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हिन्दू ईवीएम बनाम मुस्लिम ईवीएम…..

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प्रकाश भटनागर।

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता शुभेन्दु अधिकारी ने चुनाव नतीजों के बीच एक बड़ी सचाई को बेबाकी से बयान किया। पश्चिम बंगाल में बड़ी जीत हासिल करती दिखाई दे रही भाजपा की तरफ से शुभेन्दु अधिकारी पश्चिम बंगाल के अगले और भाजपा के पहले मुख्यमंत्री हो सकते हैं। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी चुनाव का एक बड़ा फेक्टर है। पश्चिम बंगाल में सरकारें चाहे कांग्रेस की रही हों या फिर तीन दशक की वामपंथी और डेढ़ दशक की ममता बैनर्जी की। एक बात सबमें कॉमन थी। इन सरकारों की जीत में मुस्लिम आबादी का योगदान।

यह विधानसभा चुनाव शायद ऐसा पहला मौका है। जब पश्चिम बंगाल में बन रही भाजपा सरकार का भावी नेता यह सचाई बेबाकी और साहस से बयान कर रहा है कि राज्य में बड़े बहुमत से बनने वाली सरकार हिन्दुओं के वोट से बन रही है। शुभेन्दु ने ईवीएम का भी बटवारा कर दिया। ईवीएम को भी उन्होंने हिन्दू ईवीएम और मुस्लिम ईवीएम में कनवर्ट कर दिया। इस हकीकत को देश में सारे राजनीतिक नेता, कार्यकर्ता, चुनावों से जुड़े कर्मचारी और मीडिया सब जानते हैं। लेकिन इसे ऐसे कोई बयान नहीं करता जैसा शुभेन्दु अधिकारी ने किया।

मैंने भी अपनी रिपोर्टिंग के दौर में इस बात को भोपाल की मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों के चुनाव में साफ देखा और महसूस किया है। भोपाल उत्तर और मध्य विधानसभा क्षेत्रों के मुस्लिम बहुल मतदान केन्द्रों में भाजपा एक वोट को भी तरस जाती थी।  हिन्दू बहुल क्षेत्रों में ऐसा नहीं होता था। वहां मुस्लिम उम्मीदवारों को भी हिन्दुओं के वोट मिल जाते थे। इसलिए इसे प्रतिक्रिया से उजपा साम्प्रदायिक धू्रवीकरण कह लें या बहुसंख्यकवाद का उभार। आज की राजनीति की सचाई यही है कि अब हिन्दुओं ने भाजपा को लगभग अपनी पार्टी  मान लिया है। खासकर वहां, जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है। इसलिए वहां अब हिन्दू मतदाताओं के वोट भाजपा की स्थायी प्रापर्टी है। जैसे अगर पश्चिम बंगाल में टीएमसी यह दावा करती है कि उसकी वोटों की गिनती तो तीस प्रतिशत के बाद से शुरू होती है। हो सकता है, अगले चुनावों में भाजपा अपने वोटों की गिनती को पैंतालीस फीसदी से शुरू होने का दावा करें।

पश्चिम बंगाल और असम  में मुस्लिम आबादी ज्यादा है। असम में अब भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है। अब पश्चिम बंगाल में भी। भाजपा यह स्पष्ट जानती है कि मुस्लिम मतदाता उसे स्वीकार नहीं करता है। केन्द्र में तीसरी बार और कई राज्यों में लंबे समय से सरकार में रहने के बाद भी ऐसा तो कहीं होता नहीं है कि सरकारी योजनाओं में मुस्लिमों से साथ कहीं कोई भेदभाव हो। सरकार की तमाम योजनाएं जैसे आवास, मुफ्त राशन या स्वास्थ्य की योजनाएं आमतौर पर पात्रता के आधार पर चलती हैं और इसमें धर्म का कोई लेना देना नहीं है। फिर आखिर मुस्लिमों का भाजपा से नफरत की हद तक विरोध के कारण क्या हैं?

इस सवाल का जवाब किसी एक-लाइन में समझाना मुश्किल है। कारण कई परतों में फैले हैं—ऐतिहासिक, राजनीतिक, नीतिगत और मनोवैज्ञानिक। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सभी मुस्लिम मतदाता एक जैसा नहीं सोचते होंगे। अलग-अलग क्षेत्रों में राय अलग हो सकती है। फिर भी जो मुख्य कारण अक्सर सामने आते हैं। उनमें पहला है, अविश्वास। भाजपा की वैचारिक हिन्दूत्व और राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि को लेकर मुस्लिमों का एक हिस्सा यह मानता है कि इसमें अल्पसंख्यकों की जगह सीमित है। अतीत की कुछ घटनाएं जैसे गुजरात में 2002 में हुए दंगे भी इस धारणा को प्रभावित करते हैं।

ऐसा नहीं है कि दंगों का इतिहास केवल गुजरात का हो या भाजपा की सरकारों में ही दंगे हुए हों। कई भयानक साम्प्रदायिक दंगों का इतिहास उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कांग्रेस या अन्य दलों की सरकारों के दौरान का भी है। यह भी याद रखा जाना चाहिए कि देश में अंग्रेजों से आजादी की शुरूआत ही साम्प्रदायिक विभाजन की नींव पर खड़ी थी। और इस विभाजन में मुस्लिम समुदाय का योगदान एतिहासिक तथ्य है। अभी याद रखना हो तो यह रखा जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी के सरकार में आने या अधिकांश राज्यों में भाजपा की सरकारें आने के बाद पिछले एक दशक में दंगे फसाद की कोई बड़ी घटना याद नहीं आएगी। पश्चिमी उत्तरप्रदेश और दिल्ली की कुछ घटनाओं को छोड़ दें, जो बड़ा रूप नहीं ले पार्इं।

दूसरा कारण है, भाजपा सरकारों की कुछ नीतियाँ और कानून जिन पर मतभेद हैं। मोदी सरकार के  कुछ फैसले ऐसे रहे हैं जिन पर मुस्लिम समाज के एक हिस्से ने आपत्ति जताई। इनमें नागरिकता संशोधन अधिनियम, जम्मू कश्मीर से धारा-370 का हटना, तीन तलाक कानून पर रोक। अब यह मुस्लिम समाज पर है कि वह इसे सुधार के तौर पर भी देख सकता है और अपने धार्मिक अधिकारों पर असर के रूप में भी। इसे सुधार के तौर पर देखने पर मुस्लिम समाज को फायदा ज्यादा है।

तीसरा कारण, भाजपा में मुस्लिम जनप्रतिनिधित्व बहुत कम है। इसके मूल में मुस्लिम समुदाय और मतदाताओं की सोच भी एक तरह से जिम्मेदार है। भाजपा जब मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारती है तो दूसरे दल के मुस्लिम उम्मीदवार को तो मुसलमानों का समर्थन मिलता है, लेकिन भाजपा के मुस्लिम उम्मीदवार को सीधा ठुकरा दिया जाता है। ऐसे कई उदाहरण हैं। लिहाजा, भाजपा ने भी अपने मुस्लिम नेताओं को चुनावी राजनीति से दूर कर रखा है। वैसे भी भाजपा में गिनेचुने मुस्लिम नेता हैं। मुस्लिमों में भी यह धारणा है ही कि भाजपा में हमारी बात सुनने वाला कोई नहीं है।  अल्पसंख्यकवाद और संतुष्टीकरण की राजनीति के विरोध में भाजपा देश में सफलता से बहुसंख्यकवाद की राजनीति को उभार चुकी है तो जाहिर है उसे भी मुस्लिमों की ज्यादा परवाह नहीं है। बल्कि मुस्लिमों का कट्टरवाद उसके बहुसंख्यक वोट बैंक को मजबूत करने का काम कर रहा है।

जमीनी स्तर पर सामाजिक माहौल भी मुस्लिमों और भाजपा की स्थायी दूरी का एक कारण है। लव जिहाद, घर वापसी और साम्प्रदायिक तनाव भाजपा और मुस्लिमों के बीच अलगाव का एक स्थायी कारण है।हर जगह ऐसी स्थिति नहीं है। फिर भी अब इसने राजनीतिक धु्रवीकरण की स्पष्ट रेखा खींच दी है। मुस्लिमों और भाजपा के बीच स्पष्ट दूरी साफ समझ में आती है। इसलिए पश्चिम बंगाल में शुभेन्दु अधिकारी जब ईवीएम का भी धार्मिक आधार पर बंटवारा करते हैं तो इसे स्वीकार कर ही मुस्लिम समुदाय को रास्ता निकालना होगा। राजनीति की मुख्यधारा में उसकी वापसी का रास्ता उसे ही खोजना होगा, वरना जैसा वो देश में खुद को अलग थलग मानते हैं, राजनीति में भी उसका हश्र वहीं नजर आ रहा है। मुस्लिम वोट एक तरफ जाएगा तो बदले में भाजपा का कोर वोट मजबूत होगा। इस प्रतिक्रिया को रोकना मुश्किल है।

हाशिए पर पहुंचती मुस्लिम राजनीति के सामने मुख्यधारा में आने का एक ही रास्ता है, भाजपा पर भरोसा करना सीखना होगा। मुस्लिम सरमाएदार जमीनी स्तर पर भाजपा को समझने की कोशिश करते हुए संवाद के रास्ते पर आएंगे तो जाहिर है दोनों के बीच तनाव कम होगा। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने ऐसी कोशिशें अपनी तरफ से की भी हैं। संघ को अब निर्विवाद रूप से हिन्दुओं का अधिकारिक संगठन मान लेना चाहिए। भाजपा की आश्चर्यजनक राजनीतिक सफलताओं में संघ का योगदान सौ प्रतिशत है। जाहिर है, संघ को अपनी बात लोगों को  समझना और समझाना बेहतर आता है।

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