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धनखड़ का इस्तीफा और मीडिया के हाल…

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प्रकाश भटनागर

दूर-दूर तक कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं। अचानक से उपराष्ट्रपति जगदीश धनखड़ के इस्तीफे की खबर सामने आती है। और सब भोचक्के……उप राष्ट्रपति ने अपने खराब स्वास्थ्य का हवाला दिया लेकिन दिनभर वे सामान्य तरीके से राज्यसभा की कार्यवाही में भाग लेते रहे। पिछले एक डेढ़ दशक में भाजपा और उससे जुड़े नेताओं की कार्यशैली में गोपनीयता का जबरदस्त असर है। इसमें सबसे बुरा हाल मीडिया का है। सरकार के फैसलों और सत्तासीन पार्टी की गतिविधियों पर निर्णय सामने आने तक मीडिया में सुगबुगाहट तक नहीं हो पाती है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का मामला अब तक लटका हुआ है। इसके कारण क्या हो सकते हैं और अगला अध्यक्ष कौन बन सकता है, इस पर एक भी विश्वसनीय कही जा सकने वाली खबर सामने नहीं है। जाहिर है, उप राष्ट्रपति के इस्तीफे के पीछे कहीं न कहीं सत्तापक्ष में कोई कलह जरूर है। विपक्षी कांग्रेस ने इसके अपने कारण खोजे हैं , लेकिन मीडिया से इस इस्तीफे के कारणों पर कोई विश्वास करने लायक खबर अभी तक सामने नहीं है।

इतना तो तय है कि यह सब अचानक नहीं ही हुआ होगा। इस ‘अचानक’ को गौर से देखें। कहा जा सकता है कि इस अचानक में समूचे मीडिया को बंद कर शून्य के साथ उसका गुणा कर दिया गया है। देश के सियासी इतिहास की इतनी बड़ी घटना से जुड़े क्रम आकार लेते रहे, लेकिन मीडिया को इसकी भनक तक नहीं लग सकी। यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की वह शोचनीय स्थिति है, जिस पर गंभीरता से सोचना बहुत जरूरी है।

यह अनिवार्य हो गया है कि मीडिया को जीवंत संपर्क वाले सबक से फिर रूबरू कराया जाए। इस सबक को बिसरा दिए जाने के चलते ही वो सूत्र तितर-बितर हो गए हैं, जो किसी समय धनखड़ जैसे बहुत बड़े घटनाक्रम का बेहद विश्वसनीय तरीके से कम से कम संकेत तो दे ही दिया करते थे। मोदी-शाह के इस दौर में भाजपा यूं ही अपने कामकाज को बहुत गोपनीय तरीके से करती है। उसके मजबूत तंत्र में ‘सुराख’ लगाकर किसी ऐसी खबर का सुराग लगा पाना कठिन होता है, जो खबर पार्टी बाहर आने नहीं देना चाहती। बाकी खुद मीडिया ने ही काफी हद तक इस मामले में खुद को कमजोर कर लिया है।

संपर्क के नाम पर सिमटने के साथ ही सोचने-समझने वाली प्रक्रिया के संकुचन को भी मीडिया के बड़े हिस्से ने अंगीकार कर लिया है। एक उदाहरण से इसे समझिए। मोतीलाल वोरा तब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। भोपाल से निकलने वाले एक अखबार ने हैरत में डालने वाला समाचार प्रकाशित किया कि वोरा को हटाकर अर्जुन सिंह को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है। जल्दी ही ऐसा हो भी गया। यह खबर देने वाले पत्रकार से बाद में मेरी इस पर चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि खबर वाले दिन वो वोरा से मिलने के लिए मुख्यमंत्री निवास गए थे। मुख्यमंत्री कुछ ठीक मूड में नहीं थे। बातचीत के बीच ही दिल्ली से उनके लिए किसी का फोन आया। वोरा ने ‘हां’ ‘हूं’ में बात की। मगर फोन रखने से ठीक पहले उन्होंने अपने स्वभाव से बिलकुल अलग जाते हुए गुस्से में कहा, ‘जी हां, वही…जो पहले थे।’ आप सोचिए कि किसी के चेहरे के हाव भाव और फोन पर नाम-मात्र की बातचीत के आधार पर इतनी बड़ी और सही खबर तैयार कर ली गई थी और अर्जुन सिंह एक बार फिर मुख्यमंत्री बन गए थे।

अब ऐसा तो है नहीं कि आज के मीडिया में ऐसी समझ नहीं है। लेकिन उसमें खबरों को सूंघने की वो ललक खत्म हो गई है। ‘आॅफ दि रिकॉर्ड’ बातचीत तो अब गोया कि गुजरे दौर की बात हो चुकी है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के दौर में चेहरा चमकाने का मामला है, तो नेता भी प्रिंट से अधिक तवज्जो कैमरा लेकर खड़े इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को देने लगे हैं। अब कैमरे के सामने तो गोपनीय बात उजागर करने का सवाल ही नहीं उठता और न ही वहां अनौपचारिक संवाद की कोई गुंजाइश रहती है।

इसके साथ ही विज्ञापन का वो तत्व भी दिखता है, जो पत्रकारों को खबरों के लिहाज से संपर्क और संवाद से अलग करता जा रहा है। किसी भी मीडिया हाउस की आर्थिक आवश्यकताओं की सबसे ज्यादा उम्मीद और पूर्ति सरकारी विज्ञापनों से ही होती है। बाजार से मिलने वाले विज्ञापनों का करीब 49 प्रतिशत हिस्सा अब डिजिटल मीडिया को मिलने लगा है। ऐसे में सत्ता को अप्रिय खबरों के लिहाज से कुरेदने में पत्रकार संस्थान सहित खुद की नौकरी के लिहाज से भी ‘बड़ा जोखिम’ महसूस करने लगा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मीडिया के नाम पर असंख्य ऐसे लोग भी दिख जाते हैं, जो सच्चे मीडिया वाली प्रतिबद्धताओं को ताक पर रखकर ठाठ से काम कर रहे हैं। अनेक पॉडकास्ट विशुद्ध रूप से ‘प्रायोजित’ दिखते हैं। वो अपनी एक ही प्रस्तुति से किसी को पलक झपकते ही सारी दुनिया के सामने परोस सकते हैं। इन सब हालात ने खबरों के लिहाज से मीडिया के मिजाज को जिस बुरी तरह प्रभावित किया है, धनखड़ का अचानक सामने आया इस्तीफा उसकी ताजा बानगी ही है।

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