उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के रहने वाले आईएएस रिंकू सिंह राही ने सरकारी सेवा से इस्तीफा देकर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अपने इस्तीफे में उन्होंने आरोप लगाया कि एक ईमानदार अधिकारी होने के नाते उन्हें काम करने का उचित अवसर नहीं दिया गया। यह पहली बार नहीं है जब रिंकू सिंह सुर्खियों में हैं; भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी लड़ाई सालों पुरानी है।
रिंकू सिंह राही अलीगढ़ के नौरंगाबाद क्षेत्र स्थित डोरी नगर के रहने वाले हैं। उनका परिवार बेहद साधारण है। उनके पिता सौदान सिंह एक आटा-चक्की चलाते थे और इसी छोटी सी आय से पूरे परिवार का भरण-पोषण होता था। रिंकू के परिवार में शिक्षा को हमेशा महत्व दिया गया। उनके ताऊ के एक बेटे भारतीय इंजीनियरिंग सेवा (IES) में हैं और दूसरे पुलिस विभाग में जेलर के पद पर कार्यरत हैं।
रिंकू सिंह राही की ईमानदारी का सबसे बड़ा इम्तिहान वर्ष 2009 में हुआ था। उस समय वे मुजफ्फरनगर में समाज कल्याण अधिकारी के पद पर तैनात थे। उन्होंने विभाग में हो रहे 100 करोड़ रुपये के छात्रवृत्ति घोटाले का पर्दाफाश किया।
शारीरिक क्षति: उन पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई गईं, जिनमें से एक उनके चेहरे पर लगी। इस हमले में उन्होंने अपनी एक आंख की रोशनी और सुनने की क्षमता काफी हद तक गंवा दी, लेकिन अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
रिंकू सिंह राही यूपी कैडर के 2023 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। पिता सौदान सिंह का कहना है कि रिंकू हमेशा से देश के लिए निस्वार्थ भाव से काम करना चाहते थे। उन्होंने बड़े से बड़े प्रलोभन ठुकराए। उनके पिता के अनुसार, “ईमानदारों का बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि ईमान होता है। यदि ईमानदारी को ठुकराया गया, तो देश में ईमानदार अधिकारी पैदा होना बंद हो जाएंगे।”
रिंकू सिंह के परिवार और ताऊ रघुवीर सिंह का आरोप है कि रिंकू को अन्य आईएएस अधिकारियों की तरह महत्वपूर्ण नियुक्तियां नहीं दी गईं। उन्हें दरकिनार किया गया और काम करने के अवसर सीमित कर दिए गए। इसी उपेक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था से आहत होकर उन्होंने पद छोड़ने का निर्णय लिया। उनके परिजनों का मानना है कि यदि उन्हें सम्मानजनक पद और जिम्मेदारी दी जाती, तो आज यह स्थिति नहीं आती।



