Sunday, May 26, 2024

कांग्रेस के कातिल ही उसके मुंसिफ

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जिस कांग्रेस (Congress) ने देश पर करीब चार दशक तक पूरे समर्थन से राज किया आखिर वो अब लोकसभा (Loksabha) में दो अंकों में कैसे सिमट कर रह गई ? 1984 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए वो आखिरी चुनाव साबित हुआ, जब देश ने इंदिरा गांधी की शहादत के बाद उसे ‘भूतो न भविष्यति’ वाल समर्थन सौंपा था। इसके बाद यह 2019 का चुनाव लोकसभा का नौवां चुनाव है। इन नौ लोकसभा चुनावों में भी तीन बार कांग्रेस के नेतृत्व में ही सरकार बनी। लेकिन राजीव गांधी (Rajiv gandhi) की शहादत के साए में हुए 1991 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस बहुमत से काफी पीछे रह गई थी। इसके बाद 2004 और 2009 में उसके नेतृत्व में UPA की सरकार बनी। 2004 में तो उसकी सीटें डेढ़ सौ से कम ही थी लेकिन यूपीए की सबसे बड़ी पार्टी फिर भी कांग्रेस थी। 2009 में फिर यूपीए सरकार UPA Government() बनी और कांग्रेस ने 200 सीटों का आंकड़ा पार किया। इन दस सालों में उन कांग्रेसी नेताओं (Congress leaders) को भी जो आज पार्टी नेतृत्व (Party leadership) पर सवाल उठा रहे हैं, ये नहीं सूझा कि आखिर पार्टी में कमियां कहां हैं। और ना ही नेतृत्व कर रहे परिवार ने कभी इस पर विचार किया कि क्या उसका वो माद्दा चूक रहा है जो पार्टी को अपने चमत्कार से सत्ता में लाने का दावा करता रहा है।

मौजूदा गांधी-नेहरू परिवार (Gandhi-Nehru Family) क्षमताओं के मामले में दिंवगत इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) से केवल एक समानता (वो भी कुदरत की मेहरबानी से ही) हासिल कर सका है। इसलिए राहुल की नाकामी के बाद कांग्रेस के नेताओं ने प्रियंका (Priyanka) में इंदिरा गांधी को ढुंढ़ने की कोशिश की। लेकिन इस कुनबे के मौजूदा कर्ताधर्ताओं ने नाक के मामले में इंदिरा और पंडित नेहरू के समान ही पूरी क्रूरता के साथ सजगता बरती है। न नेहरूजी (Nehruji) ने इंदिरा के बराबर किसी और को पनपने दिया और न ही इंदिरा इस परंपरा के निर्वहन में पीछे रहीं। कांग्रेस में दिग्गज और योग्य नेताओं की कमी कभी नहीं थी। लेकिन राज्यों में क्षत्रपों को कभी ताकतवर होने की आजादी इंदिरा गांधी ने भी नहीं दी। उनकी जड़ें काटने में कोई कोताही किसी भी समय और किसी भी स्तर पर नहीं की गयी। जनता पार्टी (Janata Party) के विपक्षी एकता के प्रयोग के फैल होने के बाद सत्ता में लौटी इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को पूरी तरह परिवार की छत्रछाया में ला खड़ा किया था। राजीव गांधी के मिले अपार समर्थन से उनके सलाहकारों के भीतर बैठे डर ने राज्यों के ताकतवर नेताओं को और तेजी से खत्म करने का काम किया।





उत्तरप्रदेश के दमदार चेहरे कमलापति त्रिपाठी (Kamalapati Tripathi) राजीव गांधी को पार्टी में सुधार के लिए खत लिख-लिखकर इस दुनिया से चले गए, लेकिन राजीव ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया। यही इस राज्य में वीर बहादुर सिंह (Gandhi-Nehru Family) से लेकर नारायण दत्त तिवारी (Narayan Dutt Tiwari) के सा थ भी किया गया। पश्चिम बंगाल में प्रणब मुखर्जी (Pranab Mukherjee) और सिद्धार्थ शंकर रे (Siddharth Shankar Ray) के बाद ममता बनर्जी (Mamta banajtee) कांग्रेस की बहुत प्रभावी और संभावनाओं से परिपूर्ण चेहरा बन कर उभर रहीं थी। मगर उन्हें भी बड़ी महीन छुरी से काटकर कमजोर किया गया। महाराष्ट्र के शरद पंवार हों या दक्षिण भारत में इसी कद के अनेक नेता। राजशेखर रेड्डी (Rajasekhara Reddy) के बाद सोनिया की कांग्रेस ने जगन मोहन रेड्डी (Jagan Mohan Reddy) के साथ क्या बर्ताव किया, क्या इसकी याद कांग्रेस के वर्तमान नेताओं को दिलाना पड़ेगी। कांग्रेस ने एक हद के बाद उन सभी के पर कतरने का ही काम किया। किसी भी राज्य में उभरते गैर नेहरू-गांधी चेहरों (Nehru-Gandhi faces) की यही गत हुई। मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह एक बड़े क्षत्र प के तौर पर उभरे थे लेकिन राजीव गांधी ने सबसे पहले उन्हें ही मध्यप्रदेश (Madhya pradesh) में डिस्टर्ब किया। दूसरी बार शपथ लेने के एक दिन बाद ही उन्हें पंजाब का राज्यपाल बनाकर भेज दिया गया था। शरद पंवार (Sharad pawar) की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (Nationalist Congress Party) हो या फिर ममता की तृणमूल कांग्रेस, ये सब भी सोनिया कांग्रेस में छटपटाहट से ही उपजे हैं।

जिन्होंने बगावत की या खामोश रह गए, उन सभी का हश्र एक जैसा हुआ। सभी कहीं के नहीं रहे। महाराष्ट्र में अंतत: सरकार का हिस्सा बनने के लिए सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को उन्हीं शरद पंवार का हाथ थामना पड़ा है जो सोनिया के कारण ही कांग्रेस से अलग हुए थे। सवाल यह कि प्रणब से लेकर और ममता में क्या नेतृत्व की क्षमता नहीं थी? ममता ने तो लगातार दो बार पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री बनकर कांग्रेस को हाशिए पर डाल दिया। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस अब महज शो पीस बनकर रह गयी है। क्योंकि उसका झंडा बुलंद कर सकने वाले क्षमतावान चेहरों को साजिशन खत्म कर दिया गया। यही उत्तरप्रदेश, बिहार, ओडिशा और मध्यप्रदेश आदि राज्यों में भी हुआ। अब कांग्रेस केवल उन जगहों पर नंबर दो का खिताब कायम रख पा रही है, जहां किसी तीसरी ताकत का वजूद नहीं है। मध्यप्रदेश में नब्बे के दशक में अर्जुन सिंह (Arjun singh) ने कांग्रेस के कई नए नेताओं को प्रदेश में खड़ा कर कांग्रेस को मजबूत किया था। लेकिन राजीव गांधी ने उन्हें पंजाब का राज्यपाल बनाकर अपने असुरक्षा बोध का जो परिचय दिया, उसी रवायत को सोनिया गांधी की मूक स्वीकृति के साथ दिग्विजय सिंह (Digvijay singh) ने भी आगे बढ़ाया। नतीजा, अब यहां भी पार्टी नेताओं के नाम पर कुछ गिने-चुने तथा थकेले नेताओं के भरोसे पर ही लड़खड़ाते हुए आगे चलने की कोशिश कर रही है।





इस पार्टी की शून्यता वाली समस्या का प्रसंग यहीं खत्म नहीं होता। अब जो शीर्ष चेहरे (निश्चित ही गांधी-नेहरू परिवार से अलग वाले) बदलाव की वकालत कर रहे हैं, उनका खुद का कोई मजबूत जनाधार नहीं हैं। वे प्रतिष्ठित हैं, प्रबुद्ध हैं लेकिन इनमें से जनाधार किसके साथ है,यह भी खोजना पड़ेगा। गुलाम नबी आजाद से लेकर कपिल सिब्बल, शशि थरूर, आनंद शर्मा और मनीष तिवारी, विवेक तन्खा और जो भी नेता इस दिशा में सक्रिय हैं, लेकिन राष्ट्रीय परिदृश्य तो दूर, अपने-अपने राज्यों में भी उनकी कोई मास अपील नहीं है। या तो उनका यह प्रभाव कभी था ही नहीं और या फिर उस असर को पार्टी के शीर्ष से ही खत्म कर दिया गया। किसी समय कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे गुलाम नबी आजाद (Ghulam Nabi Azad) इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। तो पार्टी के भीतर की इस कमजोर बगावती पीढ़ी से भी ‘परिवार’ पूरी तरह निश्चिंत मुद्रा में हैं। उसे यकीन है कि कम से कम मौजूदा मुखर चेहरे तो उसकी भविष्य की उज्जवल संभावनाओं पर ग्रहण लगाने की क्षमता नहीं रखते हैं। इसलिए गुलाम नबी आजाद इस बार राज्यसभा में नहीं आ सके और अब अगला नंबर शायद आनंद शर्मा का होगा।

कांग्रेस इस बात की तरफ ध्यान ही नहीं दे पा रही है कि उसकी इस वंशवादी प्रवृत्ति का कितना बुरा नतीजा हो रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) ने मध्यप्रदेश में उसकी संभावनाओं पर दीर्घावधि की तकलीफ वाली चोट कर दी। राजस्थान में सचिन पायलट भले ही नाकाम होकर चुप बैठ गए, लेकिन दिल्ली सहित गेहलोत से नाखुश चेहरों को उन्होंने भविष्य की खंदक खोदने का रास्ता तो दिखा ही दिया है। उत्तरप्रदेश में नेतृत्व और नेताओं के नाम पर यह दल भारी गरीबी का शिकार हो चुका है। बिहार में तो कई बार ये भ्रम लगने लगता है कि शायद तेजस्वी यादव ही वहां के कांग्रेस अध्यक्ष (Congress president) हो चुके हैं। गुजरात में बीते चुनाव में इस दल ने जिस तरह अल्पेश, जिग्नेश और हार्दिक के आगे नतमस्तक वाला भाव दिखाया था, उससे साफ था कि इस प्रदेश में भी पंजा अब आशीर्वाद देने नहीं, बल्कि उसे मिलने की मिन्नत करने वाली दुर्दशा का ही शिकार हो चुका है। गुजरात में लंबी एंटी इनकंबेंसी को भी अगर कांग्रेस नहीं भुना पा रही है तो अब भविष्य में क्या संभावनाएं देखेंगे। ये मुफलिसी उनकी देन है, जिन्हें गांधी परिवार का बताकर पूजा जा रहा है। एक शेर है,’ मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है, क्या मेरे हक में फैसला देगा।’ ये शेर कांग्रेस की दुखती आत्मा का काबिज परिवार से शिकवा हो सकता है, अगर किसी में आवाज उठाने का साहस हो तो। जिसकी फिलहाल कोई संभावना नहीं है। अब रविवार को पांच राज्यों के वास्तविक चुनाव परिणाम सामने होंगे। कांग्रेस के सामने रास्ता क्या होगा? इस सवाल पर आगे। फिलहाल लोकतंत्र के सुरक्षित भविष्य के लिए कांग्रेस कम से कम असम और केरल में अच्छा कर सके, इसकी शुभकामनाएं देता हूं।

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