Sunday, May 26, 2024

दिग्विजय जी ! विश्वास का उत्तर विष-वास से न देना

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‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। सदियों रहा है दुश्मन दौरे-जहां हमारा।’ यह पंक्ति दिग्विजय सिंह (Digvijay singh) के लिए बेहिचक कही जा रही है। कांग्रेस ने अपने इस नेता पर एक बार फिर बड़ा भरोसा जताया है। सोनिया गांधी (sonia Gandhi) की नरेंद्र मोदी सरकार (Narendra Modi government) के खिलाफ गठित नौ सदस्यीय समिति (nine member committee) में दिग्विजय सिर्फ शामिल ही नहीं किए गए बल्कि उन्हें इसका अध्यक्ष भी बनाया गया है। तो टीम दिग्वजय सिंह का जिम्मा होगा कि वह मोदी सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय मुद्दों पर सतत आंदोलन की रणनीति तैयार करे।

ये वही दिग्विजय सिंह हैं, जिन्हें वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव प्रचार (assembly election campaign) के लिए मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) आये राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने कोई भी तवज्जो नहीं दी थी। वही सिंह, जो आज भी गोवा में कांग्रेस (Congress) के हाथ से फिसली सत्ता के लिए दोषी ठहराए जाते हैं। वही राज्यसभा सांसद, जिनके भोपाल लोकसभा सीट (Bhopal Lok Sabha seat) से बुरी तरह हारने के बाद विरोधी उनके अंतिम राजनीतिक दिनों की गिनती करने में जुट गए थे। वही पूर्व मुख्यमंत्री, जिनके लिए कमलनाथ भी अपनी सरकार गिरने के बाद का गुस्सा रोक नहीं सके थे।

अब दिग्विजय इन सभी घटनाओं की धूल झाड़-पोंछकर फिर सियासी अखाड़े में दंड पेलने लग गए हैं। जाहिर है कि कांग्रेस के इस नेता में कुछ तो ऐसा है कि उसकी हस्ती मिटाये से नहीं मिट पाती है। लेकिन इसी शेर की एक पंक्ति भी यहां सोद्देश्य याद की जा सकती है। वह यह कि दिग्विजय यूं ही दुश्मनों से घिरे रहते हैं, तिस पर असंख्य मौकों पर तो वह अपनी पार्टी के ही शत्रु बने नजर आ जाते हैं। दिग्विजय समय-समय पर तुष्टिकरण की राजनीति (politics of appeasement) के महासागर में डुबकी खुद लगाते हैं और उसके चलते नैया कांग्रेस की डूब जाती है। खास फैक्टर यह भी कि इस तरह की राजनीति के चलते हमेशा ही BJP का फायदा हो जाता है। इसके बाद भी यदि कांग्रेस का नेतृत्व सिंह पर एक के बाद एक यकीन दिखाता है तो यह दिग्गी के नाम के साथ समर्थकों द्वारा जोड़े जाने वाले ‘राजा’ के विशेषण को काफी हद तक जस्टिफाई कर देता है।

तमाम बार नुकसान उठाने के बाद भी कांग्रेस ने दिग्विजय को उत्तरप्रदेश (Uttar Pradesh), असम (Assam), आंध्र प्रदेश (Andra Pradesh) तथा गोवा राज्यों का प्रभारी बनाया। उन्हें कांग्रेस की आर्थिक मामलों की समिति में जगह दे गयी। बीते साल सितंबर में उन्हें AICC की वर्किंग कमेटी में स्थाई सदस्य बनाया गया। यह सारी अहम जिम्मेदारियां दिग्विजय को उनकी जिन क्षमताओं के चलते दी गयीं, उन्हीं क्षमताओं का सिंह कांग्रेस को पूरा-पूरा तो दूर, काफी हद तक भी लाभ नहीं दिला पाए। नि:संदेह कांग्रेस के लिहाज से दिग्विजय अद्भुत किस्म की संगठन क्षमता के धनी हैं। बीते विधानसभा चुनाव में उन्होंने ‘पंगत पे संगत’ के माध्यम से राज्य में बिखरी हुई कांग्रेस को एकजुटता के सूत्र में पिरोने का चमत्कार कर दिखाया था। आज की तारीख में कांग्रेस को निश्चित ही सिंह जैसी क्षमताओं की जरूरत है। इस लिहाज से यह ताजा निर्णय भी सराहनीय है।

अब कांग्रेस आलाकमान (Congress high command) ने तो एक बार फिर दिग्विजय पर दांव लगा दिया है, लेकिन इस दल को कई चुनौतियों को पार करके ही इस दिशा में सफलता मिल सकेगी। इसके लिए बहुत जरूरी है कि सिंह अपने विचारों के प्रकटीकरण की प्रक्रिया को कुछ रिफाइंड स्वरूप प्रदान करें। आंदोलन के लिए वे वह मुद्दे नहीं उठायें, जो एक बार फिर समूची कांग्रेस को हिंदुओं की अदालत में मुजरिम (Criminal in the court of Hindus) बना दें, बल्कि मुद्दे वह चुने जाएं, जिन पर कांग्रेस, देश की पूरी जनता को विश्वास में ले सके। ऐसे विषयों की वर्तमान में इफरात है। महंगाई इनमें प्रमुख है। यह ऐसा मामला है, जिसने सारे देश को बुरी तरह प्रभावित किया है और कांग्रेस इस पर ठोस रणनीति (जो दिग्विजय के लिए कतई मुश्किल काम नहीं है) के माध्यम से किया जाने वाला आंदोलन इस दल की सफलता का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यदि महंगाई पर बात होगी, तो मोदी समर्थक जनता भी कांग्रेस के विचार अवश्य ही सुनेगी। यदि दिग्विजय अपनी आदत के अनुसार सांप्रदायिकता, RSS और हिन्दूत्व जैसे विषय पर अपने पुराने अंदाज में ही फिर सक्रिय हुए तो पार्टी आलाकमान (high command) के सारे किए-कराए पर पानी फिरना तय है। वजह यह कि सिंह का इस तरह का एक नया बयान सामने आते ही उनके ऐसे पुराने सभी बयान और विचारों का पिटारा खुल जाएगा और फिर स्थिति पर काबू पाना पार्टी के लिए आसान नहीं रहेगा।

यह कहना तो घोर मूर्खता का परिचायक होगा कि दिग्विजय को मुद्दों की समझ नहीं है। वह अनुभवी और उससे भी एक कदम चतुर सुजान किस्म के राजनेता हैं। लेकिन अब देखने वाली बात यह होगी कि सिंह अपनी इस समझ का अपनी पार्टी के हित में कितना इस्तेमाल कर पाते हैं। कांग्रेस ने तो एक मर्तबा फिर से सिंह पर विश्वास जता दिया, अब यह इस वरिष्ठ नेता के लिए बड़ी चुनौती है कि प्रत्युत्तर में मामला ‘विष-वास’ वाला साबित न होने पाए।

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