Sunday, May 26, 2024

पीना नहीं रोक सकते तो न रोकिये जीना भी

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मंदसौर (Mandsaur) में जहरीली शराब (Poisonous Liquor) पीने से दस लोगों की मौत हो गयी। प्रशासन भले ही छह बता रहा है। ज्यादा समय नहीं हुआ, जब प्रदेश के अन्य हिस्सों रतलाम(Ratlam), मुरैना(Morena), भिंड (Bhind) और उज्जैन (Ujjain) में भी इसी तरह की घटनाएं सामने आयी थी। साल भर में  जहरीली शराब पीने से प्रदेश में कम से कम चार दर्जन असमय काल के गाल में समा गए। ऐसा ही हिसाब-किताब चलता रहा तो राज्य में अन्य स्थानों पर भी इसी तरह के मंजर दिखना तय हैं। मंगलवार को ही इंदौर (Indore) के एक बार में शराब पीने के बाद तीन युवकों की मौत हो गयी। सरकार हरकत में आयी है। मंदसौर में मुख्य आरोपी के मकान और अन्य ठिकानों को जमींदोज कर दिया गया है। लेकिन सत्ता के साकेत में बैठे वो भवन कब गिराए जाएंगे, जो इन मामलों के मूल दोषी हैं? राज्य में शराब की कीमतें आसमान छू रही हैं। गरीब वर्ग की पहुंच में देसी (Country Liquor) और सस्ती शराब ही है। अंग्रेजी शराब (Foreign Liquor) खरीदना उसके बूते से बाहर की बात है। लेकिन उसके सबसे छोटे पैमाने की कीमत तक सत्तर से लेकर नब्बे रुपये के आसपास पहुंचाई जा चुकी है। ऐसे में इस नशे के तलबगारों के पास यही विकल्प बचता है कि सस्ती पाउच वाली शराब पी लें। जो सरकारी ठेकों से बेची जाने वाले शराब की तुलना में लगभग आधे दाम में उपलब्ध है और जिसकी उपलब्धता का प्रदेश में कई जगह तो अघोषित कुटीर उद्योगों की शक्ल में प्रबंध धड़ल्ले से चलता आ रहा है। यह बात और है कि यही शराब अक्सर जहर का रूप लेकर कई जिंदगियां खत्म करती है और कई परिवार उजाड़ देती है।

शराब रेवेन्यू (Revenue) मिलने के बड़े साधनों में से एक है। यह आमदनी किसी भी सरकार की बड़ी जरूरत होती है। इसी के चलते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chauhan) ने भले ही शराब की नयी दुकानें खुलने पर रोक लगा रखी है। किन्तु शराब के अवैध कारोबार को वह भी नहीं रोक पा रहे हैं। फिर  शराबबंदी (Prohibition of Liquor) इस बुराई से निपटने का कोई कारगर तरीका भी साबित नहीं हुआ है। अभी जो रेवेन्यू सरकार की जेब में जा रहा है, वो बाद में पुलिस, आबकारी और प्रभावशाली राजनेताओं की जेब में जाने लगेगा। सभी जानते हैं कि बिहार (Bihar) से लेकर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के  गुजरात तक में जरा ज्यादा दाम चुकाकर शराब आसानी से हासिल की जा सकती है। एक घटना याद आती है। राज्य के एक विश्वविद्यालय में एक आईपीएस (IPS) अफसर को रजिस्ट्रार बना दिया गया। वह कड़क छवि वाले थे। उन्होंने ताकीद कर दी कि यूनिवर्सिटी में गलत काम करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। मैंने कई साल क्राइम की रिपोर्टिंग की है, इसलिए उन साहब से भी मेरा परिचय था। एक दफा मैं उनसे मिलने गया। उनके चैम्बर में एक कॉलेज संचालक भी बैठे हुए थे। अफसर ने खुश होने के लिहाज से उससे पूछा कि क्या अब भी यूनिवर्सिटी में कोई गलत काम हो रहा है। कॉलेज संचालक ने मेरे सामने ही कहा, ‘जी बिलकुल। सब पहले की ही तरह चल रहा है। अंतर केवल यह आया है कि पहले हमें जिस गलत काम को करवाने के लिए सौ रुपये देने पड़ते थे, अभी उसी काम का रेट आपका स्टाफ 500 रुपये कर चुका है।’

यही शराबबंदी वाले राज्यों का सच है। इसका दोषी सिस्टम है। उसमें बैठे वह लोग हैं, जो अवैध शराब के कारोबारियों से सांठ-गांठ कर इस बिक्री को बढ़ावा देते रहते हैं। अब अगर गुजरात में तस्करी की जो शराब पहुंचती है उसमें मध्यप्रदेश का बड़ा योगदान है। सरकार फिर जिसकी हो। बात पुलिस की हो या हो आबकारी विभाग की। दोनों ही जगह भ्रष्टाचार के इस परनाले की ऊपर से नीचे तक लहर बहती है। यदि आज शिवराज मध्यप्रदेश में नशाबंदी लागू कर दें, तो यहां भी ऐसा ही हाल दिखना तय है। क्योंकि ये नशे के तलब से लेकर कमाने की हवस तक का वो मिला-जुला कारोबार है, जिसके संरक्षक बहुत असरकारी किस्म के होते हैं।

ऐसे में समस्या का यही हल दिखता है कि सरकार अपने राजस्व में कुछ कमी होने देकर अपने नागरिकों की जिंदगी से खिलवाड़ के मामले रोक दें। वह शराब के दाम कम कर दें। ताकि नकली या जहरीली शराब के कारोबारियों पर अंकुश लगाया जा सके। इस तरह की शराब बनाने वाले इस तरह की ही शराब पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी वाले सरकारी महकमों की अवैध कमाई का सबसे बड़ा जरिया होते हैं। इस नेक्सस को तोड़ पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है। यह सही है कि शराब के दाम कम करने से सरकार के खजाने पर विपरीत असर होगा, लेकिन शिवराज तो लोगों की सुरक्षा के लिए हमेशा चिंतित तथा मुस्तैद रहते हैं। तो फिर क्यों नहीं वह कुछ नुकसान  उठाकर भी इस दिशा में कदम उठा रहे हैं? हालांकि एक तथ्य यह भी है कि शराब सस्ती होने के बावजूद राजस्थान और उत्तरप्रदेश में शराब से प्राप्त राजस्व कम नहीं है।

शराबबंदी की बात चली तो एक बात और याद आ गयी। दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) के समय तत्कालीन उप मुख्यमंत्री सुभाष यादव (Subhash Yadav) ने राज्य में नशाबंदी लागू करने की मुहिम छेड़ दी थी। उस कार्यकाल के चुनाव का कवरेज मैंने निमाड़ (Nimar) में जाकर भी किया था। तब मैंने देखा था कि खरगोन सहित सभी इलाकों में कच्ची शराब उतनी ही आसानी से मिल जाती थी, जितनी सरलता और सहजता के साथ हम किसी चाय के ठेले पर खड़े होकर चाय खरीद कर पी लेते हैं। मैं डबल एमए कर चुके एक शख्स से मिल चुका हूं। वह साधिकार बिस्मार्क (Bismark) सहित विश्व राजनीति पर बात करता था। उसने बताया कि वह पहले भोपाल में दुग्ध संघ में नौकरी करता था। फिर यह काम छोड़कर अपने गांव चला आया है। उसके इस फैसले पर मैं हैरत में था। वजह पूछने पर वह बोला, ‘जितनी तनख्वाह दुग्ध संघ दे रहा था, उतना पैसा तो मैं अपने गांव में एक सप्ताह में कच्ची शराब बना और उसे बेचकर कमा लेता हूं।’ बता दूं कि वह युवक राजगढ़ जिले के एक गांव का निवासी था। यह लिखने का मकसद किसी व्यक्ति या क्षेत्र पर टिप्पणी करना नहीं है। मकसद केवल यह बताना है कि शराब समाज का कटु सत्य है। किसी भी हाल में पीने वाले को पीने से रोकना किसी के लिए भी संभव नहीं हुआ है। आदिम काल से चली आ रही बुराई है। फिर  ये वो समाज है, जिसमें ये तथ्य तक व्यापक स्तर पर स्वीकार लिया गया कि नियमित रूप से शराब पीने वालों को कोरोना (Corona) नहीं होता है। जबकि ये पूरी तरह गलत कांसेप्ट है। मगर फिर भी इसे मानकर शराब की खुराक बढ़ा देने वाले लोग हर जगह मिल रहे हैं। क्योंकि पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए और जीने का अधिकार भी उन्हें अन्य लोगों की तरह मिला हुआ है। सरकार उन्हें पीने से न रोके और न ही अपने मुनाफे के फेर में किसी को जीने से भी न रोके। पीना अगर रोकना है तो वो समाज के स्तर पर और जागरूकता से ही संभव है। सरकार चाहे तो शराब के विरोध में जागरूकता अभियान चला सकती है। लेकिन जहरीली शराब से लोगों को अगर मरने से रोकना है तो फिर पीने वालों की पहुंच में आसानी से और सस्ती मिलने वाली सरकार की सील लगी शराब ही एकमात्र उपाय है।

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