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निहितार्थ

कांग्रेस और वामपंथ, एक सिक्के के दो पहलू

प्रकाश भटनागर एक कहानी यूं तो मार्मिक अर्थ वाली है, लेकिन आज की बात के संदर्भ में उसे परिवर्तित नजरिए से भी समझा जा सकता...

मोहन की ‘भागवत ‘ को नए अध्यायों की आवश्यकता

प्रकाश भटनागर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने संघ के स्थापना दिवस विजया दशमी पर बेहद शालीन तरीके से योगी आदित्यनाथ की 'बटोगे तो कटोगे' वाली...

इन नतीजों के मायने

प्रकाश भटनागर हरियाणा और जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के मंगलवार को आए नतीजों ने नरेन्द्र मोदी और भाजपा को बहुत जल्दी होने वाले महाराष्ट्र और...

राहुल गांधी अब नादान परिंदे नहीं हैं…

प्रकाश भटनागर अमेरिका में राहुल के कहे और किए के बाद अब राहुल गांधी को 'नादान परिंदे' वाली छवि से जोड़कर देखना बड़ी भूल होगी।...

नए एक्सटेंशन वाली दिशा में आगे बढ़ते मोहन यादव

प्रकाश भटनागर किसी अच्छे काम को आगे ले जाना समझदारी है। वैसे भी मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री भले ही बदले हों लेकिन सरकार में वहीं राजनीतिक...

गैरों पे करम…. अपने ही लिए गड्ढा खोद रही भाजपा

भाजपा जिस तरह अपनी विचारधारा के किसी समय के विरोधियों को पार्टी की मुख्यधारा में स्थान दे रही है, उससे पार्टी के भीतर ही निराशा और क्रोध की उस धारा का संचार भी होने लगा है, जो इस दल के लिए किसी भी तरह शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता।

नादानी में राहुल से मुकाबला करने पर क्यों आमादा है भाजपा

राहुल जिस तरह पानी पी-पीकर हिंदुओं और हिंदुत्व को कोस रहे थे, उसके चलते यह तय था कि यदि उनकी आक्रामकता का यही रुख जारी रहने दिया जाता तो वह बोलने के रौ में हिंदुओं को लेकर खुद और अपनी पार्टी की विचारधारा को एक्सपोज कर देते। आखिर भाजपा को हाल ही में बीते लोकसभा चुनाव में चौबीस करोड़ वोट और 240 सीटें मिली हंै। कांग्रेस को भाजपा से पूरे दस करोड़ वोट कम मिले हैं।

नई जिम्मेदारी में पुरानी गलतियां कैसे छोड़ पाएंगे राहुल?

राहुल गांधी ने भले ही किसी समय सदन में मोदी के गले लगने के बाद आंख मारते हुए अपने अपरिपक्व व्यवहार का परिचय दिया था, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि वह इसी सदन में मोदी के गले किसी मुसीबत की तरह पड़ने जा रहे हैं। अब घटनाक्रम आंख चलाने नहीं, बल्कि पूरी ताकत के साथ आंख दिखाने वाले हो सकते हैं।

मसखरों की मनोदशा और कांग्रेस की ‘राहु’ ल दशा

संविधान के विधि-विधान के विपरीत कांग्रेस के कारनामों का लंबा इतिहास है। राहुल की सोचने-समझने की वास्तविक क्षमता को देखते हुए कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उन्हें इस बारे में लगभग कोई भी जानकारी न हो। और यदि वे इस सबसे परिचित हैं, तब भी यह बेशक कहा जा सकता है कि वे अपने परिवार के प्रिय पात्र सैम पित्रोदा की तरह ही ' जो हुआ, सो हुआ' वाली थ्योरी में ही यकीन कर रहे हों।

किसान संगठनों का विरोध और शिवराज की चुनौतियां…

मुख्यमंत्री के रूप में अपने अनुभव और एक सहृदय जननायक की छवि के भरोसे शिवराज केंद्रीय मंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारी को लेकर भी तगड़ा होमवर्क करने में जुट गए होंगे। आखिर यह मारियो की निरंतर बढ़ती चुनौती जैसा मामला है और शिवराज ने अधिकांश अवसर पर चुनौतियों में ही अपनी सफलता का रास्ता तय किया है।

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