भारत और अजरबैजान के बीच लंबे समय से ठंडे पड़े द्विपक्षीय संबंधों को पटरी पर लाने के सकारात्मक संकेत मिले हैं।
शुक्रवार 3 अप्रैल को बाकू में दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों के बीच हुई उच्चस्तरीय बैठक में सहमति बनी कि आपसी संबंधों को किसी तीसरे देश के चश्मे से नहीं देखा जाएगा।
यह बैठक पिछले कई वर्षों में दोनों देशों के बीच सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परामर्श मानी जा रही है।
विदेश मंत्रालय में सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज की अगुवाई में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने अजरबैजान के विदेश मंत्री जेयहुन बायरामोव से मुलाकात भी की।
इसके साथ ही दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों के बीच छठे दौर के राजनीतिक परामर्श भी हुए, जिनकी सह-अध्यक्षता सिबी जॉर्ज और अजरबैजान के उप विदेश मंत्री एलनुर मामेदोव ने की। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच इस स्तर पर द्विपक्षीय विमर्श कभी नहीं हुआ है।
बहरहाल, इन सभी बैठकों में दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों की वर्तमान स्थिति और भविष्य की संभावनाओं का व्यापक जायजा लिया।
व्यापार, प्रौद्योगिकी, पर्यटन, फार्मास्यूटिकल्स, ऊर्जा, संस्कृति, लोगों के बीच आदान-प्रदान और सीमा पार आतंकवाद से मुकाबले जैसे मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। दोनों देशों ने आर्थिक-व्यापार संबंधों, ऊर्जा, पर्यटन और शिक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया।
बैठक में दोनों पक्षों ने उन मुद्दों पर भी अपनी-अपनी स्थिति स्पष्ट की जहां उनके बीच मतभेद रहे हैं। दोनों ने इन मतभेदों को सुलझाने के लिए संवाद की निरंतरता पर जोर दिया।
दोनों देशों ने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया, जिसमें मध्य पूर्व की तनावपूर्ण स्थिति शामिल थी।
पाकिस्तान का समर्थक रहा है अजरबैजान
सनद रहे कि पिछले कुछ वर्षों में अजरबैजान पाकिस्तान की भाषा बोलता रहा है, खासकर कश्मीर मुद्दे पर अजरबैजान ने पाकिस्तान का समर्थन किया था।
पिछले वर्ष ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी अजरबैजान ने इस्लामाबाद के पक्ष में बयान दिए, जिससे भारत में नाराजगी बढ़ी थी। अजरबैजान ने पाकिस्तान को रक्षा उपकरणों की आपूर्ति भी की थी। इन घटनाओं के कारण दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण रहे थे।



