निहितार्थ

यात्रा नहीं, तफरीह कर रहे हैं राहुल

राहुल की यात्रा में एक भी जगह या एक भी मौके पर ऐसा नहीं दिखा कि वह कुछ समझने या अनुभव करने की कोशिश भी कर रहे हों। आम आदमी के कंधे पर हाथ रख देने भर से कुछ नहीं हो जाता। आपको सारे प्रोटोकॉल और कैमरे की हलचल से विरत होकर उस आदमी के मन के भीतर झांकना होता है।

दिग्विजय सिंह की नर्मदा यात्रा के दौरान एक कॉमन बात रही। अलग-अलग जगह उनसे मिलने गए लोग एक बात पर जरूर गौर करते थे। वह यह कि लंबी यात्रा से दिग्विजय में कितना बदलाव आया है। अंतर साफ़ था। यात्रा के बाद दिग्विजय मध्यप्रदेश के लिए अपनी जानकारी के हिसाब से ‘नब्ज समझने’ के और नजदीक दिखे। इस दौरान मिले अनुभवों के आधार पर उन्होंने चुनाव में ‘पंगत पे संगत’ वाला प्रयोग किया। कांग्रेस में अपने धुर विरोधियों के साथ भी कदमताल की। यदि यह सारी कवायद बहुत अधिक सफल नहीं हुई होतीं, तो कमलनाथ की सरकार में दिग्विजय का वह कद नजर नहीं आता, जो दिखा। वह सुपर चीफ मिनिस्टर की भूमिका में पूरे पन्द्रह महीने प्रभावशाली बने रहे।

यह इसलिए याद आ रहा है कि बुधवार को राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा मध्यप्रदेश में प्रवेश कर रही है। कुल 1796 किलोमीटर से अधिक की अब तक की यात्रा निश्चित ही बहुत बड़े फासले को बताती है और इसलिए यह समीक्षा की जा सकती है कि देश की एक सरहद से हृदय प्रदेश तक पहुंचने के बीच राहुल में कितना और कैसा परिवर्तन आया है। यूं देखें तो पैदल चलने से राहुल काया के हिसाब से कुछ और अधिक फिट दिखने लगे हैं। झक सफ़ेद दाढ़ी-मूंछ उनकी फिटनेस और उम्र के बीच के अंतर को साफ़ दिखाने लगी हैं। लेकिन इसके अलावा और कोई बड़ा परिवर्तन नहीं दिखता है।

यात्रा में राहुल हजारों लोगों से रूबरू हो चुके हैं, लेकिन क्या एक भी बार ऐसा लगा कि इन मुलाकातों से वह देश या इसके हालात को लेकर कुछ नया सीख सके हों। वही बासी कढ़ी में उबाल देने की तर्ज पर घिसे-पिटे आरोप। वही कांग्रेस (विशेषतः अपने परिवार) के देश के लिए कार्यों के दावे करना। गांधी ले-देकर कुछ अलग बोले तो वह भी वीर सावरकर पर। और उसकी प्रतिक्रिया में यह हुआ कि जवाहरलाल नेहरू तक अंग्रेजों के ‘ओबिडिएंट सर्वेंट’ के रूप में एक्सपोज हो गए।

अब तक की यात्रा में जो राहुल दिख रहे हैं, उससे साफ़ है कि उनका ज्ञान आज भी वही है, जो यात्रा के पहले हुआ करता था। इतने तलुए घिसने के बाद भी वह अपनी बौद्धिक क्षमता की बेहद मोटी हद को ख़त्म करना तो दूर, बारीक तक नहीं कर सके हैं। दरअसल यह यात्रा से अधिक एक इवेंट होकर रह गया है। जो साथ आया, उसके साथ मुस्कुराते हुए तस्वीर खिंचवा ली। फिर सोशल मीडिया मैनेजर ने उन्हीं तस्वीरों में क्रांति के ख़याली बीज बो दिए और कोई दार्शनिक लाइन उस पर चेंप दी। हो गया काम। गुजर गया यात्रा का एक और दिन।

क्या राहुल की यह यात्रा लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा के मुकाबले चंद प्रतिशत में भी सार्थक दिख रही है? आडवाणी ने रथ पर सवार होकर पूरे देश में राम लहर ला दी थी। चलिए, आपको भाजपा से तुलना ठीक नहीं लग रही तो कांग्रेस की ही बात कर लेते हैं। महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से आने के बाद लगभग पूरे देश का भ्रमण किया। गांव-गांव जाकर लोगों से मिले। तमाम जगहों की स्थिति को समझा। अनुभव किया। इसके बाद जब उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी, तब साफ़ था कि अपनी यात्रा के अनुभवों के आधार पर वह पूरी तैयारी के साथ ऐसा कर रहे थे। तब ही तो यह हो सका कि दिल्ली में गांधी जी का एक-एक शब्द सारे देश की आवाज का प्रतिनिधित्व करता था।

राहुल की यात्रा में एक भी जगह या एक भी मौके पर ऐसा नहीं दिखा कि वह कुछ समझने या अनुभव करने की कोशिश भी कर रहे हों। आम आदमी के कंधे पर हाथ रख देने भर से कुछ नहीं हो जाता। आपको सारे प्रोटोकॉल और कैमरे की हलचल से विरत होकर उस आदमी के मन के भीतर झांकना होता है। राहुल ऐसा कर नहीं पा रहे या ऐसा करना नहीं चाहते, ये वह खुद जानें, लेकिन यह तय है कि इस यात्रा में ऐसा कुछ भी नहीं होता दिख रहा है। यदि आप इसी बात से गदगद हैं कि अमोल पालेकर, पूजा भट्ट, रोहित वेमुला की माँ या कोई और ख़ास नाम आपके साथ कुछ कदम चल लिया तो फिर आप एक तरीके की गलतफहमी के शिकार ही कहे जाएंगे।

अब तक के अनुभव से यह बेशक कहा जा सकता है कि राहुल की यह यात्रा तफरीह से अधिक और कुछ साबित नहीं हो रही है। लोगों की भीड़ सफलता का पैमाना नहीं है। पाकिस्तान में 1997 के आम चुनाव से इमरान खान ने राजनीति में प्रवेश किया था। वह एक साथ सात सीटों से उम्मीदवार बने। उनकी सभाओं में ऐसी भीड़ उमड़ी कि विरोधी दलों को पसीना आ गया, लेकिन जब नतीजा आया तो इमरान सभी सात सीटों पर हार चुके थे। इमरान देश के प्रधानमंत्री केवल तब बन सके, जब उन्होंने अपनी स्टार छवि को एक कोने में कर पाकिस्तान के जमीनी हालात को समझा और उसके मुताबिक़ रणनीति अपनाई। राहुल भी इस यात्रा में इमरान 1997 वाले नक़्शे-कदम पर ही चलते दिख रहे हैं। उन्हें चाहिए कि अपने उपनाम गांधी को ‘राहुल’ की बजाय ‘मोहनदास’ की शैली में विकसित करने की कोशिश करें। वरना तो पैदल चलना सेहत के लिए अच्छा होता है। हाँ, पार्टी खुद पैदल नहीं चल सकती। वह घिसट रही है और उसे खोयी ताकत और जवानी लौटाने के लिए राहुल के इस टोटके से अधिक सहायता मिलने की कोई उम्मीद नहीं दिखती है।

प्रकाश भटनागर

मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में प्रकाश भटनागर का नाम खासा जाना पहचाना है। करीब तीन दशक प्रिंट मीडिया में गुजारने के बाद इस समय वे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश में प्रसारित अनादि टीवी में एडिटर इन चीफ के तौर पर काम कर रहे हैं। इससे पहले वे दैनिक देशबंधु, रायपुर, भोपाल, दैनिक भास्कर भोपाल, दैनिक जागरण, भोपाल सहित कई अन्य अखबारों में काम कर चुके हैं। एलएनसीटी समूह के अखबार एलएन स्टार में भी संपादक के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। प्रकाश भटनागर को उनकी तल्ख राजनीतिक टिप्पणियों के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है।

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