्तव्य…”,
“हर मनुष्य को अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी पड़ती है…”,
“रंगरूप के भेदभाव का निर्माण तो मनुष्य ने किया है, ईश्वर की दृष्टि में सभी समान हैं…”,
“आत्मा के रास्ते जाओगे तो परमात्मा को पाओगे…”,
“धर्म की स्थापना ही हमारा उत्तरदायित्व है…” और “मनुष्य होना कदाचित सरल है, परंतु मनुष्य के रूप में ईश्वर होना बहुत कठिन…”
यह फिल्म पारंपरिक कथाओं को दोहराती नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं के जरिए कृष्ण को दिखाती है। कृष्ण बने सिद्धार्थ गुप्ता की आंखों में दिव्यता, मुस्कान में माधुर्य और संवादों में गहराई है। वे स्क्रीन पर पूरी तरह कृष्ण लगने लगते हैं।
शुरुआत में बाण से घायल और मृत्यु के कगार पर खड़े भगवान कृष्ण जीवन पर चिंतन करते हैं और लगभग काव्यात्मक ढंग से हमें याद दिलाते हैं कि मृत्यु का भी जश्न मनाया जाना चाहिए। सन्नाटा छा जाता है, स्वीकृति का भाव आता है, उदासी छा जाती है और फिर बांसुरी की ध्वनि सुनाई देती है। कहीं दूर, राधा को इसका आभास होता है – उनकी आंखों से एक आंसू बह निकलता है और कृष्ण उनके प्रिय फूलों में समा जाते हैं। यह सिनेमाई सौंदर्य है।
फिल्म पुरी के जगन्नाथ मंदिर पहुंचती है, जहां एक युवा पीढ़ी का लड़का विज्ञान, तर्क और रात के 2 बजे पॉडकास्ट रील देखने वाले के आत्मविश्वास के साथ धर्म पर सवाल उठाता है। जब वह जैकी श्रॉफ द्वारा अभिनीत पुजारी से ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण मांगता है, तो फिल्म चतुराई से उस बातचीत का उपयोग करते हुए हमें द्वारका वापस ले जाती है।
फिल्म में दर्शक को राधा के बजाय (सत्य)भामा और रुक्मिणी के साथ भावनात्मक जुड़ाव अधिक मजबूत महसूस होता है। राधा और कृष्ण के बीच का प्रेम भावपूर्ण रूप से कभी पूरी तरह से उभर नहीं पाता। वहीं, भामा की तड़प और कोमलता दर्शकों को अपनी ओर खींच लेती है।
निर्देशन, विजुअल्स और म्यूजिक ने भक्ति और बड़े पर्दे को अच्छे से बैलेंस किया है। सेट्स भव्य हैं। सिनेमैटोग्राफी रात के दृश्यों में जादू रचती है।म्यूजिक भक्ति रस से भरा है. भजन-ट्रैक्स दिल छू लेते हैं। पेसिंग आरामदेह है, कोई जल्दबाजी नहीं। भक्तों के लिए शुद्ध अनुभव है, थिएटर में देखने लायक।
नास्तिक और दृष्टिहीन इसे देखने न जाएं, अझेलनीय लगेगी। अगर आप कृष्ण को मानते हैं, तो यह फिल्म अलौकिक लगेगी।



