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बी सुदर्शन रेड्डी बोले, सलवा जुडूम पर फैसला मेरा नहीं सुप्रीम कोर्ट का था

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ससंद में विपक्षी गठबंधन इंडिया के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बी सुदर्शन रेड्डी ने कहा कि देश में लोकतंत्र का अभाव है और संविधान चुनौतियों से घिरा है। उन्होंने नक्सलवाद के समर्थन के आरोप को निराधार बताते हुए कहा कि यह फैसला उनका निजी फैसला नहीं था, बल्कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला था। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी ने एक सामचार एजेंसी

साक्षात्कार के दौरान श्री रेड्डी ने खुद को एक उदारवादी लोकतांत्रिक सोच वाला व्यक्ति बताया और कहा कि यह चुनाव दो विचारधाराओं के बीच की लड़ाई है। उन्होंने कहा कि उपराष्ट्रपति चुनाव उनके और सत्ताधारी राजग के सीपी राधाकृष्णन के बीच का मुकाबला नहीं, बल्कि दो अलग-अलग विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाला मुकाबला है। रेड्डी ने संसद में व्यवधान को लोकतांत्रिक विरोध का तरीका बताया और जातिगत गणना का समर्थन किया। रेड्डी ने कहा कि संसद में व्यवधान लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वह हमेशा इस पर प्रतिक्रिया दें। उन्होंने कहा कि पहले हम डेफिसिट इकोनॉमी की बात करते थे, लेकिन अब डेमोक्रेसी में डेफिसिट यानी लोकतंत्र का अभाव है। भारत भले ही सांविधानिक लोकतंत्र बना हुआ है, लेकिन वह दबाव में है।

इस दौरान उन्होंने संविधान पर हो रही बहस का स्वागत करते हुए रेड्डी ने कहा कि यह जरूरी है कि लोग समझें कि संविधान पर खतरा है या नहीं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल व्यक्तियों के बीच टकराव नहीं है, बल्कि विचारों के बीच टकराव है। उन्होंने यह भी कहा कि काश सरकार और विपक्ष के बीच बेहतर संबंध होते। पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि संविधान की रक्षा करने की उनकी यात्रा अब उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी तक पहुंच चुकी है। उन्होंने कहा कि पहले एक जज के तौर पर संविधान की रक्षा कर रहे थे और यदि अवसर मिला तो फिर से वह जिम्मेदारी निभाते रहेंगे।

इस दौरान उन्होंने सलवा जुडूम पर फैसले को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री के आरोपों पर भी बात की। उन्होंने अमित शाह के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह उनका निजी फैसला नहीं था, यह सुप्रीम कोर्ट का सामूहिक फैसला था। उन्होंने कहा कि अगर अमित शाह ने वह 40 पन्नों का फैसला पढ़ा होता, तो शायद वह ऐसा बयान नहीं देते।

उन्होंने कहा कि विपक्ष की ओर से उन्हें उम्मीदवार बनाया जाना सम्मान की बात है। उन्होंने कहा, विपक्ष विविधता का प्रतिनिधित्व करता है। यदि आप विश्लेषण करें, तो विपक्ष 63-64 फीसदी से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। इससे बड़ा सम्मान और क्या हो सकता है? राष्ट्रीय एकता को दर्शाने वाले शीर्ष सांविधानिक पदों को सर्वसम्मति से भरे जाने के सवाल पर उन्होंने कहा, काश, सर्वसम्मति होती। लेकिन आप जानते हैं कि वर्तमान राजनीति खंडित है। इन परिस्थितियों में शायद यह अपरिहार्य है, जिसके कारण यह संघर्ष हो रहा है। उन्होंने कहा, मैं यह नहीं कहता कि भारत अब लोकतांत्रिक देश नहीं रहा। हम अब भी एक सांविधानिक लोकतंत्र हैं, लेकिन दबाव में हैं। उन्होंने कहा कि पहले सत्ता पक्ष और विपक्ष कई राष्ट्रीय मुद्दों पर समन्वय करते थे। दुर्भाग्य से, आज हमें ऐसा नहीं दिखता।

उन्होंने कहा कि राधाकृष्णन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से आते हैं, जबकि वह खुद एक उदारवादी और सांविधानिक लोकतंत्र में विश्वास करने वाले व्यक्ति हैं। रेड्डी ने दिवंगत भाजपा नेता अरुण जेटली को बयान का जिक्र करते हुए कहा कि संसद में व्यवधान भी विरोध का एक वैध तरीका है। उन्होंने कहा कि अगर किसी को बोलने नहीं दिया जा रहा है, तो यह विरोध का एक तरीका हो सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए कि व्यवधान लोकतंत्र का स्थायी हिस्सा बन जाए।

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