Sunday, May 26, 2024

ये ‘चायचारा’ क्या राहुल को लाभ दिला सकेगा

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निहितार्थ: …..इसीलिये मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पे बुलाया है। यह अपने समय का मशहूर गाना है। सुबह अखबार पढ़ते हुए ये गीत दोहरा लेने का मौका मिला। यूं तो विपक्षी दलों (opposition parties) को चाय (Tea) पर राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने बुलाया था, लेकिन जिस तरह की बात इसमें होना थी और हुई भी। बेशक इस चाय पार्टी (tea Party) के मेजबान राहुल गांधी थे लेकिन क्या यह माना जा सकता है कि विपक्षी दलों ने गांधी परिवार (Gandhi family) के राजनीति में अब तक फेल साबित हुए गांधी परिवार के इस युवराज की अगुवाई स्वीकार कर ली है?

अपनी राजनीति की तमाम असफलताओं के बावजूद इस बात की तारीफ करना पड़ेगी कि केंद्र की मोदी सरकार (Modi government) को घेरने का राहुल कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। आज का चाय और नाश्ता केवल मोदी फैक्टर से प्रभावित नहीं थे। इस पर ममता बनर्जी Mamata Banerjee() के ‘पूरे देश में खेला होबे’ वाली हुंकार का असर भी है। ममता अपनी हालिया दिल्ली यात्रा के दौरान सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) से भी मिलीं। वहां राहुल भी मौजूद थे। ममता ने इस यात्रा में जिस तरह विपक्ष के नेताओं से अलग-अलग बातचीत की, उससे साफ है कि बंगाल के चुनाव में नरेंद्र मोदी (Narendra Modi), अमित शाह (Amit Shah) और जेपी नड्डा (JP Nadda) की तिकड़ी को धूल चटाने के बाद अब वह आगामी आम चुनाव (General election) की तरफ कदम बढ़ा रही हैं। वह भी कुछ ऐसे अंदाज में कि सबसे आगे उनके श्रीचरण रहें और बाकी विपक्षी सेना उनके पीछे मार्चपास्ट करती दिखे। हालांकि कहने को तो वे कह गई कि उनकी ऐसी कोई इच्छा नहीं है और उनके लिए पश्चिम बंगाल ही प्यारा है।

राहुल का भी यही सपना है कि BJP से नाराज दलों की चतुरंगिणी सेना उन की अगुवाई में ही चले। इसलिए माना जा सकता है कि राहुल की चाय की चुस्की ममता के मुकाबले शक्ति प्रदर्शन वाला मामला हो। राहुल का संयम गजब का है। लगातार हार और नेतृत्व के नाम पर अपनी फजीहतों के बावजूद वह केंद्र सरकार के पीछे पड़े हुए हैं। हालांकि उनका यह पीछा पड़ना सोशल मीडिया (social media) पर ज्यादा है, जमीन पर कम। फिर भी अपने तई तो राहुल का मोदी से संघर्ष कभी थमा नहीं है। अब इतनी बड़ी तपस्या को भूलकर वह भला किस तरह किसी अन्य और को मौके का लाभ लेने देंगे! लेकिन यह होगा कैसे? इस चाय पार्टी में राहुल ने विपक्ष को क्या कहकर अपने प्रति बुरी तरह डगमगाए यकीन को फिर जिन्दा करने की कोशिश की होगी? गांधी अतीत की अपनी किसी भी गलती से सबक लेने की मुद्रा में अब भी नहीं दिख रहे हैं। तो क्या उन्होंने इसे अपनी उपलब्धि कहकर गिनाया होगा कि संसद (Parliament) चलने नहीं दी जा रही है? यह तो तय ही है कि गांधी ने विपक्षी दलों से बनर्जी के नेतृत्व में लामबंद होने का आह्वान नहीं किया होगा। तो फिर क्या वह किसी भी स्वरूप में कोई ऐसा फार्मूला दे सके होंगे, जिससे चौदह दलों के प्रतिनिधि उनकी मौजूदगी को ‘जिधर बम, उधर हम’ वाले भाव से स्वीकार कर पाए होंगे? एक और सवाल है कि आखिर क्यों कर बहुजन समाज पार्टी (BSP) और आम आदमी पार्टी (AAP) ने इस आयोजन से दूरी बना ली? जबकि ये दोनों दल भी मोदी के घोर विरोधियों में गिने जाते हैं। याद दिला दें कि दिल्ली प्रवास के दौरान ममता ने अरविन्द केजरीवाल (Arvind Kejriwal) से अलग से मुलाकात की थी। तो क्या ये केजरीवाल की दीदी के लिए किसी गोपनीय निष्ठा का असर था कि उन्होंने इस चाय का स्वाद लेना उचित नहीं समझा?

यह तय है कि केंद्र की मौजूदा सरकार को पराजित करने के लिए विपक्ष की अभूतपूर्व किस्म की एकजुटता चाहिए। लेकिन जिस जगह कमोबेश हर गुट में PMपद का एक उम्मीदवार साफ दिखता हो, उसमें शुरूआत से ही उभर रही ऐसी दरारों को मजबूती मिलने की बात कोई सोच भी कैसे सकता है? ममता बनर्जी ने निश्चित रूप से खुद को मोदी की अपराजेय छवि के विरुद्ध सशक्त विकल्प साबित किया है। महाराष्ट्र में शरद पवार ने महाअघाड़ी के प्रयोग के जरिये मोदी की रणनीति को ध्वस्त करने का करिश्मा कर दिखाया। दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल की सरकार के आगे केंद्र की समूची शक्ति आये दिन किसी कमजोरी में बदल जाती है। बिहार में बीते विधानसभा चुनाव के समय लालू यादव (Laloo Yadav) के बेटे तेजस्वी ने नितीश कुमार (Nitish Kumar) और BJP की जुगलबंदी के पसीने छुड़वा दिए थे। यानी विपक्ष के इस खेमे में उसकी वर्ष 2024 की कोशिशों को संजीवनी बूटी दे सकने वाले कई चेहरे मौजूद हैं, किन्तु इस फ्रेम में कहीं से कहीं तक राहुल गांधी फिट नहीं होते हैं। सोनिया गांधी का भी स्वास्थ्य कारणों से UPA के सरकार के समय सबको साध कर चलने वाला जादू अब ढल चुका है। जहां तक प्रियंका वाड्रा का सवाल है, तो सोनिया गांधी अपनी इस बेटी को आगे लाकर विपक्षी दलों के अपने प्रति अविश्वास को और गाढ़ा हो जाने का जोखिम मोल नहीं लेंगी।

उत्तर प्रदेश का चुनाव नजदीक है। पंजाब में भी चुनावी समर सिर पर आ चुका है। ऐसा माना ही जा रहा है कि कम से कम उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव (Uttar Pradesh Assembly Elections) का परिणाम आम चुनाव के परिदृश्य का साफ संकेत दे देगा। वह राज्य, जहां कभी कांग्रेस ने पंद्रह मुख्यमंत्री दिए और आज उस राज्य की 415 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस (Congress) के केवल सात विधायक ही हैं। कांग्रेस को उस राज्य में सरकार बनाना तो दूर, उसकी संभावनाएं तलाशने के लिए भी कड़ा परिश्रम करना होगा। इस सबके साथ विपक्ष के बीच भाईचारा कायम रखने के लिए ये ‘चायचारा’ क्या राहुल को लाभ दिला सकेगा, यह बड़ा प्रश्न है। जिसका जवाब खोजना फिलहाल दीवार पर सर मारने जैसा है।

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