
प्रकाश भटनागर।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव बुधवार को वर्षगांठ के हिसाब से जीवन के नव-वर्ष में प्रवेश करने जा रहे हैं। मगर सच कहूं तो, मुझे उनके लिए इस मौके पर भी ‘नया’ जैसी कोई बात ही महसूस नहीं होती। हां, घड़ी की सुइयां आगे बढ़ जाएंगी। कैलेंडर पर फिसलती नजरें अगले दिन का सफर तय कर लेंगी, लेकिन डॉ. मोहन यादव तो वह ही रहेंगे, जिन्हें मैंने विद्यार्थी परिषद के समय से लेकर आज तक देखा है।
क्योंकि सार्वजनिक जीवन के उस आरंभिक दौर में भी वो तब भी उतने ही सहज और सरल थे, जितने आज मुख्यमंत्री के रूप में भी हैं। ऐसा नहीं कि उनके भीतर बदलाव न आए हों। मगर ख़ास बात यह कि ऐसा होना भी सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक ही बन गया है।
बात ताजा सन्दर्भ में आरंभ करें सीधी के कलेक्टर और गुना के एसपी को पलक उठाने-गिराने के अंदाज में इधर से उधर करना उस परिवर्तन का प्रतीक है, जो ठोस संकल्प से ही संभव है और ऐसा डॉ. यादव ने एक बार फिर कर दिखाया है। ठीक वैसे ही, जैसा उन्होंने विधायक सहित उच्च शिक्षा मंत्री रहते हुए भी कई बार कर दिखाया।
किसी भी चौराहे पर खड़ा होकर आम जनता से देश के सफल जनप्रतिनिधियों की बात कर लीजिए। कमोबेश हरेक उत्तर में वही चेहरा संतोषजनक फ्रेम में उतरेगा, जिसने अपने तंत्र को सियासी तंत्र-मंत्र वाले टोटके से अलग लाकर नौकरशाही को राजशाही वाले मगरूर भाव से दूर ला खड़ा कर दिया हो। डॉ. मोहन यादव तो वर्तमान के लिहाज से इसके सर्वथा मुफीद उदाहरण हैं।
पदभार संभालने के साथ ही आम लोगों के लिए बेअदब अफसरान को हटाने का फरमान सुनाकर यादव ने दिखा दिया कि राज्य में अब तो वो नहीं चलेगा, जो दुर्भाग्य से उनके पहले तक चलन का हिस्सा बना दिया गया था। मगर, वो चल ही नहीं रहा, बल्कि फल-फूल रहा है, जो आम जनता के हित में है।
मिसाल के तौर पर लाड़ली बहना योजना। डॉ. यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद इस कार्यक्रम के बंद होने के लिए शोक गीत गए जाने लगे थे, लेकिन आज हो यह रहा है कि डॉ. यादव ने इस योजना को जो पंख दिए, उसकी परवाज को कई भाजपा-विरोधी राज्य भी अपना रहे हैं। फिर किसानों के लिए गेहूं की खरीदी के दाम में हालिया वृद्धि तो ताजा-तरीन मिसाल है ही।
फिर भी प्रारब्ध ये कि हर कोई बेमिसाल नहीं हो सकता। चुनौतियां हर दामन के साथ हैं। इसलिए खरगोन के सामाजिक तनाव के साथ-साथ छिंदवाड़ा के जहरीले कफ सिरप और इंदौर के जानलेवा पानी का दंश भी यादव के हिस्से में आ ही गया। ठीक वैसे ही, जैसे कि उन्हें यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे के समस्या से भी जूझना पड़ा। कोई भी शासन व्यवस्था ऐसे हालात का अपवाद नहीं रही है। लेकिन डॉ. यादव ने इन सबका सफल और सकारात्मक रूप से जिस तरह प्रतिवाद किया, वो कम से कम काबिले-गौर तो बन ही जाता है।
डॉ. मोहन यादव ने शासन तंत्र को प्रपंच से बचाते हुए पंचतंत्र की महान अवधारणा वाली दिशा और दशा भी प्रदान की है। अजातशत्रु अब कोई भी नहीं है। फिर चाहे बात घर के भीतर वाले विरोधियों की भी क्यों न हो। लेकिन मोहन यादव ने ‘निपटाने’ वाली सियासत से सर्वथा विरत रहते हुए ‘सुलझाने’ वाली नीति का ही अनुपालन किया है। ख़ास बात यह भी कि उन्होंने विरोधी दलों के विरुद्ध अपने तेवर में कभी भी ‘हल्केपन’ का कोई पुट तक आने नहीं दिया है। वो सम्मान के साथ विरोध स्वीकारते हैं और पूरी ताकत से शालीन स्वरूप में उसका प्रतिवाद भी करते हैं।
राज्य के संचालन में धर्म और कर्म के समन्वय को उन्होंने नया रूप दिया है। बात केवल उज्जयिनी के पुरातन वैभव को नव-जीवन देने की नहीं है। बात यह भी कि अपने हरेक संबोधन में डॉ. यादव ने श्रोताओं को आध्यात्मिक मान्यताओं के आधार पर समझाया है कि हम क्या थे और फिर किस तरीके से वैसे ही हो सकते हैं। मुख्यमंत्री निवास पर लगी वैदिक घड़ी डॉ. यादव के ऐसे ही प्रयासों का सजीव उदाहरण है। डॉ. मोहन यादव का कर्म और धर्म लगातार ये बताता है कि वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेकर भाजपा तक के संस्कार से वो सरोकार जीवित रखे हुए हैं, जो अपने आप में अद्भुत है। जन्मदिन बहुत होते हैं, लेकिन डॉ. यादव जैसे वाले जन्म के दिन विरले ही कहे जाएंगे।



